The Mysterious Bell – Chapter 764
फिर याकूब ने अपने कुर्ते के बटन खोले। एक, दो, तीन। और उसके सीने पर, ठीक दिल के ऊपर, एक छोटी सी पोटली बँधी थी — मैली रस्सी, पुराना कपड़ा, और उस कपड़े के ऊपर वही निशान: दो लकीरें और एक बिंदु।
उसने रस्सी खोली।
"ये," उसने कहा, "उस वादे की चीज़ है।"
और जैसे ही उसका हाथ आगे बढ़ा, मेरी हथेली में रखी घंटी अपने आप बज उठी।
॥
घंटी बजी और कमरे में हवा रुक गई।
वो ऐसे बजी जैसे किसी ने बाहर से दरवाज़ा खटखटाया हो — एक बार, छोटी सी, साफ़, और फिर चुप। मेरी हथेली पर रखी घंटी ठंडी नहीं थी। गरम भी नहीं थी। वो बस काँप रही थी, जैसे किसी बूढ़े आदमी के हाथ में पुराना सिक्का काँपता है।
याकूब चाचा का हाथ हवा में रुका रहा। रस्सी खुल चुकी थी, कपड़ा ढीला पड़ गया था, पर उसने अंदर की चीज़ बाहर नहीं निकाली। वो मेरी तरफ़ देख रहा था, और उसकी आँखों में वो डर था जो पचास साल पुराना हो, तो भी नया ही लगता है।
"घंटी ने कहा था," उस्ताद ने धीरे से कहा, "तीन बार सच। तो अब खोल।"
"उस्ताद," याकूब ने कहा, "अगर अंदर कुछ ऐसा निकला जो मेरे बाप ने मुझसे छिपाया, तो?"
"तो भी खोल।" उस्ताद की आवाज़ सपाट थी। "छिपी चीज़ सड़ती है। खुली चीज़ चुभती है, पर सड़ती नहीं।"
याकूब ने एक लंबी साँस ली। फिर उसने कपड़ा खोला।
अंदर कुछ बड़ा नहीं था। कोई खज़ाना नहीं, कोई सोना नहीं, कोई काग़ज़ों का बंडल नहीं। सिर्फ़ एक छोटा सा पीतल का टुकड़ा था, नाखून से थोड़ा बड़ा, किनारों से घिसा हुआ, और ऊपर की सतह पर पुरानी खुदाई।
मैंने आगे झुककर देखा।
उस टुकड़े पर आधा नाम खुदा था। आधा, इसलिए कि टुकड़ा बीच से टूटा हुआ था और नाम का बाक़ी हिस्सा उस टूटे किनारे के साथ कहीं और चला गया था। जो बचा था, वो दो अक्षर थे — और उनके नीचे वही निशान: दो लकीरें, और बीच में एक छोटा सा बिंदु।
टिंकू ने मेरे कंधे के ऊपर से झाँका और साँस रोक ली।
"ये वही निशान है," उसने फुसफुसाया। "उस्ताद की घंटी के छल्ले पर भी यही है। और बिजलीघर के बक्से की दीवार पर भी यही था।"
"हाँ," मैंने कहा। "और चूल्हे के पीछे वाले दरवाज़े की लकड़ी पर भी।"
याकूब ने टुकड़ा उठाकर मेरी तरफ़ बढ़ा दिया। मैंने उसे उँगलियों में लिया। वो ठंडा नहीं था। पीतल ठंडा कब का हो चुका था, पर उस टुकड़े में एक हल्की गरमाहट थी, जैसे अभी किसी की जेब से निकला हो।
"ये मेरे बाप ने दिया था," याकूब ने कहा। "लिफ़ाफ़े के साथ। कहा था — जिस दिन तुझे कोई तीन बार सच बोलता दिखे, उस दिन ये किसी ऐसे को देना जो इसका हक़दार हो। मैंने आज तक नहीं दिया।"
उस्ताद ने हाथ बढ़ाया।
उनका हाथ काँप रहा था। मैंने उस्ताद को इतने सालों में कई बार देखा था — गुस्से में, चुप में, थकान में। पर ऐसा नहीं देखा था। उन्होंने टुकड़ा अपनी हथेली पर रखा, उसे उलटा किया, फिर सीधा किया, फिर अपने मोटे चश्मे के पीछे से उसे इतनी देर तक देखा जितनी देर में कोई एक पूरी कहानी पढ़ लेता है।
"ये," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ फट गई, "ये मेरी माँ की अँगूठी का निशान है।"
कमरे में कोई नहीं बोला।
"मेरी माँ के पास पीतल की एक मोटी अँगूठी थी," उस्ताद ने कहा। "सादी सी। ऊपर कुछ नहीं, सिर्फ़ यही निशान — दो लकीरें और एक बिंदु। उस अँगूठी से वो चीज़ें सील करती थीं। छोटी पुड़िया, मिठाई का डिब्बा, और…"
वो रुके। उन्होंने चश्मा उतारा और उसे अपनी कमीज़ से पोंछा, पर पोंछते-पोंछते हाथ रुक गया।
"और पुराने ताले की चाबी।" उन्होंने कहा। "हमारे घर में एक लोहे का संदूक था। उसकी चाबी पीतल की थी, और उस चाबी के छल्ले पर यही निशान माँ ने खुद अपने हाथ से खोदा था। कहती थीं — जो चीज़ घर की हो, उस पर घर का निशान होना चाहिए।"
मेरी जेब में एक चाबी थी। गले में, पुराने धागे में, बचपन से। पापा ने मुझे पंद्रह-सोलह साल की उम्र में दी थी और कहा था कि ये किस चीज़ की है, मत पूछना। मैंने पचास बार पूछा, पचास बार वो चुप रहे।
मैंने धागा गले से उतारा।
चाबी मेरी हथेली पर आई — पुरानी, भारी, दाँते घिसे हुए, छल्ले पर ज़ंग की पतली परत। मैंने उसे याकूब के पीतल के टुकड़े के पास रखा।
दोनों एक साथ थे, पर मिल नहीं रहे थे।
टुकड़े का टूटा किनारा चाबी के छल्ले के मोड़ से बैठता नहीं था। मैंने एक बार घुमाकर देखा, दूसरी बार उलटकर देखा, तीसरी बार ज़ोर लगाया। कुछ नहीं हुआ। दोनों चीज़ें एक-दूसरे को देख रही थीं, जैसे दो लोग जो एक ही बात कहना चाहते हों, पर एक ही ज़ुबान में नहीं कह पाते।
"नहीं मिल रहा," मैंने कहा।
"मिलेगा," उस्ताद ने कहा। "पर तेरी जल्दी से नहीं।"
तभी घंटी फिर हिली। इस बार उसने ज़ोर से नहीं बजाया। बस एक हल्की सी आवाज़ आई, जैसे किसी ने दूर से किसी को टोका हो। और उस आवाज़ में दो शब्द थे।
"जल्दबाज़ी मरम्मत नहीं होती।"
मैंने चाबी और टुकड़ा दोनों मेज़ पर रख दिए।
"अच्छा," मैंने कहा। "तो क्या करें?"
"पहले दोनों को देखो," उस्ताद ने कहा। "फिर सोचो कि इन्हें किसने तोड़ा। मरम्मत वहाँ से शुरू होती है जहाँ टूटन हुई हो, वहाँ से नहीं जहाँ जल्दी हो।"
मीरा पहले से ही अपना कैमरा निकाल चुकी थी। उसने पीतल के टुकड़े को सफ़ेद काग़ज़ पर रखा, ऊपर से रोशनी की, और तीन तस्वीरें लीं — एक सीधी, एक उलटी, एक बगल से। फिर उसने चाबी की भी उतारी।
"अंकुश," उसने कहा, "ये चीज़ मुझे रणवीर के काग़ज़ों से जोड़कर देखनी होगी।"
नदीम, जो अब तक कोने में अपनी डायरी सीने से लगाए बैठा था, उठ आया।
"कैसे जोड़ेंगे?" उसने पूछा।
मीरा ने अपनी छोटी स्याही की डिब्बी खोली और काग़ज़ पर टुकड़े की शक्ल उतारने लगी।
"मेरे पास पाँच साल पुराना एक काग़ज़ है," उसने कहा, "जिस पर भारद्वाज कंस्ट्रक्शन की मोहर है और एक निशान है जिसे मैं तब धब्बा समझती रही। आज मैंने उसे शीशे से देखा। उसमें भी दो लकीरें थीं।"
"तो?" नदीम ने कहा।
"तो ये मतलब है," मीरा ने कहा, "कि ये निशान सिर्फ़ पुराना घर का नहीं है। ये निशान आज भी किसी के दफ़्तर में ज़िंदा है।"
नदीम ने अपनी काली जिल्द वाली डायरी खोली। काग़ज़ की परतें, पुरानी स्याही की गंध, और बीच में वो पन्ना जिस पर हकीम अली ने अपनी झुकी लिखाई में कुछ लिखा था। उसने उसे घुमाया और मेरी तरफ़ बढ़ा दिया।
"यही दो लकीरें," उसने कहा। "और यही बिंदु। दादा ने नीचे लिखा है कि तीन हाथों वाली चीज़ पर तीसरा नाम आना बाक़ी है।"
"और तीसरे नाम की जगह?" मैंने पूछा।
"खाली है।" नदीम ने कहा। "दादा ने जान-बूझकर खाली छोड़ी है। जैसे वो जानते थे कि नाम बाद में आएगा, और जब आएगा, तब किसी का घर हिलेगा।"
मैंने याकूब की तरफ़ देखा। वो अपनी लाठी पर झुका बैठा था, पर उसकी आँखें सामने दीवार पर टँगी उस पुरानी तस्वीर पर थीं — दो जवान लड़के, बीच में घंटी, और पीछे नीली स्याही में लिखा — आधी मेरी, आधी तेरी।
"याकूब चाचा," मैंने कहा, "ये टुकड़ा आपके पास कब से है?"
"मेरे बाप की मौत के बाद से।" उसने कहा। "उन्होंने मरने से पहले मुझे बुलाया, अपनी जेब से लिफ़ाफ़ा निकाला, और ये टुकड़ा मेरी हथेली पर रख दिया। बोले — इसे मत बेचना, इसे मत दबाना, इसे मत भूलना। जो इसे पहचानेगा, वो तेरा अपना होगा।"
"और आपने इसे पचास साल किसी को नहीं दिखाया?"
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