The Mysterious Bell – Chapter 760
और मेरी जेब में घंटी बजी — इतनी तेज़ कि मेरी उँगलियाँ जल गईं।
॥
मेरी जेब में घंटी ऐसे बजी जैसे किसी ने उसे चिमटी से पकड़कर हिलाया हो। मैंने हाथ जेब में डाला तो पीतल गरम था, इतना गरम कि मेरी उँगलियाँ झटके से बाहर आ गईं। मैंने हाथ झटका और उस्ताद की तरफ़ देखा।
उस्ताद का चेहरा सफ़ेद था। सिर्फ़ सफ़ेद नहीं, ऐसा सफ़ेद जैसे दीवार पर पुराना चूना जम जाए और उस पर कोई उँगली फेर दे। उनके होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली। उनका हाथ धीरे-धीरे आगे बढ़ा और सिलाई मशीन के लोहे के पाए पर जा टिका। उँगलियों की गाँठें सफ़ेद हो गईं। मशीन अब भी टिक-टिक कर रही थी, बिना सुई, बिना धागा, बिना चले। और उस्ताद उसी पाए को ऐसे पकड़े थे जैसे कोई डूबता आदमी किनारा पकड़ता है।
याकूब ने अपनी लाठी दोनों चौकियों के बीच रखी हुई थी। उसने उस्ताद को देखा और उसकी आवाज़ आई, धीमी पर पत्थर जैसी।
"बोल।"
उस्ताद ने आँखें बंद कर लीं।
"मैंने नहीं बेची," उन्होंने कहा।
कमरे में कुछ नहीं हिला। टिंकू बाहर दरवाज़े पर था, उसकी परछाईं शटर की दरार में आ-जा रही थी। मशीन की टिक-टिक अचानक तेज़ हुई और फिर रुक गई।
"क्या कहा?" याकूब ने कहा।
"मैंने नहीं बेची," उस्ताद ने दोहराया। इस बार आवाज़ में काँपन था, पर छुपाने की कोशिश नहीं। "मैंने उसे ट्रंक में रख दिया। कपड़े में लपेटकर। तीन गाँठ बाँधकर। और ऊपर से अपनी पुरानी किताबें रख दीं, ताकि कोई उसे खोले तो पहले किताबें गिरें और मुझे पता चल जाए।"
याकूब की उँगलियाँ लाठी पर कस गईं।
"तो तूने मुझसे झूठ बोला," उसने कहा। "पचास साल। पचास साल तूने मुझे यह यकीन दिलाया कि तूने मेरा हिस्सा बेच दिया। तूने मेरे सामने दुकान बंद की, गली छोड़ी, और मैं सालों तक यही सोचता रहा कि मेरा हिस्सा किसी और के हाथ में है।"
"हाँ," उस्ताद ने कहा। "मैंने झूठ बोला।"
मैं ट्रंक पर बैठा था और मेरा घुटना दुख रहा था। फटी जीन्स का किनारा उस जगह से खिसक गया था जहाँ बचपन में साइकिल की चेन ने माँस नोचा था। मैंने हाथ जेब में रखा, घंटी अब भी गरम थी, पर जल नहीं रही थी। जैसे वो सुन रही हो। जैसे वो इंतज़ार कर रही हो कि कोई क्या बोलता है।
"क्यों?" याकूब ने कहा। और उसका "क्यों" किसी सवाल जैसा नहीं, किसी चीज़ के टूटने की आवाज़ जैसा था।
उस्ताद ने हाथ मशीन से हटाया और अपने चश्मे को उतारकर मेज़ पर रख दिया। चश्मे के बिना उनका चेहरा अजीब लग रहा था। छोटा। थका हुआ। बूढ़ा।
"उस रात के बाद," उन्होंने कहा, "तू बदल गया था। मैंने तुझे देखा था। तू उस काग़ज़ के झगड़े के बाद तीन दिन तक कुछ नहीं बोला, और चौथे दिन तूने अपनी बीवी को ऐसे देखा जैसे उससे कोई सवाल पूछ रहा हो जिसका जवाब उसे नहीं आता। मैंने सोचा, अगर यह घंटी तेरे हाथ में रही, तो एक दिन तू इसे गुस्से में बजाएगा। और तू जानता है गुस्से में बजी घंटी क्या करती है।"
याकूब ने कुछ कहना चाहा, पर उस्ताद ने हाथ उठा दिया।
"मैंने सोचा," उन्होंने कहा, "कि तू अपनी ही चीज़ें जोड़ने लगेगा। अपना ही घर। अपनी ही ज़ुबान। और जब तंत्र तुझसे कहेगा कि किसी को माफ़ कर, तो तू उससे वो माफ़ी माँगेगा जो तू मुझसे नहीं माँग सकता। और जब वो नहीं होगा, तो तू खुद को खत्म कर देगा।"
उन्होंने याकूब की तरफ़ देखा।
"मैंने तुझे घंटी से बचाया ऐसा नहीं कहूँगा," उन्होंने कहा। "मैंने खुद को बचाया। क्योंकि अगर तू उस घंटी से कुछ करता और वो तेरे हाथ में फँस जाती, तो सबसे पहले मेरा नाम आता। और उस वक़्त मेरे पास अपने नाम के सिवा कुछ नहीं था।"
कमरे में सन्नाटा था। बाहर से कोई गाड़ी गुज़री, उसका हॉर्न दूर तक गया और फिर गली की आवाज़ों में घुल गया। मशीन के पास रखी लकड़ी की स्टूल पर चाय का पुराना छल्ला था। मैंने उसे देखा और सोचा कि इस दुकान में पचास साल से कोई न कोई चाय रखकर जाता रहा है और कोई न कोई छोड़कर जाता रहा है।
याकूब बहुत धीरे से उठा। लाठी उसने नहीं उठाई, वो चौकियों के बीच पड़ी रही। उसने दो कदम लिए और उस्ताद के सामने खड़ा हो गया। उसका शरीर दुबला था, पर उस वक़्त वो कमरे से बड़ा लग रहा था।
"तूने मुझे चोर बना दिया," उसने कहा। आवाज़ ऊँची नहीं थी। "मैं पचास साल अपने ही घर में, अपने ही बेटे के सामने यह सोचता रहा कि मेरे भाई ने मेरा हिस्सा खा लिया। मेरी बीवी मरते वक़्त तक मुझसे यही पूछती रही कि तेरा भाई कभी लौटेगा या नहीं। मैंने उसे हर बार झूठ बोला। मैंने कहा, लौटेगा। और लौटकर वो मुझसे हिसाब माँगेगा।"
उसकी आवाज़ अब काँपने लगी थी।
"मैंने तेरे नाम पर अपनी दुकान बंद कर दी थी," उसने कहा। "मैंने अपने बेटे को यह सिखाया कि उस्ताद अली बक्श से कोई लेना-देना नहीं। मैंने तेरा नाम ऐसे उच्चारण किया जैसे कोई गंदा शब्द हो। और अब तू कह रहा है कि तूने बेचा ही नहीं था?"
उस्ताद ने सिर झुकाया।
"हाँ," उन्होंने कहा।
"तो तूने मुझे क्या दिया?" याकूब ने कहा। उसकी आवाज़ टूट गई। "तूने मुझे पचास साल का गुस्सा दिया। पचास साल का यह भरोसा दिया कि मेरा भाई मेरा दुश्मन है। और मैं उसी पर जीता रहा।"
फिर वो चुप हो गया। और उसका चेहरा जो अभी गुस्से से कसा था, धीरे-धीरे ढीला पड़ने लगा, और उसकी आँखें भर आईं। उसने अपनी आस्तीन से चेहरा पोंछा पर आँसू उसकी हथेली पर गिर चुके थे, उसी हथेली पर जिस पर पतली लाल लकीर थी, जो उस्ताद ने फटे तौलिये से बाँधी थी।
"घंटी नहीं चाहिए थी मुझे," उसने धीरे से कहा। "मैं उस दिन तेरे पास हिस्सा लेने नहीं आया था। मैं तेरे पास यह कहने आया था कि मेरी बीवी बीमार है और मुझे डर लग रहा है। बस इतना। मुझे यह कहना था कि भाई, आज रात साथ बैठ। मेरे पास कहने को कुछ है।"
उसने उस्ताद की तरफ़ देखा।
"घंटी तो बहाना थी," उसने कहा। "घंटी तो मैंने सिर्फ़ इसलिए उठाई थी कि तू मेरी तरफ़ देखे। ताकि तू पूछे कि यह क्या है, और मैं कहूँ कि बैठ, बताता हूँ। और तू बैठ जाए। भाई की तरह।"
उस्ताद ने अपना सिर उठाया। उनके चेहरे पर वो भाव था जो बूढ़े लोगों के चेहरे पर बहुत कम आता है। वो भाव जो छोटे बच्चों के चेहरे पर होता है जब उन्हें कोई बहुत पुरानी चोट याद आ जाए, ऐसी चोट जिसका ज़ख़्म भर गया पर निशान नहीं गया।
उस्ताद ने अपना हाथ अपनी उँगली की तरफ़ ले जाया। उनकी माँ की घिसी पीतल की अँगूठी उनकी उँगली पर थी, पीली और मैली, जैसे पचास साल से किसी डिब्बे में साँस ले रही हो। उन्होंने उसे धीरे से उतारा। और फिर उन्होंने याकूब का हाथ बढ़ाया।
याकूब ने पहले तो हाथ नहीं बढ़ाया। उसने उस्ताद को देखा, फिर उस अँगूठी को देखा। फिर बहुत धीरे से अपनी हथेली खोली।
उस्ताद ने अँगूटी उसकी हथेली पर रख दी। उसकी उँगलियाँ याकूब की हथेली से छू गईं।
मैंने उस वक़्त अपनी साँस रोक ली थी, पता नहीं क्यों। दो बूढ़े आदमियों की उँगलियाँ छू रही थीं, बस इतना ही तो था। पर वो छू जाना पचास साल का पहला छू जाना था। और मुझे लगा कि इस कमरे की हवा जो अभी तक भारी थी, थोड़ी हल्की हो गई है।
याकूब की उँगलियाँ काँप रही थीं। उसने अँगूठी को अपनी हथेली में उठाया और उसे देखने लगा। उसका मुँह हिला, पर आवाज़ नहीं आई। फिर उसने कुछ बड़बड़ाया, कुछ ऐसा जो मैं नहीं सुन पाया, और उसने अँगूठी अपने सीने से लगा ली।
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