The Mysterious Bell742 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 742

7 min read November 5, 2026

"उसके बाद बक्से में एक आवाज़ हुई।" बाबा ने कहा। "ज़ोर की नहीं। ऐसी जैसे कोई बहुत सालों से बोलता आ रहा हो और अब उसकी आवाज़ घिस गई हो। एक औरत की आवाज़ थी। बूढ़ी। थकी हुई।"

"क्या कहा उसने?"

बाबा ने कुछ देर आसमान की तरफ़ देखा। फिर बोले, "मुझे ठीक से सुना नहीं। बस इतना कि बक्से के अंदर कुछ खिसका। जैसे कोई उठने की कोशिश कर रहा हो और न उठ पा रहा हो। और फिर — सब चुप।"

"और पापा?"

"तेरे पापा मुड़े।" बाबा ने कहा। "धीरे-धीरे चलकर बाहर आए। उनका चेहरा ऐसा था जैसे किसी ने उनसे हाथ से कोई काग़ज़ छीन लिया हो।"

मेरी जेब में घंटी अब भी गरम थी। मैंने उसे छुआ। वो ठंडी नहीं हुई।

"उनका चश्मा?" मैंने पूछा। "आपने देखा था उनके चेहरे पर चश्मा?"

बाबा ने गर्दन हिलाई, जैसे ना कह रहे हों।

"चश्मा उनके हाथ में नहीं था। मैंने पूछा — शंकर, तेरा चश्मा कहाँ है? वो हँसे। और बोले — वो पीछे रह गया।"

पीछे रह गया।

मेरे हाथ के नीचे लकड़ी की चौकी ठंडी थी। मैंने अपनी हथेली उस पर रख दी। पापा का चश्मा — कल रात, हमारी दुकान के शटर के नीचे से पैकेट में आया था। साफ़ कपड़े में लिपटा हुआ। एक काँच चटका हुआ। टेप खुली हुई।

मतलब — जिसने भी वो चश्मा लौटाया, उसने पापा के हाथ से उतारा था। शायद पापा ने खुद उतारा हो। शायद किसी ने उतारा हो।

"बाबा।" मैंने कहा। "जब पापा बाहर निकले, तब बाहर कोई था?"

बाबा की उँगलियाँ रुक गईं।

"था।" उन्होंने कहा।

हवा रुकी हुई थी। छोटा सा दीया जल रहा था और उसकी लौ भी सीधी खड़ी थी, जैसे साँस भी रोक ली हो।

"फाटक के बाहर एक आदमी खड़ा था।" बाबा ने कहा। "सफ़ेद कुर्ता। पैरों में लकड़ी के जूते। चेहरा नहीं दिखा। अंधेरा था और वो दीये की रोशनी से बाहर खड़ा था। उसने कुछ नहीं कहा। बस एक हाथ आगे किया — जैसे रास्ता दिखा रहा हो।"

मेरी साँस धीमी हो गई।

"और पापा?"

"तेरे पापा उसके पीछे चले गए।" बाबा ने कहा। "मैंने आवाज़ दी। मैंने कहा — शंकर! शंकर रुक जा! पर वो नहीं रुके। एक बार भी पलटकर नहीं देखा।"

मैंने आँखें बंद कर लीं।

मैंने वो सुना था। कल बबलू ने बताया था — रात साढ़े ग्यारह बजे पापा खड़ाऊँ वाले के पीछे खींचे जा रहे थे। तब मुझे लगा था कि बबलू बढ़ा-चढ़ा कर कह रहा है। ज़बरदस्ती से खींचा जा रहा है। पर ये सच था — कोई पीछे नहीं खींच रहा था। पापा खुद चल रहे थे।

ये मेरे लिए उस पूरी रात की सबसे बुरी बात थी। ये सोचना कि किसी ने पापा को ज़बरदस्ती ले जाया, आसान था। पर ये सोचना कि पापा खुद गए — वो कहीं ज़्यादा भारी था।

टिंकू ने मेरी कुहनी पकड़ी। उसका हाथ ठंडा था।

"उस्ताद।" उसकी आवाज़ भर्राई हुई थी। "वो बक्सा — उसने पापा जी से आपका नाम माँगा था?"

मैं टिंकू की तरफ़ मुड़ा।

"क्या?"

"आपने सुना नहीं?" टिंकू ने कहा। "पापा जी ने कहा — अब बेटे का मत माँगना। मतलब — वो बक्सा अगला नाम आपका माँग रहा था।"

कमरे में एक पल के लिए सब कुछ रुक गया।

बाबा ने टिंकू की तरफ़ देखा। फिर मेरी तरफ़। फिर धीरे से कहा, "ये लड़का तेज़ है।"

"उस्ताद।" टिंकू ने मेरी कमीज़ पकड़ ली। "मैं डर गया।"

मैंने उसका हाथ अपनी हथेली में लिया।

"डर गया?" मैंने कहा। "अरे, डरना तो मेरा काम है। तू तो गुप्तचर है।"

पर मेरी आवाज़ में वो हल्कापन नहीं था जो मैं दिखाना चाहता था। टिंकू ने भी पहचान लिया। उसने कुछ नहीं कहा, बस मेरा हाथ पकड़े रहा।

बाबा उठे।

उनके लकड़ी के जूते ज़मीन पर टक-टक बोले।

मेरी रीढ़ ठंडी हो गई।

टक। टक। टक।

वो आवाज़।

मैंने उस गली में ये आवाज़ सुनी थी। अंधेरे में। रात को। तीन धीमी आवाज़ें, और फिर चुप्पी।

मैंने बाबा के पैरों की तरफ़ देखा। लकड़ी के जूते। ऊपर से पुराने। पीछे की रस्सी से बँधे। तलवे घिसकर गोल हो गए थे। और उनमें धूल भरी थी — गीली नहीं, सूखी।

मेरी साँस अपने आप रुक गई।

बाबा ने देख लिया कि मैं कहाँ देख रहा हूँ।

वो रुके।

"बेटा।" उन्होंने धीरे से कहा। "इस गली में सिर्फ़ मेरे ही लकड़ी के जूते नहीं हैं।"

मैंने उनकी तरफ़ देखा।

"तीन जोड़े हैं।" बाबा ने कहा। "एक मेरे। एक उस्ताद तुफ़ैल के, जो पीपल के पूरब वाली गली में हारमोनियम लेकर बैठते हैं। और एक —"

वो रुके। उनकी आवाज़ काँपी।

"और एक उसका है। जिसका नाम इस गली में कोई नहीं लेता।"

"कौन?" मैंने कहा।

बाबा ने कुछ नहीं कहा। वो भीतर गए। पीछे के कमरे में कुछ खटका। फिर वो लौटे। उनके हाथ में एक छोटा कपड़े का पोटला था, जो धूल से भरा था।

वो बैठ गए। घुटनों पर पोटला रखा। धीरे-धीरे खोला।

उसमें एक चाबी थी।

छोटी। काली लोहे की। दाँते घिसे हुए, पर साफ़। छल्ले पर लाल धागा बँधा था, जो अब ज़र्द पड़ चुका था।

"ये मैंने बीस साल पहले बिजलीघर के फाटक पर पाई थी।" बाबा ने कहा। "ताला लटकता था, और इसका कुंडा खुला था। ये चाबी उस फाटक के पीछे की ज़मीन पर पड़ी थी। मैंने उठा ली। फिर देखा, ये फाटक की नहीं है।"

"फिर किसकी है?"

बाबा ने चाबी मेरी हथेली पर रख दी।

"उस कमरे की।" उन्होंने कहा। "जो बक्सों के पीछे है।"

मेरी उँगलियाँ उस चाबी पर बंद हो गईं।

कमरे की। बक्सों के पीछे वाले कमरे की।

वो कमरा जिसके दरवाज़े पर मीरा ने अपना पुराना ताला लगा दिया था। वो कमरा जिसमें पापा का चश्मा और धूल में लिखी बात मिली थी — ऊपर मत जाना।

"बाबा।" मैंने कहा। "आपने वो कमरा खोला नहीं?"

"नहीं।"

"कभी नहीं?"

"कभी नहीं।" बाबा ने कहा। "बीस साल में एक बार भी नहीं। मैं बाहर से देखता था। बस।"

"क्यों?"

बाबा ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें अब भीगी थीं, पर आवाज़ साफ़ थी।

"क्योंकि जो अंदर जाता है," उन्होंने कहा, "वो अंदर का होकर रह जाता है, बाहर का नहीं रहता।"

मैंने चाबी को मुट्ठी में भींच लिया। लोहे की ठंडक मेरी हथेली में उतर गई।

कुछ देर हम तीनों चुप बैठे रहे। बाहर कुत्ते भौंके। एक सफ़ेद कुत्ता दरवाज़े के पास आकर बैठ गया और बाबा के पैर के पास सिर रख दिया। बाबा ने बिना देखे उसका सिर सहला दिया।

"बाबा।" मैंने कहा। "पापा ने आपसे कुछ और कहा था? कोई बात? कोई नाम?"

बाबा ने कुछ देर सोचा।

"एक बात कही थी।" उन्होंने कहा। "जब वो फाटक की तरफ़ जा रहे थे, तब मैंने उनका हाथ पकड़ा और कहा — शंकर, अंकुश को क्या कहूँ?"

मेरा गला सूख गया।

"और उन्होंने क्या कहा?"

बाबा ने मेरी तरफ़ देखा।

"उन्होंने कहा — उससे कहना कि अपनी दादी का नाम ढूँढे।" बाबा की आवाज़ भारी हो गई। "और उससे कहना कि घर का चौथा दरवाज़ा मत खोलना।"

मेरे हाथ ठंडे हो गए।

दादी का नाम। चौथा दरवाज़ा।

"चौथा दरवाज़ा?" टिंकू ने पूछा। "उस्ताद, आपके घर में कितने दरवाज़े हैं?"

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

मैंने गिनना शुरू किया।

दुकान का शटर। एक।

घर का मुख्य दरवाज़ा। दो।

चूल्हे के पीछे वाला दरवाज़ा। तीन।

और चौथा?

मेरे घर में चौथा दरवाज़ा कौन सा था?

मैं वहाँ बैठा रह गया, और मेरे मन में वो पूरा घर घूमने लगा — दुकान, पीछे का कमरा, रसोई, आँगन, छत, पिछली खिड़की। एक-एक दीवार। एक-एक कोना।

चौथा दरवाज़ा।

मुझे याद नहीं आया।

मैंने बाबा की तरफ़ देखा। वो मुझे देख रहे थे।

"बाबा।" मैंने कहा। "पापा ने ये कब कहा था? ये बात — चौथे दरवाज़े की?"

बाबा ने कुछ देर आँखें बंद रखीं।

"जब वो बक्से से निकलकर आए थे।" उन्होंने धीरे से कहा। "जब उन्होंने मुझे देखा। तब उन्होंने पहले यही कहा था।"

कमरे में पीली लौ काँपी।

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