The Mysterious Bell737 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 737

7 min read November 5, 2026

बबलू का पान चबाना रुक गया। मैंने उसे चबाते हुए कभी नहीं देखा था, कम से कम मेरे सामने तो नहीं। आज भी नहीं चबा रहा था। और शायद यही सबसे बड़ी बात थी।

"मुझे रोज़ रात लगता है कि जब मशीन आएगी, तब मैं वहाँ खड़ा रह जाऊँगा। बस खड़ा। हाथ जेब में। और मेरी दुकान, मेरी गली, मेरा पीपल — सब चला जाएगा, और मैं कुछ नहीं कर पाऊँगा। मुझे लगता है कि मैं ताक़तवर नहीं हूँ। मुझे लगता है कि मैं सिर्फ़ शोर करना जानता हूँ। और एक दिन सबको पता चल जाएगा कि मैं शोर के अलावा कुछ नहीं हूँ।"

चुप्पी।

लंबी चुप्पी। इतनी लंबी कि नीम के पत्तों की आवाज़ सुनाई दे रही थी।

फिर बबलू ने अपना पान का डिब्बा जेब से निकाला। खोला। बंद किया। वापस जेब में रखा। और उसका हाथ काँप रहा था।

"तू झूठ नहीं बोल रहा।" उसने कहा। आवाज़ फटी हुई थी, जैसे बहुत देर से इस्तेमाल न हुई हो।

"नहीं।"

"मुझे पता है तू झूठ नहीं बोल रहा।" उसने कहा। "क्योंकि मैं भी वही सोचता हूँ। रोज़ रात।"

उसने अपने हाथ देखे। मोटे हाथ, सोने की अंगूठियों से भरे, और उनमें से एक अंगूठी घूम रही थी — अपने आप नहीं, वो उसे घुमा रहा था।

"मैंने एक रात बक्सा खुला देखा था।"

मैंने साँस रोक ली।

"कब?"

"डेढ़ महीने पहले। साहब ने बुलाया था, रात को। कहा कुछ काग़ज़ लेने हैं। मैं गया। बिजलीघर का फाटक खुला था, और अंदर आख़िरी बक्से के सामने साहब खड़े थे। मैं दूर रुक गया, क्योंकि मुझे अंदर जाने की इजाज़त नहीं थी। मैंने सुना — साहब ने कहा, एक और टूटन चाहिए।"

"एक और टूटन।"

"हाँ। और फिर बक्से ने जवाब दिया।"

"क्या कहा?"

बबलू ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो चीज़ थी जो आदमी के चेहरे पर तब आती है जब वो कोई बात बहुत दिनों से पी रहा हो और अब उसे उगलना है।

"मैं समझा नहीं।" उसने कहा। "आवाज़ समझ में नहीं आई। पर वो एक औरत की आवाज़ थी। बहुत धीमी। बहुत थकी हुई। जैसे कोई बहुत दूर से बोल रहा हो — इतनी दूर से कि शब्द आधे रास्ते में ही मर जाएँ।"

"कितने शब्द?"

"तीन। शायद चार।" उसने कहा। "मैंने सुना — मेरा। फिर कुछ — जो मेरा नहीं। फिर बहुत दूर से एक लंबी साँस, जैसे कोई पानी से ऊपर आया हो।"

मेरी जेब में घंटी गरम हुई।

फिर ठंडी।

फिर बोली, इतना धीमा कि बबलू ने सुना या नहीं, मुझे नहीं पता —

"वो नाम माँगता है।"

मैंने आँख बंद की।

"बबलू।" मैंने कहा। "उस रात के बाद?"

"उस रात के बाद मैं सोया नहीं।" उसने कहा, सीधा, बिना शर्म के। "रोज़ रात छत पर जाता हूँ। चारपाई पर लेटता हूँ, पर आँख नहीं लगती। छत देखता रहता हूँ। पूरी रात। सुबह चिड़िया बोलती है, तब जाकर नींद आती है। मेरी बीवी कहती है तू बदल गया है। मैं कहता हूँ नहीं, मैं वही हूँ। पर सच ये है — मैं वही नहीं हूँ। उस रात के बाद मैं अंदर से वही नहीं हूँ।"

फिर वो रोया।

बबलू पांडे रोया। मोटा आदमी, सोने की चेन, गली का डर। वो बैठा रोया, हाथों में मुँह छिपाकर, और किसी ने कुछ नहीं कहा। मैंने भी नहीं। मीरा ने कैमरा जेब में रख दिया — ये बात मैंने देखा, और आज तक नहीं भूला।

शबनम आपा ने तब कहा। वो पीछे खड़ी थीं, चिमटी हाथ में, और उन्होंने बहुत देर से बोला, पर जब बोलीं तो ऐसे जैसे गली की मिट्टी बोल रही हो।

"सुनो सब।" उन्होंने कहा। "जो आवाज़ें कब्र में नहीं रहतीं, वो आदमी के सीने में रहती हैं। तुम लोगों को वहाँ जाना ही नहीं चाहिए था।"

"तो क्या करें?" सानिया ने कहा। "हमें पापा चाहिए।"

"पापा तुम्हें मिलेंगे।" शबनम आपा ने कहा। "पर उस जगह से नहीं, जहाँ तुम उन्हें ढूँढ रहे हो। वहाँ तुम्हें सिर्फ़ वो मिलेगा जो तुम्हें ढूँढ रहा है।"

रात नौ बजे मैं घर पहुँचा।

माँ बैठी थीं आँगन में, बैसाखी के सहारे कुर्सी पर, और उनके सामने चारपाई पर काजल की नर्सिंग की किताबें खुली थीं।

माँ ने मेरी तरफ़ देखा और कुछ नहीं पूछा। बस कहा—

"सबको बुला।"

"माँ—"

"सबको बुला, अंकुश।" उन्होंने कहा। "जब घर में कोई चीज़ आती है, तो सबको एक जगह बैठना पड़ता है। मैंने तेरे पापा की माँ को यही करते देखा था। पता नहीं क्यों, पर मुझे आज याद आ रहा है।"

रात दस बजे हमारे घर के बड़े कमरे में गली के लोग बैठे थे। मैं, माँ, काजल, मीरा, नदीम, टिंकू उसकी माँ लक्ष्मी देवी के साथ, सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़, चिंटू, उस्ताद अली बक्श, शबनम आपा और रज़िया।

दो चारपाइयाँ जोड़ी गई थीं। कोई बिस्तर लगाकर नहीं सोया।

माँ ने कहा — और मैंने उन्हें पहली बार ऐसे बोलते देखा —

"आज कोई अकेला नहीं सोएगा। न कोई अकेला पानी लेने जाएगा, न कोई अकेला दरवाज़ा खोलेगा, न कोई अकेला बाहर जाएगा। अगर किसी को कुछ सुनाई दे, तो चुपचाप सबको बताएगा। और हाँ — जो आदमी छुपाएगा, वो मेरे हाथ से खाएगा नहीं।"

काजल ने कहा, "माँ, मैं आज अस्पताल नहीं जाऊँगी।"

"क्यों?"

"क्योंकि आज मुझे घर में रहना है।" काजल ने कहा। "दवा का डिब्बा मैंने यहाँ ले आया है। डॉक्टर इसरानी को बता दिया है। वो नाराज़ हुए, फिर बोले ठीक है, बेटी। माँ, मैं आज किसी को अपने घर में अकेला नहीं छोड़ूँगी, और ये मेरा फ़ैसला है, बहस नहीं।"

माँ ने उसका सिर छुआ। बस।

उस्ताद अली बक्श बैठे थे, चश्मा उतारकर पोंछते हुए। उन्होंने कहा, "एक बात कहूँ?"

"कहिए उस्ताद।"

"अगर घंटी से कुछ पूछना हो, तो अकेले मत पूछना।" उन्होंने कहा। "घंटी अकेले में जवाब ऐसा देती है जो तुझे चाहिए होता है। दो आदमी के सामने वो वही देती है जो सच होता है।"

मैंने उनकी तरफ़ देखा।

"आपको कैसे पता?"

"क्योंकि पचास साल पहले मैंने उससे अकेले बहुत पूछा था।" उन्होंने कहा, और चश्मा पहन लिया। "और मुझे वही जवाब मिला जो मैं सुनना चाहता था। तब मैंने सब छोड़ दिया।"

रात ग्यारह बजे।

गली बिल्कुल चुप थी। उस तरह की चुप जिसमें आवाज़ नहीं होती, पर कुछ होता है — जैसे हवा भी साँस दबाकर चल रही हो।

मैं दुकान के अंदर बैठा था। शटर आधा नीचे। मेरे सामने मेज़ पर पुरानी रिंच, पापा की माचिस और आधी जली रसीद।

और तभी।

शटर के नीचे से कुछ सरका।

धीरे से। काग़ज़ की आवाज़। जैसे कोई बाहर से झुककर, बिना जल्दी किए, एक पैकेट फ़र्श पर फिसला दे — और चला जाए।

मैं उठा नहीं।

पहले सुना। फिर देखा।

दरवाज़े के बाहर पैरों की आवाज़ नहीं थी। बिल्कुल नहीं। जैसे कोई उसे रखकर ज़मीन से उठ गया हो।

मैंने पैकेट उठाया।

पुराना काग़ज़। मोटा। दो बार मोड़ा हुआ। ऊपर कोई नाम नहीं। कोई मोहर नहीं। कोई लिखावट नहीं। सिर्फ़ काग़ज़ की वो गंध — और उसमें थोड़ी सी धूप और साबुन की गंध, जैसी उस्ताद ने कहा था।

मैंने मोड़ खोला।

पहले — चश्मा।

टेप से बँधा कान। एक काँच चटका हुआ। पुराना। पापा का चश्मा। वही चश्मा जो पिछली बार कोठरी में मिला था, फिर गायब हो गया था, और जिसके बारे में मीरा ने कहा था कि कोई उसे ले गया।

चश्मे के नीचे एक पर्ची।

छोटी। मोटे काग़ज़ पर नीली स्याही में लिखी। लिखावट झुकी हुई थी, पर साफ़।

मैंने पढ़ा।

और मेरी जेब में घंटी, पहली बार, बिना मेरे छूए, ज़ोर से बजी।

पर्ची पर लिखा था —

घंटी लाओ, नहीं तो उस औरत का नाम कल सुबह दीवार पर लिखा मिलेगा।

॥

पैकेट मेरे हाथ में था और घंटी मेरी जेब में बज रही थी — ऐसे जैसे उसने खुद कोई चीज़ देख ली हो, जो मैंने अभी देखी भी नहीं थी।

मीरा ने दुकान के बाहर से आवाज़ दी, "अंकुश? शटर के नीचे मैंने कुछ सरकते देखा। तू ठीक है?"

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