The Mysterious Bell761 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 761

7 min read November 5, 2026

"यह तेरी माँ की थी," वो बोला, आवाज़ में पुरानी घर की गंध थी।

"हाँ," उस्ताद ने कहा। "और अब यह तेरे पास रहेगी।"

तभी मेरी जेब में घंटी बजी।

नहीं, "बजी" कहना ग़लत है। उससे तो कभी बजती है, उसके पास ज़ुबान होती है, वो बोलती है। पर इस बार वो अलग थी। इस बार आवाज़ मेरी जेब से नहीं आई, आवाज़ मेरी हड्डी से आई, मेरी उँगली के जोड़ से आई, मेरे दाँतों की जड़ से आई।

घंटी गरम हुई और बजी और मेरे हाथ ने अपने आप जेब पकड़ ली।

दुकान की हवा में हल्की कंपन हुई। धूल अलमारी के ऊपर से उठी और फिर अपनी जगह पर बैठ गई। सिलाई मशीन का पाया, जिसे उस्ताद ने अभी छोड़ा था, धीरे से खड़खड़ाया। बाहर टिंकू की परछाईं रुक गई।

और घंटी बोली।

पहले वो टुकड़ों में बोली। जैसे कोई बहुत पुराना छत का पंखा चलने की कोशिश करे और हर पंख एक अलग आवाज़ करे।

"घर… नहीं…"

मैंने उसे जेब में दबाया। पर वो चुप नहीं हुई। मेरी उँगलियों के नीचे वो काँप रही थी, जैसे कोई बूढ़ी औरत बैठी बात कर रही हो और उसका स्वर काँप रहा हो।

"तेरे घर से नहीं…"

उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा। उनके चेहरे पर फिर से वो सफ़ेदी आ गई थी, पर इस बार अलग सफ़ेदी थी। इस बार डर नहीं था, इस बार कोई पुरानी चीज़ जाग रही थी।

"अंकुश," उन्होंने कहा। "बाहर निकाल।"

मैंने घंटी निकाली। मेरी हथेली में वो लाल थी, इतनी लाल जैसे कोई उसे बहुत देर तक तवे पर रखता रहा हो। पर जल नहीं रही थी। वो बस ज़ुबान पकड़े हुए थी और बोल रही थी।

"मैं तुम्हारे घर से नहीं आई," उसने कहा। इस बार पूरा वाक्य था। टूटा हुआ, पर पूरा। "मैं तुम्हारे पुरखों की अधूरी मरम्मत से आई हूँ।"

कमरे में जो हवा थी, वो एक पल के लिए रुक गई।

मैंने उस्ताद को देखा। उस्ताद ने याकूब को देखा। याकूब ने अपनी हथेली में रखी अँगूठी को देखा और उसकी उँगलियाँ उस पर बंद हो गईं।

"क्या बोली?" उस्ताद ने कहा। उनकी आवाज़ फटी हुई थी, जैसे पुराना काग़ज़ मुड़े तो चटके।

"वो कह रही है कि वो मेरे घर से नहीं आई," मैंने कहा। मेरी आवाज़ भारी थी और मुझे अपनी ही आवाज़ अजनबी लग रही थी। "वो कह रही है कि वो…"

मैंने घंटी को देखा। वो मेरी हथेली पर पड़ी थी और उसका पीतल अब भी काँप रहा था, जैसे अंदर कोई चीज़ खुद को सँभाल रही हो।

"मैं तुम्हारे पुरखों की अधूरी मरम्मत से आई हूँ," घंटी ने दोहराया। और अब वो धीमी थी, जैसे कहने के बाद थक गई हो। "जो तुमने आधी की, बाक़ी मुझमें बंद है।"

याकूब ने एक कदम पीछे लिया। उसकी लाठी चौकियों के बीच से गिरी और फ़र्श पर ऐसी आवाज़ हुई जैसे कुछ टूट गया हो।

"यह आवाज़," उसने धीरे से कहा। "यह आवाज़ मैंने सुनी है।"

उस्ताद ने उसकी तरफ़ देखा।

"कब?"

याकूब का चेहरा अजीब सा हो गया, जैसे वो पचास साल पीछे जा रहा हो और रास्ते में कुछ खो रहा हो। उसने अँगूठी अपनी मुट्ठी में कस ली।

"उस रात," उसने कहा। "उस रात जब घंटी बनी थी। हम तीन थे। तू, मैं और…"

वो रुक गया। उसका मुँह खुला रह गया, और उसकी आँखें उस्ताद के ऊपर से ऐसे गुज़रीं जैसे किसी ऐसी चीज़ को ढूँढ रही हों जो वहाँ नहीं है।

"तीसरा कौन था, उस्ताद?" याकूब ने कहा। और इस बार उसकी आवाज़ में गुस्सा नहीं था, सिर्फ़ एक खौफ था। "हम दो थे, या तीन?"

उस्ताद की गर्दन ऐसे हिली जैसे बोझा उठाते वक़्त हिलती है।

"तीन," उन्होंने कहा। "पर तीसरे का नाम…"

"ता-ता-ता।"

वो आवाज़ मेरी हथेली से नहीं आई। वो आवाज़ मशीन से आई।

नहीं, मशीन से नहीं। मशीन के नीचे कुछ था। मैंने ट्रंक से उठकर झुककर देखा, और मशीन के नीचे की लकड़ी के पाए की दरार में कुछ चमक रहा था। पीतल की पतली लकीर, या धागा, या…

"टिंकू," मैंने बाहर आवाज़ दी। "अंदर आ जा। और दरवाज़ा बंद कर दे।"

शटर गिरा और मैंने अपने कानों को अपने हाथों से एक पल के लिए दबाया, क्योंकि शटर की आवाज़ गली भर में गई और मुझे लगा कि शायद पूरी गली सुन रही है।

टिंकू ने अंदर आकर शटर की आख़िरी कड़ी ऊपर कर दी और फिर उसने मेरी हथेली में घंटी देखी। उसकी आँखें बड़ी हो गईं, पर वो कुछ नहीं बोला।

"कुछ सुना तूने?" मैंने पूछा।

टिंकू ने सिर हिलाया।

"बाहर से," उसने कहा, "एक आवाज़ आई थी। पर मुझे लगा कोई बोल रहा है।"

"क्या बोली?"

"मैं समझा नहीं," टिंकू ने कहा। "पर वो तुम्हारी आवाज़ नहीं थी, उस्ताद।"

उस्ताद ने टिंकू को देखा, फिर मेरी तरफ़ देखा। उन्होंने अपना चश्मा फिर पहना, और उनकी आँखें अब साफ़ थीं।

"अंकुश," उन्होंने कहा, और उनका लहजा मुझे किसी पुराने ज़माने की क़िताब जैसा लगा। "तू अभी घंटी को जेब में रख। और चुप रह।"

"क्यों?"

"क्योंकि," उस्ताद ने कहा, और उन्होंने याकूब की तरफ़ देखा, "वो जो बोली, वो घंटी की बात नहीं थी। वो तंत्र की बात थी। और तंत्र जब पूरी बात कहता है, तो वो बात उसकी नहीं होती। वो उस काम की होती है जो हमने अधूरा छोड़ा था।"

याकूब ने लाठी उठाई और अपनी चौकी पर वापस बैठ गया। उसके हाथ में अँगूठी थी और वो उसे खोलकर देख रहा था, जैसे उस चीज़ पर कोई नाम लिखा हो।

"तीन लोग थे," उसने धीरे से कहा। "हम दो भाई और…"

वो फिर रुक गया। उसने उस्ताद की तरफ़ देखा।

"तूने मुझसे पचास साल झूठ बोला," उसने कहा। "पर अब मैं तुझसे झूठ नहीं बोलूँगा। अगर तू इसे बोलेगा तो मैं इसे सबके सामने बोलूँगा।"

उस्ताद ने अपना हाथ याकूब के हाथ पर रखा। दोनों बूढ़े हाथ, दोनों काँपते हुए, और उनके बीच अँगूठी।

"तो फिर बोल," उस्ताद ने कहा। "क्योंकि मैंने सुन लिया है। घंटी ने कह दिया है। और अब तू जो कहेगा, वो सच होगा।"

मैंने घंटी जेब में रख दी। वो अब भी गरम थी, पर बोल नहीं रही थी। बाहर से मशीन की आवाज़ आ रही थी, सात बजे की मशीन, जिसके बारे में रणवीर ने कहा था। गली में कहीं कोई पानी डाल रहा था, पानी की आवाज़ दिवार से आकर टूट रही थी।

और मैं वहीं ट्रंक पर बैठा था, अपने ही शहर में, अपनी ही गली में, अपनी ही घंटी की आवाज़ से डरा हुआ, और मुझे यह समझ आ रहा था कि आज तक मैंने जो भी जोड़ा था, वो सब किसी और की अधूरी मरम्मत के ऊपर जोड़ा था।

"बोल याकूब," मैंने कहा। "और सच बोल। मेरे पास सुनने का वक़्त है, पर सहने का नहीं।"

याकूब ने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में कुछ ऐसा था जो बहुत पुराना था — जैसे कोई चीज़ जो पचास साल से सीने में चुप बैठी हो और अब खुद को बाहर निकलने की इजाज़त मिल गई हो।

"तो सुन," उसने कहा।

॥

"तो सुन," याकूब ने कहा।

पर उसने कुछ बोलना शुरू नहीं किया। उसने बस अपनी लाठी घुटनों के बीच खड़ी की और उसकी नोक से फ़र्श की धूल पर एक छोटा गोल घेरा बनाने लगा, जैसे कोई बच्चा मिट्टी में उँगली से नाम लिखता है, फिर मिटा देता है, फिर फिर लिखता है।

उस्ताद ने उसका हाथ पकड़ लिया।

"याकूब," उन्होंने कहा, "इससे पहले कि तू बोले, मुझे एक बात बोलनी है। ये बात मैंने पचास साल किसी से नहीं कही। न तुझसे, न अपने आप से।"

याकूब ने उनकी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो पुराना गुस्सा अब भी था, पर उसके नीचे कुछ और भी था। थकान। बहुत पुरानी थकान।

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