The Mysterious Bell743 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 743

7 min read November 5, 2026

टिंकू ने मेरा हाथ और ज़ोर से पकड़ लिया।

"उस्ताद।" उसने फुसफुसाया। "अगर पापा जी ने खुद कहा कि चौथा दरवाज़ा मत खोलना — तो ज़रूर वो दरवाज़ा खुल ही रहा है।"

मैंने टिंकू की तरफ़ देखा।

पर बाबा ने पहले ही कह दिया था जो मैं सोच रहा था।

"बेटा।" बाबा ने कहा। "दरवाज़ा जो बंद हो, उसे खोलने से मना किया जाता है। और दरवाज़ा जो खुद खुल रहा हो — उसके लिए कोई नहीं कहता, मत खोलना।"

मेरी जेब में घंटी बजी।

एक बार। धीमी।

टिंकू ने मेरी जेब की तरफ़ देखा।

"फिर से?" उसने पूछा।

"फिर से।" मैंने कहा।

"क्या कहा?"

मैंने घंटी को जेब से निकाला। वो गरम थी। नारंगी-सी। मैंने उसे कान के पास लाया। बाबा भी कान झुका लाए, जैसे उन्हें भी सुनना हो।

पर घंटी ने कुछ नहीं कहा। बस एक झंकार आई। जैसे कोई गली के मोड़ से हाथ हिला रहा हो।

मैंने घंटी को जेब में रख लिया।

"बाबा।" मैंने कहा। "एक आख़िरी बात। आपने उस रात बक्से से जो आवाज़ सुनी — वो औरत की थी। क्या आपने उसे पहले कभी सुना था?"

बाबा कुछ देर चुप रहे।

फिर धीरे से बोले, "एक बार।"

मेरी साँस रुकी।

"कब?"

"बहुत पहले।" बाबा ने कहा। "जब मैं नया-नया चौकीदार बना था। उस रात भी बक्से से कोई आवाज़ आई थी। मैंने डरकर दरवाज़ा बंद कर दिया था। सुबह देखा — बक्सों के पीछे वाला कमरा खुला था। अंदर से एक बूढ़ी औरत निकली थी। नीचे नहीं देखा उसने। मेरी तरफ़ नहीं देखा। जैसे मैं वहाँ था ही नहीं।"

"और फिर?"

"और फिर वो गली से बाहर चली गई।" बाबा ने कहा। "सिर्फ़ उसकी चूड़ी की आवाज़ बची थी। हरी शीशे की चूड़ी।"

मेरे रोंगटे खड़े हो गए।

हरी शीशे की चूड़ी।

वो चूड़ी मैंने देखी थी। छिपी पीड़ा वाली परत में। बूढ़े झुर्रीदार हाथों की कलाई पर।

"बाबा।" मेरी आवाज़ भर्रा गई। "वो औरत — वो कौन थी?"

बाबा ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में कुछ ऐसा था जो बहुत पुराना था और बहुत गहरा।

"मुझे नाम नहीं पता।" उन्होंने कहा। "पर याद है। एक बार मैंने उसे रोका था। मैंने पूछा — माँ, आप कौन हैं? और वो रुकी। मुड़ी। और उसने मुझे देखा।"

बाबा की आवाज़ धीमी हो गई।

"फिर उसने कहा — मैं उस आदमी की औरत हूँ जो इन बक्सों में बंद है। और मेरा नाम वो भूल गया।"

मेरी आँखों में पानी आ गया।

भूल गया। दादा भूल गए। दादी का नाम।

इसीलिए माँ ने कहा था कि दादी मर गई। इसीलिए पापा हँसे थे और बोले थे — मेरा नाम तो पहले ही तुम्हारा है। इसीलिए दादी आज भी शहर में है, और हमें नहीं जानती, और हम उसे नहीं जानते।

दादा ने उसका नाम भुला दिया। तो उसने अपना नाम खुद ही कहीं छिपा दिया। चौकीदार के रजिस्टर में। अस्पताल की फाइल में। पुराने काग़ज़ों में।

मैंने अपने आँसू पोंछे।

"बाबा।" मैंने कहा। "आपने उसका नाम कभी सुना?"

बाबा कुछ देर चुप रहे।

"एक बार।" उन्होंने कहा। "बस एक बार। उसने अपना नाम नहीं बताया। पर जब वो जा रही थी, तो उसने एक बात कही थी जो मैंने आज तक नहीं भूली।"

"क्या?"

"उसने कहा — अगर कभी जगदीश का कोई आए, तो कहना कि मैंने इंतज़ार किया।" बाबा की आँखों से आँसू बहने लगे। "और अब तक इंतज़ार कर रही हूँ।"

मेरी छाती फटने लगी।

मैं उठ गया। घंटी जेब में धक-धक कर रही थी।

"बाबा।" मैंने कहा। "मैं उसे ढूँढूँगा।"

"ढूँढेगा।" बाबा ने कहा। "पर ढूँढने से पहले — उस चौथे दरवाज़े का पता लगा। क्योंकि तेरे पापा ने उसी रात बक्से से बाहर आकर वो बात कही थी। जिस रात बक्से ने उनसे नाम माँगा था।"

"उसका क्या मतलब?"

बाबा ने मेरी तरफ़ देखा।

"मतलब ये कि तेरे पापा को कुछ पता चला था।" उन्होंने कहा। "और वो कुछ चौथे दरवाज़े से जुड़ा था। इसीलिए वो अकेले आए। इसीलिए वो तुम्हें नहीं बताना चाहते थे। क्योंकि वो जानते थे कि अगर तुम्हें पता चलेगा, तो तुम पहले दरवाज़ा खोलोगे और बाद में सोचोगे।"

मुझे सुशीला यादव की बात याद आई — बंद दरवाज़ा खोलते वक़्त मुझे साथ रखना।

माँ ने भी जान लिया था। शायद इसीलिए उन्होंने वो बात कही थी।

मैंने बाबा के पैर छुए।

वो कुछ कहने लगे, पर मैंने उनका हाथ पकड़ लिया।

"बाबा।" मैंने कहा। "अब आपको अकेले नहीं रहना। इस झोपड़ी में कोई भी नहीं आता?"

"कुत्ते आते हैं।" उन्होंने कहा। "और सुबह एक बुढ़िया आती है, रोटी दे जाती है।"

"कौन?"

"पता नहीं।" बाबा ने कहा। "बीस साल से आ रही है। कभी मुँह नहीं दिखाया। बस रोटियाँ रख जाती है और चली जाती है।"

मैंने टिंकू की तरफ़ देखा।

टिंकू ने आँखें बड़ी कर लीं।

"उस्ताद।" उसने धीरे से कहा। "आपकी दादी?"

मेरा दिल धक-धक करने लगा। मैंने बाबा की तरफ़ देखा।

"बाबा।" मैंने कहा। "वो औरत कब आती है?"

"सूरज निकलने से पहले।" बाबा ने कहा। "अभी सुबह होने ही वाली है।"

मैंने बाहर देखा।

अंधेरे के किनारे पर एक पतला-सा पीलापन आ रहा था।

मैंने टिंकू का हाथ पकड़ा और बाहर की तरफ़ बढ़ा। पर दरवाज़े पर रुक गया।

"बाबा।" मैंने कहा। "आपने उस रात जो आख़िरी बात सुनी थी — बक्से की आख़िरी बात — वो क्या थी?"

बाबा ने मेरी तरफ़ देखा।

दीये की लौ एक पल के लिए झुकी, जैसे हवा चली हो।

"वो बात तेरे पापा के जाने के बाद नहीं आई।" बाबा ने कहा। "वो बात उससे पहले आई थी। जब तेरे पापा अंदर गए थे और मैं बाहर खड़ा था। तब बक्से ने कुछ कहा था।"

"क्या?"

बाबा कुछ देर चुप रहे। उनकी आवाज़ जैसे गले से बाहर आने के लिए मेहनत कर रही हो।

"उसने कहा —" बाबा ने धीरे से कहा, "घर का चौथा दरवाज़ा उसके हाथ में है।"

मैं जम गया।

"किसके हाथ में?" मैंने पूछा।

बाबा ने मेरी तरफ़ देखा, और उनकी आँखों में वो अंधेरा था जो सिर्फ़ बहुत पुराने आदमी की आँखों में होता है।

"तेरे।" उन्होंने कहा। "और उसने यह भी कहा था कि तेरे हाथ में चाबी देर से आएगी। पर आएगी ज़रूर।"

मैंने अपनी मुट्ठी खोली।

काली चाबी मेरी हथेली पर थी। लाल धागा ज़र्द पड़ा हुआ। दाँते घिसे हुए।

और जब मैंने उसे ध्यान से देखा — तो चाबी के छल्ले पर, बहुत महीन, बहुत घिसे हुए, दो लकीरें और बीच में एक बिंदु बना हुआ था।

वही निशान।

जो चूल्हे के पीछे वाले दरवाज़े पर था। जो बिजलीघर के फाटक पर था। जो बक्से की भीतरी दीवार पर था। जो उस्ताद की घंटी के छल्ले पर था।

मैंने चाबी को जेब में रखा और बाहर कदम रखा।

बाहर हवा ठंडी थी। कुत्ते उठ खड़े हुए। पीछे से बाबा की आवाज़ आई।

"बेटा।"

मैं रुका।

"जब वो औरत आए," बाबा ने कहा, "तो उससे मेरा नाम लेकर मत बोलना। उससे सीधे यह कहना — जगदीश का पोता आया है।"

मैंने गर्दन हिलाई।

और फिर मैं और टिंकू उस झोपड़ी से बाहर निकल गए, और मेरी जेब में घंटी बज रही थी — तेज़, साफ़, बिना रुके।

जैसे वो किसी को बता रही हो कि मैं आ रहा हूँ।

॥

बाहर निकलते ही हवा ने मुँह पर हाथ रख दिया — ठंडी, गीली, और उसमें वो गंध थी जो सिर्फ़ सुबह होने से पहले आती है। जब दुनिया जागी नहीं होती, और रात कोई चीज़ छिपाने की जल्दी में होती है।

कुत्ते उठ खड़े हुए। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, फिर टिंकू की तरफ़, और फिर बिना भौंके एक तरफ़ हट गए — जैसे वो जानते हों कि आज सुबह किसी को रास्ता दे रहे हैं।

मेरी जेब में घंटी बज रही थी। तेज़। साफ़। बिना रुके।

टिंकू ने धीरे से कहा, "उस्ताद, ये इतनी ज़ोर से क्यों बज रही है?"

"पता नहीं।" मैंने कहा। "पर जब ये ऐसे बजती है, तो या तो कोई चीज़ आ रही होती है, या कोई जा रहा होता है।"

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