The Mysterious Bell – Chapter 765
"मैंने खुद से भी छिपाकर रखा।" याकूब ने धीरे से कहा। "सोचता था, अगर दिखा दिया तो कोई इसे ले जाएगा और मेरे बाप का आख़िरी निशान भी चला जाएगा।"
टिंकू दरवाज़े के पास गया और शटर की दरार से बाहर झाँका।
"उस्ताद," उसने कहा, "बाहर मशीन वाले दो आदमी खड़े हैं। एक बार घड़ी देखी, फिर चला गया। और शबनम आपा ने समोसे भेजे हैं — ठंडे हो रहे हैं।"
"ठंडे समोसे भी अच्छे होते हैं," उस्ताद ने कहा। "पर ठंडी माफ़ी नहीं होती।"
उस वक़्त दरवाज़े पर हल्की खटखट हुई — तीन छोटी दस्तकें, जैसे कोई बच्चा हो जो अंदर आने से डर रहा हो। टिंकू ने दरवाज़ा एक हाथ खोला। बाहर गुड्डू खड़ा था, साँस फूली हुई, माथे पर पसीना, और हाथ में एक टूटी पतंग की लकड़ी।
"अंकुश भैया," उसने हाँफते हुए कहा, "वो… वो ओढ़नी वाली बूढ़ी औरत…"
"क्या हुआ उसे?"
"वो अब भी वहीं बैठी है।" गुड्डू ने कहा। "पीपल के नीचे। चबूतरी पर। सानिया ने उसे पानी दिया, उसने नहीं पिया। रफ़ीक़ ने उससे पूछा कि किसको ढूँढ रही हो, तो वो बस इतना बोली — अंकुश।"
मेरे पीछे मीरा का कैमरा रुक गया।
"और?" मैंने पूछा। "क्या और बोली?"
"बोली कि जब तक वो नहीं आएगा, वो नहीं उठेगी।" गुड्डू ने कहा। "और चिंटू ने हिम्मत करके पूछा कि तुम कौन हो, तो उसने कहा — जिसका नाम इस गली में सबसे पहले लिखा गया था।"
कमरा चुप हो गया।
मैं उठा। मेरी कुर्सी पीछे सरकी और उसकी टाँग फ़र्श पर खुरच खाई। मैंने घंटी जेब में डाली और अपनी कमीज़ के बटन ठीक किए।
"मैं जाता हूँ," मैंने कहा।
"नहीं जाएगा।" उस्ताद ने कहा।
उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा। उनकी पकड़ सख़्त थी — दर्ज़ी की पकड़, कैंची वाली पकड़, जो एक बार कपड़ा पकड़ ले तो फिसलने नहीं देती।
"उस्ताद," मैंने कहा, "वो बाहर बैठी है।"
"और तू अंदर खड़ा है।" उन्होंने कहा। "पहले ये बता कि अंदर क्या अधूरा है?"
मैंने मेज़ पर रखी चाबी और पीतल का टुकड़ा देखा।
"ये," मैंने कहा।
"तो पहले ये पूरा कर।" उस्ताद ने मेरा हाथ छोड़ा। "बाहर वाली औरत पचास साल से बाहर है। वो एक घंटा और रुक सकती है। पर अगर तू अधूरी मरम्मत लेकर बाहर गया, तो तू उसके सामने वही लड़का रहेगा जो कल था — और वो वही औरत रहेगी जो पचास साल पहले थी। नई शुरुआत के लिए पुरानी मरम्मत चुकानी पड़ती है।"
"पर उस्ताद," याकूब ने अचानक कहा, "ये टुकड़ा…"
उसकी आवाज़ बदल गई थी। वो धीमी हो गई थी, जैसे किसी पुराने कुएँ से आती हो।
"ये टुकड़ा," उसने फिर कहा, "मैं उस औरत को देना चाहता हूँ।"
कमरे में सब रुक गए।
"क्यों?" मैंने पूछा।
याकूब ने अपनी लाठी दीवार के सहारे रख दी। फिर उसने वो छोटा पीतल का टुकड़ा अपनी हथेली पर उठाया और बहुत देर तक उसे देखता रहा, जैसे हिसाब मिला रहा हो।
"क्योंकि," उसने कहा, "पचास साल पहले, उस आग वाली रात के बाद, मैंने एक बार उस औरत को देखा था। वो रात थी, बारिश भी हो रही थी। मैं अपने बाप की दुकान की जली लकड़ियाँ बटोर रहा था। और वो औरत वहाँ आई थी। बहुत दूर से नहीं, पास की गली से। उसके हाथ में एक झोला था और गले में ओढ़नी। और…"
उसने रुककर साँस ली।
"और उसकी गर्दन में, कंठे के पास, एक पीतल की मोटी अँगूठी लटकी थी। उसी अँगूठी से बँधा हुआ एक छोटा टुकड़ा। मैंने उसे दूर से देखा था और सोचा था कि वो कोई ताबीज़ है।"
उस्ताद की आँखें बंद हो गईं।
"माँ की अँगूठी," उन्होंने धीरे से कहा। "मेरी माँ की अँगूठी उस औरत के गले में।"
याकूब ने सिर हिलाया।
"मैं उस वक़्त नहीं समझा था," उसने कहा। "मुझे लगा कोई औरत है जो बाज़ार में मरने-जीने की चीज़ें बेच रही है। पर आज, जब उस्ताद ने कहा कि ये अँगूठी का निशान है, तब मुझे वो रात याद आई।"
"तो तुम कह रहे हो," मैंने कहा, "कि जो औरत पीपल के नीचे बैठी है, वो उस्ताद की माँ की अँगूठी पहने हुई थी?"
"मैं कह रहा हूँ," याकूब ने कहा, "कि मैंने वो अँगूठी उसके गले में देखी थी। और अगर वो उस औरत के पास है, तो इसका मतलब है कि वो अँगूठी उस्ताद की माँ ने खुद उसे दी थी। और अगर उस्ताद की माँ ने उसे अँगूठी दी थी, तो वो कोई बाज़ार की औरत नहीं है।"
वो मेरी तरफ़ मुड़ा।
"वो हमारे ही घर की है," उसने कहा। "और तेरे पापा ने आज तक उसका नाम क्यों नहीं लिया, ये अब मुझे भी जानना है।"
मेरी जेब में घंटी फिर हिली। इस बार उसने कुछ नहीं कहा। बस एक हल्की सी गूँज छोड़ी और चुप हो गई — वैसी गूँज जो बरसों से बंद किसी कमरे में दरवाज़ा खुलने पर आती है।
"टिंकू," मैंने कहा।
"हाँ?"
"बाहर जाकर सानिया को बोल कि वो औरत को पानी पिलाने की ज़िद करे, ज़िद से नहीं, मान से। और गुड्डू से कह कि वो चिंटू के साथ चबूतरी के पीछे से उसकी ओढ़नी पर नज़र रखे।"
"क्या ढूँढना है?"
"अँगूठी," मैंने कहा। "कंठे के पास, पीतल की मोटी अँगूठी।"
टिंकू एक पल को रुका, फिर उसकी आँखें बड़ी हो गईं, और वो बिना कुछ पूछे दरवाज़े से बाहर निकल गया।
मीरा ने अपना कैमरा बंद किया और काग़ज़ के टुकड़े को सँभालकर अपने फटे बैग में रखा।
"अंकुश," उसने कहा, "अगर वो अँगूठी सच में उस औरत के पास है, तो हम एक ऐसी चीज़ के पास पहुँच रहे हैं जो पचास साल से किसी काग़ज़ में नहीं है।"
"हाँ," मैंने कहा।
"और अगर वो काग़ज़ में नहीं है," नदीम ने धीरे से कहा, "तो रणवीर भी उसे नहीं जानता।"
"और अगर रणवीर नहीं जानता," मैंने कहा, "तो ये पहली चीज़ है जो हमारे पास है और उसके पास नहीं है।"
उस्ताद ने पीतल का टुकड़ा उठाया और उसे अपनी मुट्ठी में बंद कर लिया।
"पहले," उन्होंने कहा, "इस टुकड़े को उस चाबी से मिलाने की जगह ढूँढो। जल्दबाज़ी में नहीं। शांति से। जैसे कोई दर्ज़ी आँख बंद करके सुई में धागा डालता है।"
मैंने चाबी मेज़ से उठाई और टुकड़ा उस्ताद की मुट्ठी से लिया।
मैंने टुकड़े का टूटा किनारा उँगली से सहलाया। किनारा बहुत पुराना था, पर अंदर से चिकना था — जैसे बरसों किसी ने उसे बार-बार छुआ हो। शायद उस्ताद की माँ ने। शायद उस औरत ने। शायद दोनों ने।
और तभी मुझे एक बात समझ आई, जो मैंने पहले नहीं सोची थी।
"उस्ताद," मैंने कहा, "आपने कहा था कि आपकी माँ ने चाबी के छल्ले पर ये निशान खोदा था। पर ये निशान तो टुकड़े पर भी है।"
"हाँ।"
"इसका मतलब," मैंने धीरे से कहा, "कि टुकड़ा चाबी का हिस्सा नहीं है। टुकड़ा किसी और चीज़ का हिस्सा है — कोई चीज़ जो चाबी से जुड़ी थी।"
उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा, और उनकी आँखों में कुछ ऐसा चमका जो बरसों से बंद था।
"ताले का घूमने वाला हिस्सा," वो बोले। "चाबी की नोक का जवाब देने वाला पत्ता।"
"और वो पत्ता," मैंने कहा, "सिर्फ़ चाबी से नहीं मिलता। वो मिलता है उस ताले से, जिसमें वो बैठता है।"
कमरे में सन्नाटा छा गया।
"और वो ताला," याकूब ने कहा, "किस चीज़ पर लगा था?"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। मीरा ने नदीम की तरफ़ देखा। नदीम ने अपनी डायरी की तरफ़ देखा। और उस्ताद ने मुझे देखा, बहुत देर तक, फिर बोले —
"मेरी माँ के छत की कोठरी पर।"
बाहर मशीन का शोर एक पल के लिए रुका, फिर फिर शुरू हुआ — जैसे कोई बड़ा जानवर साँस ले रहा हो।
"तो पहले वो ताला खोजना होगा," मैंने कहा।
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