The Mysterious Bell – Chapter 740
मैंने चश्मा नहीं छुआ। मैंने घंटी नहीं छुई।
मैंने बस बैठकर सोचा।
उस बूढ़ी औरत के हाथ। हरी चूड़ी। वो दबी हुई रोने की आवाज़। वो सफ़ेद दीवार। वो गलियारा।
कहानी में एक औरत थी — जिसका नाम आधा कटा है। जो अस्पताल से जुड़ी है। जो ज़िंदा है। और जिसका दर्द इस घर में पीढ़ी-दर-पीढ़ी आया है।
मैंने सोचा — क्या ये वही औरत है जिसका अंगूठा उस आधी जली रसीद पर था?
माँ ने कहा था — ये अंगूठा पापा का नहीं है। किसी औरत का है।
अब मैं जान रहा था कि वो औरत कौन हो सकती है।
पर मुझे नाम नहीं पता था। मुझे सिर्फ़ उसकी चूड़ी का रंग पता था। और उसका दर्द।
मैंने आँखें बंद कीं।
"घंटी।" मैंने धीरे से कहा।
मेज़ पर घंटी से एक छोटी सी आवाज़ आई।
"क्या?"
"अगर मैं उस औरत को ढूँढूँ — तो वो मुझे क्या देगी?"
घंटी चुप रही।
"पहले वो तुझे कुछ देगी या नहीं, ये मत सोच।" उसने कहा। "पहले ये सोच — जब तू उसके सामने खड़ा होगा, तू उससे क्या कहेगा?"
मैं कुछ देर चुप रहा।
"मैं ये नहीं कहूँगा कि तुम्हारा दर्द मैं समझता हूँ।" मैंने कहा। "क्योंकि मैं नहीं समझता। मैं बस ये कहूँगा कि मैं देख आया हूँ। और मैं उसे ढोने के लिए नहीं आया। मैं उसे रखने के लिए आया हूँ।"
घंटी ने छोटी आवाज़ दी।
"ठीक है।" उसने कहा।
और फिर कुछ देर बाद, बहुत धीमी आवाज़ में, जैसे सोते-सोते बोल रही हो —
"वो औरत जो तेरे दर्द में थी — वो तुझे ढूँढ रही है।"
मैंने आँखें खोलीं।
"क्या?"
"बरसों से।" घंटी ने कहा। "वो भी तुझे ढूँढ रही है। बस उसे पता नहीं कि तू यहाँ है। वो तेरे दादा को ढूँढ रही है।"
मैं उठ खड़ा हुआ।
"दादा — दादा तो पच्चीस साल पहले —"
"हाँ।" घंटी ने कहा। "और वो औरत आज भी उससे मिलने की उम्मीद में इस शहर में है।"
मेरी साँस रुक गई।
"घंटी।" मैंने कहा। "वो औरत कौन है?"
घंटी ने आवाज़ नहीं दी।
बस एक छोटी सी झंकार आई — बहुत हल्की, जैसे किसी दूर के मंदिर में कोई घंटी बजी हो।
मैंने मेज़ की तरफ़ देखा।
घंटी वहीं थी। चुप। ठंडी। जैसे कुछ सोच रही हो।
"घंटी।" मैंने दोबारा कहा। "वो कौन है?"
और तभी — बिल्कुल साफ़ नहीं, दबी हुई, पर पहचानने लायक आवाज़ में — घंटी ने कहा —
"वो तेरी दादी है, अंकुश।"
मैं जम गया।
"क्या?"
"वो औरत जो तेरे दर्द में थी।" घंटी ने कहा। "वो तेरी दादी है। जगदीश यादव की बीवी।"
मेरे हाथ ठंडे हो गए।
मेरी दादी।
पर दादा की बीवी तो — माँ ने कहा था — दादा के मरने से पहले ही कहीं चली गई थी। किसी और गाँव। किसी और शहर। कोई नाम नहीं। कोई फोटो नहीं।
"माँ ने कहा था वो चली गई थी।" मैंने कहा। "गुज़र गई थी।"
"माँ को झूठ बोला गया था।" घंटी ने कहा। "तेरी दादी मरी नहीं। वो चली गई। और वो आज भी ज़िंदा है। इसी शहर में।"
मैं दीवार का सहारा लेकर खड़ा रह गया।
मेरी दादी।
उसका दर्द। उसकी हरी चूड़ी। उसका आधा कटा नाम।
"तो वो — वो पापा की —"
"तेरे पापा की माँ।" घंटी ने कहा।
मेरे पैरों के नीचे ज़मीन खिसक गई।
और मुझे एहसास हुआ कि आज रात, मेरा पूरा परिवार — जो कभी पूरा था — उसका एक हिस्सा इसी शहर में कहीं ज़िंदा है, और वो मुझे नहीं जानती। और मैं उसे नहीं जानता।
मैंने धीरे से कहा, "कहाँ?"
"यही तो सवाल है।" घंटी ने कहा। "और इसका जवाब तू अभी नहीं खरीद सकता। इसके लिए तुझे जोड़ना पड़ेगा। एक बड़ा जोड़। बहुत बड़ा।"
"कितना बड़ा?"
"अंकुश।" घंटी ने कहा। "तेरे घर का सबसे बड़ा टूटा हुआ रिश्ता यही है। और उसे जोड़ने के लिए तुझे उसे ढूँढना पड़ेगा — और उसे तब ढूँढना पड़ेगा जब तू ये नहीं जानता कि वो तुझे देखकर खुश होगी या फिर भाग जाएगी।"
मैं मेज़ के पास आया।
मैंने घंटी अपने हाथ में उठाई।
वो गरम थी। पहली बार उस रात — गरम।
"ठीक है।" मैंने कहा। "मैं उसे ढूँढूँगा।"
बाहर गली में हवा चली, और पीपल की पत्तियाँ बज उठीं — जैसे कोई दूर से ताली बजा रहा हो।
मीरा ने बाहर से आवाज़ दी, "अंकुश? तूने कुछ कहा?"
मैंने खिड़की खोली।
मीरा बाहर खड़ी थी। उसके हाथ में कैमरा नहीं था। बस एक छोटी सी डायरी थी।
"मीरा।" मैंने कहा। "कल सुबह मेरे पास एक काम है।"
"क्या?"
"मुझे अपनी दादी को ढूँढना है।" मैंने कहा।
मीरा की डायरी हाथ से गिर गई।
और मेरी जेब में, बिना छुए, घंटी फिर बजी — हल्की, धीमी, आधी हँसी जैसी।
मैंने आसमान की तरफ़ देखा।
"माँ।" मैंने धीरे से कहा। "तुमने ये क्यों छुपाया?"
और सवाल हवा में लटक गया — बिना जवाब, बिना ठिकाना, बस एक छत के नीचे, जहाँ आज रात कोई अकेला नहीं सो रहा था — और मैं जान गया था कि कल से कोई भी अकेला नहीं रहेगा। क्योंकि जिस घर में एक औरत का दर्द पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलता है — वो घर कभी खत्म नहीं होता। बस उसका नाम बदल जाता है।
और मैं उस नाम को ढूँढने निकलूँगा।
॥
सुबह पाँच बजे मेरी आँख अपने आप खुल गई। बिना अलार्म। बिना किसी के बुलाए। जैसे अंदर किसी ने घड़ी की सुई घुमा दी हो और मुझे बता दिया हो कि आज देर करने का दिन नहीं है।
मैं चारपाई पर बैठ गया। कमरे में वो पुरानी गंध थी — ग्रीस, लोहे की धूल और उस चश्मे की गंध जो मैंने कमीज़ की जेब में रखा था। मैंने जेब टटोली। कपड़े में लिपटा चश्मा वहीं था। ठंडा।
मेज़ पर घंटी पड़ी थी। मैंने देखा — वो चुप थी। न गरम, न ठंडी। बस ऐसी, जैसे सो रही हो।
मैंने बाहर झाँका।
गली में अभी अंधेरा था। सिर्फ़ पीपल के नीचे एक छोटी सी लालटेन जल रही थी — वो भी किसी बुज़ुर्ग ने देर रात जलाई होगी और बुझाना भूल गया। उस पीली रोशनी में पत्थर की चबूतरी ऐसी दिख रही थी जैसे कोई बैठा हो और मुँह छिपाए हो।
मैंने हाथ-मुँह धोया। पानी ठंडा था, और उस ठंडक ने मुझे जगा दिया। सपना नहीं था। सच था। मेरी दादी ज़िंदा है। इसी शहर में। और उसका नाम किसी को नहीं पता।
मैंने घंटी उठाई और जेब में रख ली।
"आज तू मेरे साथ चलेगी।" मैंने कहा। "चुप रहना। बोलना हो तो बोलना, पर ज़्यादा मत बोलना। आज मेरे सवाल ज़्यादा हैं।"
घंटी चुप रही।
"और हाँ," मैंने कहा, "अगर तुझे कुछ पता है और तू मुझे नहीं बता रही — तो आज कम से कम ऐसा मत करना कि मैं गलत जगह जाकर खड़ा रहूँ। समझी?"
घंटी चुप रही।
मैंने शटर खोलकर बाहर निकला। गली में ठंडी हवा चल रही थी। दूर कहीं से अज़ान की आवाज़ आ रही थी। किसी घर से चूल्हे की खड़खड़। कोई बुज़ुर्ग खाँस रहा था — वो खाँसी जो पुराने लोगों की होती है, जैसे हड्डियाँ एक-दूसरे से बात कर रही हों। और उसके ऊपर, बहुत पतली सी, कुत्तों के रोने की आवाज़।
मैंने सिर उठाया।
पीपल के उस पार, नाली के किनारे, चार छोटी-छोटी परछाइयाँ एक जगह झुकी हुई थीं। टार्च की रोशनी कभी इधर, कभी उधर।
मैं वहीं चल पड़ा।
सानिया पहले दिखी। उसके हाथ में टिफ़िन था। गुड्डू झुका हुआ था, रफ़ीक़ का सिर टार्च के नीचे, और चिंटू — चिंटू पूरी तरह घुटनों पर बैठा था और किसी चीज़ से बातें कर रहा था। जैसे कोई बूढ़ा आदमी अपने पोते से बातें करता है, ऐसे।
"अरे।" मैंने कहा। "पाँच बजे? ये स्कूल जाने का वक़्त है या जासूसी का?"
सानिया एकदम सीधी हो गई।
"उस्ताद!"
"क्या कर रहे हो?"
उसने टिफ़िन दिखाया। "खाना।"
"किसको?"
"कुत्तों को।" चिंटू ने कहा। "गली के पीछे। बूढ़े बाबा खिलाते हैं रोज़।"
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