The Mysterious Bell757 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 757

6 min read November 5, 2026

"मुझे याद है," उस्ताद ने कहा।

"नहीं, तुझे याद नहीं है," याकूब ने कहा। "तूने मेरी बात सुनी और सुनकर भी नहीं सुनी। तू उस औरत के आँसुओं में इतना डूब गया था कि मेरी आवाज़ तक नहीं पहुँची। और फिर तूने क्या किया?"

उस्ताद चुप रहे।

"बता," याकूब ने कहा। "या मैं बता दूँ?"

"बता," उस्ताद ने कहा, बहुत धीमी आवाज़ में।

याकूब उठ खड़ा हुआ।

वो ट्रंक के पास से उठा, कमरे में दो कदम चला, फिर रुक गया। उसकी लाठी दीवार से टिकी थी। उसने उसे नहीं उठाया।

"उसके बाद," उसने कहा, "घंटी अलग हो गई। और मेरा हिस्सा — आधी घंटी — जो मेरे हाथ में थी, वो गई।"

"वो तूने दी थी," उस्ताद ने कहा।

"मैंने दी थी?" याकूब ने कहा। "मैंने दी थी?"

"तूने दी थी," उस्ताद ने कहा। "तू गुस्से में था। तूने उसे उसी आदमी को दिया जिसके हाथ में काली अंगूठी थी। मैंने देखा था। मैंने तुझे रोका था — तूने मेरी बात नहीं सुनी।"

"मैंने किसी को कुछ नहीं दिया," याकूब ने कहा। "मैं उस रात घर से निकला था और किसी को कुछ नहीं दिया।"

"तो फिर उसके हाथ में कहाँ से आई?" उस्ताद ने कहा, और इस बार उनकी आवाज़ ऊँची हो गई। "मुझे बता, याकूब। तेरी आधी घंटी उस आदमी के पास कैसे पहुँची?"

याकूब ने कुछ कहा, पर शब्द नहीं बने।

"क्योंकि मैंने बेची नहीं," उस्ताद ने कहा। "मुझ पर इल्ज़ाम है कि मैंने तेरा हिस्सा बेच दिया। मैंने नहीं बेचा। मैंने एक चीज़ नहीं बेची। मैंने दुकान नहीं बेची, मशीन नहीं बेची, माँ की पेटी नहीं बेची, और तेरा हिस्सा तो मैं कभी नहीं बेच सकता, क्योंकि वो मेरा था ही नहीं।"

याकूब ने उनकी तरफ़ देखा।

फिर उसने धीरे से कहा, "बेचा नहीं… तो किसी को दिया क्यों?"

कमरे में हवा रुक गई।

मशीन ने टिक किया।

उस्ताद ने अपनी आँखें बंद कर लीं।

"ये सवाल तूने पचास साल पहले पूछा होता," उन्होंने कहा, "तो बात और होती।"

"मैंने पूछा था," याकूब ने कहा। "तूने सुना नहीं था।"

मैं बीच में आया।

मुझे नहीं पता कि मुझमें वो हिम्मत कहाँ से आई, पर मैं दोनों के बीच खड़ा हो गया — बिल्कुल वैसे जैसे गली में दो आदमी आमने-सामने होते हैं और कोई बीच में आ जाता है।

"रुकिए," मैंने कहा।

दोनों ने मेरी तरफ़ देखा।

"दोनों की बातें सच जैसी लग रही हैं," मैंने कहा। "उस्ताद कहते हैं उन्होंने कुछ नहीं बेचा और सच में नहीं बेचा। याकूब चाचा कहते हैं उन्होंने कुछ किसी को नहीं दिया और सच में नहीं दिया।"

मैंने एक पल रुककर साँस ली।

"पर सच जैसा लगना सच होना नहीं होता।"

याकूब ने मेरी तरफ़ देखा, जैसे मैंने उसके हाथ से कुछ छीन लिया हो।

"मैंने यह अपनी दुकान पर सीखा है," मैंने कहा। "मेरे पास रोज़ ऐसे लोग आते हैं जो कहते हैं — मेरी गाड़ी की आवाज़ ऐसी है। और जब मैं खोलकर देखता हूँ, तो आवाज़ किसी और चीज़ से आ रही होती है। बोलने वाला झूठ नहीं बोलता, वो बस जानता नहीं कि आवाज़ कहाँ से आ रही है।"

उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा।

"तो तेरा मतलब क्या है?" उन्होंने कहा।

"मेरा मतलब है," मैंने कहा, "कि दोनों सच बोल रहे हैं और दोनों के हाथ में एक ही कहानी का आधा टुकड़ा है। और बाकी आधा — जो तीसरे के पास था।"

कमरा फिर चुप हुआ।

और इस चुप्पी में मशीन का टिक पहले से तेज़ लगा।

याकूब ने मुँह खोला, कुछ कहने के लिए — और फिर उसके अंदर से एक आवाज़ निकली जो शब्द नहीं थी।

खाँसी।

पहले एक बार। फिर दो बार। फिर ऐसी कि उसका पूरा शरीर झुक गया और उसने अपनी छाती को दोनों हाथों से पकड़ लिया। उसने ट्रंक का किनारा पकड़ा, फिर छोड़ दिया, और फिर घुटनों के बल कमरे के बीच में बैठ गया।

टिंकू उछलकर उठा। "पानी —"

"ले आ," मैंने कहा।

टिंकू दरवाज़े की तरफ़ भागा।

उस्ताद उठे और याकूब के पास गए।

"याकूब," उन्होंने कहा। "याकूब, मेरी तरफ़ देख।"

मैंने याकूब की मुट्ठी पकड़ी। उसकी उँगलियाँ कसी हुई थीं। मैंने उन्हें धीरे से खोला।

उसकी हथेली पर छोटा सा कट था — या कट नहीं था। पता नहीं क्या था। एक पतली, लाल लकीर उसकी हथेली के बीच से निकली हुई थी, जैसे किसी ने सुई से खींच दी हो।

टिंकू पानी लेकर आया।

"गिलास पकड़," मैंने कहा।

याकूब ने काँपते हाथ से गिलास लिया। आधा पानी पीया, और आधा उसकी गोद में गिर गया।

उस्ताद उसके बगल में घुटनों के बल बैठ गए और उसके कंधे पर हाथ रख दिया।

"तू ये कब से छिपा रहा है?" उन्होंने कहा।

याकूब ने हाँफते हुए कहा, "उस दिन से।"

"कौन सा दिन?"

याकूब ने कोई जवाब नहीं दिया।

उस्ताद ने याकूब को उठाकर ट्रंक पर बैठा दिया। फिर उन्होंने मशीन के पास की अलमारी से एक फटा तौलिया निकाला और याकूब के हाथ पर लपेट दिया।

मैं वहीं बैठ गया। मेरे घुटने फ़र्श पर थे और हवा में मशीन का टिक-टिक था और कमरे में कपड़ों की पुरानी गंध थी।

याकूब ने बहुत देर तक साँस ली।

फिर उसने अपना सिर उठाया।

उसके होठों के किनारे पर पानी था और उसकी आँखें लाल थीं। वो उस्ताद की तरफ़ देख रहा था, पर ऐसे देख रहा था जैसे कोई पाँच दशक पहले की गली में खड़ा हो।

मेरी जेब में घंटी एक बार बजी।

बहुत हल्की।

जैसे किसी ने बहुत दूर से किसी को याद किया हो।

याकूब ने अपनी एक उँगली उठाई।

"अली," उसने कहा।

उस्ताद ने उसकी तरफ़ देखा।

"मुझे घंटी नहीं चाहिए।" उसकी आवाज़ टूट रही थी। हर शब्द के बीच में साँस थी, और हर साँस में काँपन। "घंटी रख। हिस्सा रख। दुकान रख। सब रख। काग़ज़ रख।"

उसने उस्ताद की आँखों में देखा।

"मुझे यह बता —" और उसकी आवाज़ फट गई। "उस दिन तूने मेरी बात क्यों नहीं मानी?"

॥

"उस दिन तूने मेरी बात क्यों नहीं मानी?"

यह सवाल कमरे में गिरा और कमरे ने उसे निगल नहीं लिया। वो वहीं पड़ा रहा, फ़र्श की धूल पर, मशीन के टिक-टिक के बीच, जैसे कोई भारी चीज़ गिरी हो और कोई उसे उठाने को तैयार न हो।

मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा। उन्होंने मेरी तरफ़ नहीं देखा। उनकी नज़र याकूब के हाथ पर थी — उस फटे तौलिए पर, जो उन्होंने खुद लपेटा था और जिसके किनारे से खून की पतली लकीर बाहर आ रही थी, जैसे तौलिया भी इस सवाल का जवाब नहीं जानता।

मेरी जेब में घंटी बजी। हल्की, एक बार। जैसे किसी ने दूर से किसी का नाम लिया हो और फिर भूल गया हो।

मैं उठा।

"यह जवाब मेरा नहीं है," मैंने कहा। "और मैं इस जवाब को तेरे और मेरे बीच नहीं रखूँगा।"

याकूब ने सिर उठाया। उसकी आँखों में पानी था और गुस्सा भी, और दोनों एक ही जगह बैठे थे, जैसे दो आदमी एक ही चौकी पर।

मैं दरवाज़े तक गया और शटर को एक हाथ जितना ऊपर किया। बाहर सुबह की धूप खड़ी थी, पीली और ठंडी, और उसी धूप में टिंकू गिलास लिए खड़ा था, और उसके पीछे सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू — चारों एक-दूसरे के पीछे छिपकर ऐसे झाँक रहे थे जैसे यहाँ कोई सर्कस चल रहा हो।

"टिंकू," मैंने कहा।

"हाँ उस्ताद।"

"दुकान के पीछे से दो चौकियाँ उठा के ला। वो पुरानी लकड़ी वाली। जिनमें से एक की टाँग हिलती है।"

"दो चौकी?" उसने कहा। "किसके लिए?"

"बैठने के लिए," मैंने कहा। "आज कोई खड़ा नहीं बोलेगा।"

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