The Mysterious Bell – Chapter 762
उस्ताद ने अपना चश्मा उतारा, उसे कमीज़ के पल्लू से पोंछा और फिर मशीन के ऊपर रख दिया। उनकी आवाज़ धीमी थी, जैसे कोई पुरानी तिजोरी खोल रहा हो और डर रहा हो कि अंदर से कहीं धूल ही न निकले।
"ये घंटी," उन्होंने कहा और मेरी जेब की तरफ़ देखा, "ये किसी एक की चीज़ नहीं थी। न मेरी, न तेरी, न इस लड़के की। ये दो आदमी के वादे की चीज़ थी।"
"कौन दो?" मैंने पूछा।
"शिवनारायण यादव," उस्ताद ने कहा, "और इलाही बक्श।"
कमरे में एक पल के लिए सब चुप हो गया। बाहर मशीन की आवाज़ आ रही थी, वो मशीन जो रणवीर ने सात बजे के लिए बुलाई थी, और उसके नीचे कहीं पानी डालने की आवाज़, जैसे कोई धूल बैठा रहा हो।
मेरे हाथ ठंडे हो गए।
"शिवनारायण यादव," मैंने धीरे से दोहराया। "ये… ये दादा के पिता थे?"
उस्ताद ने सिर हिलाया।
"तेरे परदादा," उन्होंने कहा। "और इलाही बक्श याकूब के पिता। दोनों पुराने मिस्त्री थे। साइकिल के मिस्त्री नहीं, सुन — साइकिल के मिस्त्री भी थे, पर उससे बड़ी चीज़ थे। दोनों के हाथ में वो बात थी जो हर आदमी के हाथ में नहीं होती।"
"कौन सी बात?" टिंकू ने पूछा। वो दरवाज़े के पास खड़ा था, शटर बंद कर चुका था, और उसकी आवाज़ में वो भूख थी जो सवालों में ढल जाती है।
"ये बात," उस्ताद ने कहा, "कि टूटी चीज़ सिर्फ़ औज़ार से नहीं जुड़ती। टूटी साइकिल जुड़ती है रिंच से। पर टूटा रिश्ता? वो रिंच से नहीं जुड़ता। वो सिर्फ़ तब जुड़ता है जब दो आदमी अपनी मर्ज़ी से एक-दूसरे के सामने सच बोल दें।"
मैंने घंटी जेब में महसूस की। वो अब ठंडी थी, पर उसका वज़न बदल गया था। जैसे कोई चीज़ जो पहले सिर्फ़ पीतल थी, अब नाम हो गई हो।
"दोनों शहर के अलग-अलग कोनों से थे," उस्ताद बोलते रहे। "शिवनारायण यादव की दुकान पुराने बाज़ार में थी, बिजलीघर के पीछे। इलाही बक्श की दुकान यहीं, इसी गली में। दोनों की लड़ाई कभी ज़मीन की नहीं हुई, न पैसे की। दोनों की लड़ाई बस एक बात पर हुई — कौन पहले किसी की टूटी चीज़ जोड़ेगा। और यही लड़ाई उन्हें दोस्त बना गई।"
"लड़ाई से दोस्ती?" टिंकू ने कहा।
"हाँ," उस्ताद ने कहा। "कुछ लोग लड़कर ही दोस्त होते हैं। जो हर बात पर हाँ-हाँ करते हैं, वो दोस्त नहीं होते, वो गवाह होते हैं।"
मैं हँसा। बहुत ज़ोर से नहीं, बस इतना कि कमरे की सीलन टूट जाए।
"तो घंटी?" मैंने कहा। "घंटी कहाँ से आई?"
उस्ताद ने मशीन पर हाथ रखा। मशीन की टिक-टिक, जो अब तक धीमी थी, एक पल को रुकी और फिर फिर चली।
"घंटी उन्होंने मिलकर बनाई थी," उन्होंने कहा। "शिवनारायण ने पीतल का साँचा बनाया, इलाही ने उसमें फूल खोदा। और फिर दोनों ने उसे अपने बीच टाँग दिया, जैसे कोई दीवार पर तस्वीर टाँगता है। बोले — जिस दिन हमारे बीच भरोसा टूटेगा, इस घंटी की जीभ टूट जाएगी। और जिस दिन हम दोनों अपनी मर्ज़ी से सच बोलकर फिर जुड़ेंगे, ये अपने आप बजेगी।"
मैंने अपनी जेब से घंटी निकाली और उसे मशीन पर रख दिया। उस्ताद ने उसे नहीं छुआ। उन्होंने बस उसे देखा, जैसे कोई बूढ़ा अपने बचपन की तस्वीर देखता है और उसमें खुद को पहचानने की कोशिश करता है।
"और फिर टूट गया," याकूब ने कहा। उसकी आवाज़ सूखी थी, जैसे किसी ने उसके गले से पानी निकाल दिया हो।
"हाँ," उस्ताद ने कहा। "फिर टूट गया।"
"कैसे?" मैंने पूछा।
उस्ताद ने सिर उठाया। उनकी आँखें छोटी थीं, पर उनमें वो चीज़ थी जो बूढ़े लोगों की आँखों में तभी आती है जब वो कोई बहुत पुराना ज़ख्म खोल रहे हों।
"उस शहर में आग लगी थी," उन्होंने कहा। "पचास साल पहले। पुराने बाज़ार की आधी गली जल गई। तेरे परदादा की दुकान जली, याकूब के पिता की दुकान बच गई। और उस रात के बाद किसी ने कहा — इलाही बक्श ने काग़ज़ बदल दिए। किसी ने कहा उसने ज़मीन के काग़ज़ अपनी तरफ़ कर लिए। किसी ने कहा उसने उस रात जान-बूझकर आग लगाई।"
"किसने कहा?" मैंने पूछा।
"किसी ने," उस्ताद ने कहा, और उनकी आवाज़ में वो कड़वाहट आई जो आज तक नहीं उतरी थी। "किसी का नाम नहीं था। बस एक बात थी, जो एक मुँह से निकली और सौ मुँह तक पहुँच गई। और तेरे परदादा ने उसे पूछा नहीं। उसने सीधे इलाही बक्श का हाथ पकड़ लिया।"
"हाथ पकड़ लिया?" टिंकू ने कहा।
"यानी इल्ज़ाम मान लिया," मैंने कहा।
उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा।
"तू समझता है," उन्होंने कहा। "अच्छा है। क्योंकि मैंने भी वही किया था। पचास साल बाद, उसी गलती को दोहराया। याकूब ने मुझसे कुछ कहा और मैंने जाँचा नहीं।"
याकूब ने उस्ताद की तरफ़ देखा और उसके चेहरे पर वो चीज़ आई जो सिर्फ़ बहुत पुराने दोस्तों के चेहरे पर आती है — हल्की सी हँसी, जो गुस्से से निकलकर आई हो।
"तू भी वही गलती करता है," याकूब ने कहा। "ये खून की गलती है। हमारे बाप ने की, हमने की।"
"तो अब तोड़ेंगे," मैंने कहा।
दोनों ने मेरी तरफ़ देखा।
"क्यों?" याकूब ने पूछा।
"क्योंकि आप दोनों बैठे हैं," मैंने कहा। "और बैठे हुए दो आदमी अगर एक-दूसरे की तरफ़ देख रहे हैं, तो उनके बीच जो टूटा है, उसका सबसे बड़ा दुश्मन यही पल है।"
कमरे में फिर चुप्पी आई। और उस चुप्पी में मुझे कुछ सुनाई दिया — दरवाज़े के बाहर किसी के पैरों की आहट, फिर दो हल्की खटखट।
टिंकू दौड़ा और दरवाज़े की दरार से झाँका।
"उस्ताद," उसने कहा, "हकीम साहब का पोता है। नदीम भाई।"
"खोल दे," मैंने कहा।
नदीम अंदर आया तो उसके चेहरे पर पसीना था और उसके हाथ में वो काला चमड़े का बैग था। उसने बिना कुछ पूछे बैग खोला, और उसमें से एक काली जिल्द वाली डायरी निकाली — वो वाली जिसे उसके दादा हकीम अली ने मरने से दस दिन पहले उसे दी थी।
"मैं बाहर खड़ा था," नदीम ने कहा। "मैंने सब सुना।"
"तो तू जासूसी कर रहा था?" याकूब ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो पुरानी कड़वाहट फिर आई।
"नहीं," नदीम ने कहा। "मैं इंतज़ार कर रहा था। मेरे दादा ने कहा था — जिस दिन घंटी वाले घर में सच बोला जाए, उस दिन ये डायरी खोलना। आज घंटी बोली। और मैंने डायरी खोल ली।"
उसने डायरी को मशीन पर रख दिया और उसे धीरे से खोला। पन्ने पीले थे, किनारे उखड़े हुए, और स्याही हर जगह नीली-भूरी हो चुकी थी। वो मशीन के पास ही एक पन्ने पर रुका और उँगली रख दी।
"देखो," उसने कहा।
हम सब पास झुके। उस पन्ने पर कुछ लिखाई थी, और उसके नीचे एक निशान बना हुआ था — दो मुड़ी लकीरें और बीच में एक छोटा बिंदु।
मेरा हाथ अपने आप गले की तरफ़ गया। फिर जेब में पड़ी उस काली चाबी की तरफ़।
वही निशान। बिल्कुल वही।
और जब मैंने घंटी उठाई, तो उसके छल्ले पर भी वही निशान खुदा था — दो लकीरें, एक बिंदु। वो निशान जो मैंने पहले कई बार देखा था और हर बार सोचा था कि बस कोई पुराना खरोंच है।
"ये किसका निशान है?" मैंने पूछा।
"तीन लोगों का," नदीम ने कहा। "मेरे दादा ने लिखा है — जो चीज़ तीन हाथों से बने, उस पर तीन लोगों का निशान होता है। पर यहाँ दो लकीरें हैं और एक बिंदु। मतलब दो नाम आ चुके, तीसरा आना बाकी है। तीसरा आ जाएगा तो बिंदु की जगह तीसरी लकीर बन जाएगी।"
टिंकू ने अपनी आँखें सिकोड़कर देखा।
"मतलब," उसने कहा, "ये निशान अधूरा है?"
"हर चीज़ अधूरी है," नदीम ने कहा। "जो पूरी हो गई, वो मर गई।"
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