The Mysterious Bell – Chapter 741
मैंने करीब जाकर झुका। नाली के किनारे, पुराने कुत्ते की झोपड़ी के बाहर, चार कुत्ते बैठे थे। उनमें से एक बूढ़ा था — आँखें धुँधली, एक कान कटा, हड्डियाँ गिनी जा सकती थीं। बाकी तीन छोटे, पर पतले। भूखे।
"और वो बाबा?" मैंने पूछा।
गुड्डू ने नाली के पीछे इशारा किया।
"वो आज नहीं आए।"
"कब से?"
"तीन दिन से।" सानिया ने कहा। "हम ही डाल देते हैं। पर वो — चिंटू डरता है।"
"मैं नहीं डरता।" चिंटू ने कहा। "पर उनका घर अंधेरे में है। और वो कभी बाहर नहीं आते।"
"कहाँ रहते हैं?"
सानिया ने उँगली से इशारा किया।
"बिजलीघर के पीछे। वहाँ एक झोपड़ी है। पुरानी। उसके आगे सीमेंट की टूटी टंकी है। वो कुत्तों को रोज़ खाना देते हैं, सुबह-शाम। पर किसी से बोलते नहीं।"
मेरा दिल एक पल टीपा।
बिजलीघर के पीछे। झोपड़ी। लकड़ी के जूते।
मैंने टिंकू को याद किया — कल रात उसने कहा था कि छत पर टैंक के ढक्कन पर कोई ईंट रखी थी और वो हिला भी नहीं था। और हम सब बक्सों की तरफ़ देख रहे थे, दरवाज़े की तरफ़ नहीं।
"सानिया।" मैंने कहा। "वो बाबा लकड़ी के जूते पहनते हैं?"
सानिया के चेहरे का रंग उड़ गया।
"आपको कैसे पता?"
मैंने कोई जवाब नहीं दिया।
मैंने गुड्डू की टार्च उठाई और सीधा नाली के पार, अंधेरे की तरफ़ चल दिया।
"उस्ताद!" सानिया पीछे से चिल्लाई। "हम भी चलें?"
"तुम यहीं।" मैंने पीछे मुड़कर कहा। "कुत्तों को खाना खिलाओ। और अगर कोई आए, सीटी बजा देना। समझे?"
"कौन आएगा?"
"कोई भी।" मैंने कहा। "कोई भी आए।"
मैं चल पड़ा।
झोपड़ी गली के पीछे थी, उस जगह के बाद जहाँ सीमेंट की पुरानी पट्टियाँ खत्म होती हैं। वहाँ कोई रास्ता नहीं था, सिर्फ़ कुचली मिट्टी और ईंट के टुकड़े। टिन के चार टुकड़े एक कोने पर टिकाए हुए थे, ऊपर से पुरानी तिरपाल पड़ी थी। दरवाज़े की जगह एक बंधा हुआ कपड़ा। और सामने, एक टूटी टंकी जिसमें काई जमी थी और जिसके नीचे की मिट्टी में पानी की पुरानी लकीरें बनी हुई थीं।
मैं रुका।
पर्दे के पीछे से कोई आवाज़ नहीं आ रही थी। न बत्ती, न हलचल। बस एक बहुत पुरानी सी गंध आ रही थी — जली लकड़ी, बासी रोटी और कुछ और, जो मैं पहचान नहीं पाया। वो गंध मुझे छोटा कर रही थी। जैसे वो घर न होकर किसी का छोड़ा हुआ कोना हो।
मैंने धीरे से आवाज़ दी।
"बाबा?"
कोई जवाब नहीं।
"बाबा, मैं आपसे बात करना चाहता हूँ।"
अंदर से एक हल्की सी खड़खड़ आई। जैसे कोई उठा हो और फिर रुक गया हो।
"मेरे पास कुछ नहीं है।" एक दबी, फटी आवाज़ आई। "जाओ।"
"मुझे कुछ नहीं चाहिए।" मैंने कहा। "बस बात।"
"कौन हो?"
मैंने साँस ली।
"मैं शंकर यादव का बेटा हूँ।"
अंदर पूरी तरह चुप्पी छा गई।
फिर पर्दा हिला। धीरे से, काँपते हुए। और उसमें से एक बूढ़ा चेहरा बाहर आया। अस्सी के पार, शायद पचासी के। झुर्रियाँ जैसे पुरानी मिट्टी की दरारें। सिर पर सफ़ेद बाल, बिखरे। आँखें छोटी, पर तेज़। और मुझे देखकर वो एक कदम पीछे हट गए।
"तुम —" उनकी आवाज़ काँपी। "तुम शंकर के —?"
"हाँ।"
"झूठ।"
"नहीं।"
"तो फिर —" उन्होंने मेरा चेहरा गौर से देखा। बहुत गौर से। जैसे किसी पुराने फोटो को पहचानने की कोशिश कर रहे हों। "तेरी आँखें।" उन्होंने धीरे से कहा। "यादव की आँखें।"
और फिर — जो हुआ, वो मुझे उम्मीद नहीं थी।
बाबा ने एक हाथ अपने मुँह पर रखा और दीवार का सहारा लिया। उनके पैर लकड़ी के जूतों में थे, और हल्की सी ढलान पर वो डगमगा गए।
मैंने आगे बढ़कर उनका हाथ थाम लिया।
"बाबा, बैठिए।"
"मैंने कुछ नहीं किया।" वो फुसफुसाए। "भगवान कसम, मैंने कुछ नहीं किया। मैंने बीस साल से उन बक्सों को छुआ भी नहीं। बस देखा। बस देखा।"
मैंने उन्हें टंकी के किनारे बैठाया।
"बाबा, धीरे।" मैंने कहा। "कोई आपसे कुछ नहीं कह रहा।"
"फिर तुम क्यों आए?"
"क्योंकि मुझे कुछ जानना है।"
"मैं देखते ही पहचान गया था।" बाबा ने धीरे से कहा। "कल रात। तेरे पापा। उसी चाल से आ रहे थे। वही झुकी हड्डियाँ। वही — वही तेरे दादा की तरह सिर झुकाए।"
मेरा दिल ज़ोर से धड़का।
"कल रात।" मैंने दोहराया।
"हाँ।" बाबा ने कहा। "कल रात।"
मैं चुप हो गया।
बाबा ने अपने हाथ मिलाए। हाथ में चमड़ा था — पुराना, काला, दरारों वाला। और पैरों में — पैरों में वही लकड़ी के जूते थे। मैंने उन्हें देखा। बाबा ने मेरी नज़र पकड़ ली और पैर पीछे कर लिए।
"बाबा।" मैंने कहा। "आप बिजलीघर के चौकीदार थे?"
वो कुछ देर मेरी तरफ़ देखते रहे। फिर उन्होंने एक लंबी साँस ली — जैसे कोई हिसाब पूरा हो रहा हो।
"बीस साल।" उन्होंने कहा। "बीस साल पहले तक। फिर हमें हटा दिया।"
"किसने?"
"जिनके हाथ सब जगह थे।" बाबा ने कहा। "उस वक़्त तो कोई नाम नहीं बोलता था। बस इतना कि अब तुम्हारी ज़रूरत नहीं। और हमारी कुर्सी उठा दी गई। मेरी चौकीदारी। मेरी नौकरी। मेरा घर — वो भी उसी जगह के साथ जुड़ा था।"
"तो आप यहाँ कैसे?"
"कहाँ जाता?" बाबा ने पूछा। "न कोई बेटा। न कोई बहू। न कोई नाम। सिर्फ़ कुत्ते थे कुछ। वो भी मेरे साथ रह गए।"
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। घंटी अचानक गरम हो गई — बिना आवाज़, बस गरम।
"बाबा।" मैंने कहा। "कल रात पापा आपके पास आए थे?"
बाबा की आँखें भर आईं।
"मैंने उन्हें रोका।" उन्होंने कहा। "मैंने कहा, शंकर, ये तेरी जगह नहीं है।"
"और पापा ने क्या कहा?"
"कुछ नहीं।" बाबा ने कहा। "बस मुस्कुराए। और फिर सीधे फाटक की तरफ़ चले गए। मैं पीछे-पीछे गया। फाटक खुला था। ऊपर ताला लटक रहा था। वो अंदर गए।"
"आप अंदर नहीं गए?"
"मैं नहीं गया।" बाबा ने कहा, और उनकी आवाज़ में कुछ ऐसा था जो मुझे अंदर तक चुभ गया। "बीस साल से मैं उन बक्सों को दूर से देखता आया हूँ। छुआ नहीं। एक बार भी नहीं।"
"क्यों?"
"क्योंकि जो उन्हें छूता है," बाबा ने कहा, "वो अपनी आवाज़ नहीं पाता।"
हवा चली। पीपल की पत्तियाँ दूर कहीं बजीं, और उनकी आवाज़ एक पल के लिए इस छोटी सी जगह में भर गई।
बाबा ने मेरी तरफ़ देखा।
"तेरे पापा ने छुआ।" उन्होंने कहा। "दोनों हाथों से।"
मैंने आँखें बंद कर लीं।
"फिर?"
"फिर बक्से से एक आवाज़ आई।" बाबा ने कहा। "बूढ़ी। बहुत बूढ़ी। औरत की। जैसे किसी ने बहुत सालों से बात नहीं की हो।"
मैंने आँखें खोलीं।
"उसने क्या कहा?"
बाबा ने अपने हाथ मिलाए और उन्हें गोद में रख लिया।
"उसने तेरे पापा से उनका नाम माँगा।"
मेरी साँस एक पल रुक गई।
"नाम?"
"हाँ।" बाबा ने कहा। "उसने कहा — शंकर, अपना नाम बता।"
"और पापा?"
बाबा ने धीरे से, बहुत धीरे से कहा:
"तेरे पापा हँसे।" उनकी आवाज़ फिर काँपी। "मैं उस हँसी को नहीं भूलूँगा। वो कोई मज़ाक की हँसी नहनहीं थी।
वो हँसी ऐसी थी जैसे कोई बरसों बाद अपने ही घर का दरवाज़ा खोलकर अंदर झाँक रहा हो। जैसे उसे पता हो कि अंदर क्या रखा है, और फिर भी वो देखना चाहता हो कि अब भी वहीं है या नहीं।
बाबा ने अपने दोनों हाथ गोद में रख लिए। उनकी उँगलियाँ हिल रही थीं।
"और फिर तेरे पापा ने कहा —" बाबा ने आवाज़ नीची करके, जैसे कोई बहुत पुराना मंत्र पढ़ रहे हों, "मेरा नाम? मेरा नाम तो पहले ही तुम्हारा है। अब बेटे का मत माँगना।"
मेरी छाती के अंदर कुछ ऐसा खिंचा जैसे कोई पुराना तार अचानक टूट गया हो।
मैंने बाबा की तरफ़ देखा। उनका चेहरा छोटे से दीये की रोशनी में आधा अंधेरे में था, आधा पीले में। और उनकी आँखों में पानी था।
"बाबा।" मेरी आवाज़ सूख गई थी। "उसके बाद?"
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