The Mysterious Bell – Chapter 736
"कौन सा दरवाज़ा?" टिंकू ने पूछा। "यहाँ कौन सा दरवाज़ा है?"
"यही तो।" मैंने कहा। "यहाँ कोई दरवाज़ा नहीं है। खिड़की है, और पीछे वो लोहे का दरवाज़ा, जिसे पिछली बार मीरा ने बंद किया था।"
मीरा की आँखें मिलीं।
हम दोनों एक साथ समझ गए।
"वो आवाज़ मुझे बंद करवाना चाहती है।" मैंने कहा। "अंदर जो कुछ है, उसे बंद नहीं करना है। उसे खोलना है।"
नदीम ने धीरे से पूछा, "लेकिन क्या?"
मैंने बक्से की तरफ़ देखा।
राख। उँगली की लकीरें। टिंकू की चप्पल।
और मुझे कुछ याद आया — वो पर्ची, जो सानिया को स्कूल स्टोर के डिब्बे से मिली थी। "जो नीचे जाएगा वो ऊपर नहीं आएगा।"
"नदीम," मैंने कहा। "चारों बक्से खोलने हैं।"
"क्यों?"
"क्योंकि जब एक बक्से में आवाज़ है, तो बाकी पाँच चुप क्यों हैं? पाँचों चुप हैं इसका मतलब — वो इंतज़ार कर रहे हैं कि मैं सिर्फ़ एक पर ध्यान दूँ और बाकी छूट जाएँ।"
मीरा ने कैमरा फिर उठाया।
"ठीक।" उसने कहा। "तो पाँचों खोलते हैं। पर नियम — सिर्फ़ देखना। कुछ उठाना नहीं।"
"और अगर कुछ उठाना पड़े?" गुड्डू ने पूछा।
"तो पहले मुझसे पूछना।" मीरा ने कहा। "मैं तराज़ू हूँ, तुम लोग तोल हो। कुछ भी छुपा के मत रखना। जो छुपाओगे, वही बाद में तुम्हें डराएगा।"
टिंकू ने मेरी कमीज़ छोड़ दी — बहुत धीरे, जैसे किसी बीमार आदमी का हाथ छोड़ते हों।
फिर वो बक्से की तरफ़ बढ़ा।
और उसके साथ-साथ, बक्से के अंदर से वो आवाज़ फिर आई।
बहुत धीमी।
सिर्फ़ दो शब्द।
जैसे कोई साँस भरकर कहे।
"बंद कर।"
टिंकू रुका नहीं। मैंने उसका कंधा थामा और अपने साथ लिया।
"पाँचों खोलते हैं।" मैंने कहा। "और आज ये बक्से जो चुप्पी छुपा रहे हैं, वो चुप्पी घर लेकर ही जाऊँगा।"
॥
"बंद कर।"
वो आवाज़ दूसरी बार आई। पर इस बार बक्से के अंदर से नहीं। पीछे से। उस लोहे के दरवाज़े के पार से, जिसे मीरा ने कोठरी बंद करते वक़्त खींचकर लगाया था।
मैंने पलटकर देखा।
दरवाज़ा वहीं था। बंद। धूल उस पर वैसी ही जमी थी, जैसी सुबह थी। पर उसकी कुंडी धीरे-धीरे हिल रही थी। ऐसे, जैसे कोई अंदर से उँगली लगाकर, बिना ज़ोर किए, सिर्फ़ यह बता रहा हो कि मैं हूँ।
चिंटू ने चीख मारी।
वो चीख ऊँची नहीं थी। छोटी थी। बिल्कुल वैसी, जैसे रात में अचानक कुत्ता भौंक दे और आदमी का दिल धक से रह जाए।
और बस। उसी एक चीख ने पूरे बिजलीघर की हवा बदल दी।
सानिया ने मेरा हाथ पकड़ा। रफ़ीक़ ने गुड्डू का कुर्ता। गुड्डू ने नदीम का बैग। और टिंकू — टिंकू ने किसी का हाथ नहीं पकड़ा। वो उल्टा आगे बढ़ गया, बक्से की तरफ़, अपनी एक चप्पल राख में पड़ी देखकर।
"टिंकू।"
वो रुका।
"मेरी चप्पल।" उसने कहा। आवाज़ सपाट थी, जैसे बुखार में बोल रहा हो। "उस्ताद, वो मेरी चप्पल है। मैंने उसे पहना था। आज सुबह। घर पर।"
"तो?"
"तो ये यहाँ कैसे आई?"
जवाब किसी के पास नहीं था। और जिसके पास जवाब नहीं होता, उसके पास डर ज़्यादा होता है।
मैंने बक्से की तरफ़ देखा। पाँच बंद बक्से। लोहे के, ऊँचे, काले, ज़ंग के फूलों से भरे। उनके ढक्कन पर पुरानी चढ़ी सील टूटी हुई। और मुझे लगा — नहीं, मुझे पक्का पता था — कि उन पाँचों के अंदर से कोई साँस ले रहा है। बहुत धीरे। एक साथ। जैसे पाँच आदमी एक ही लय में साँस लें।
घंटी मेरी जेब में ठंडी थी।
"घंटी।" मैंने धीरे से कहा। "कुछ बोल।"
और घंटी ने कहा, इतना धीमा कि सिर्फ़ मैंने सुना —
"पाँच में एक बोलेगा। बाक़ी चार का काम चुप रहना है।"
"मतलब?"
"मतलब — तू अभी नहीं जानता कि कौन सा।"
मेरी रीढ़ से ठंडी सुई सी गई।
मैंने पलटकर सबको देखा। मीरा का कैमरा अब भी चालू था, पर उसका हाथ काँप रहा था और काँपती रिकॉर्डिंग किसी काम की नहीं होती।
"बाहर।" मैंने कहा।
"क्या?" नदीम ने कहा।
"बाहर निकलो। सब। अभी।"
"अंकुश, हम आए तो थे—"
"नदीम भाई, मैं बहस नहीं कर रहा। तुम्हारे पास हकीम अली की डायरी है, मेरे पास घंटी है, और इस कमरे में हम दोनों से ज़्यादा पुरानी चीज़ें हैं। जो पुरानी चीज़ें हमसे ज़्यादा पुरानी हों, उनसे बहस नहीं करते। उनसे दूर जाते हैं।"
हम बाहर निकले।
और जब बाहर निकले, तो सूरज ढल चुका था। पुराने बिजलीघर के पीछे वाला आसमान नारंगी से बैंगनी हो रहा था, और हवा में धूल के साथ एक हल्की जली हुई गंध थी, जो बिजलीघर से नहीं, बाहर से आ रही थी।
मैंने गिनती की।
मीरा। नदीम। टिंकू। सानिया। गुड्डू। रफ़ीक़। चिंटू। और मैं।
आठ।
टिंकू के एक पैर में चप्पल थी, एक में नहीं। मैंने कहा, "तेरी दूसरी चप्पल?"
उसने पीछे देखा, फिर मेरी तरफ़। "अंदर है। राख में।"
"रहने दे।"
"पर वो मेरी—"
"टिंकू।" मैंने उसका कंधा थामा। "एक चप्पल का कर्ज़ चुकाने के लिए कोई अपनी जान नहीं लगाता। और मैं जानता हूँ, तुझे लग रहा है कि वो चप्पल वहाँ कैसे पहुँची। मुझे भी लग रहा है। पर इसी वजह से हम अंदर नहीं जा रहे। समझा?"
उसने सिर हिलाया। बहुत छोटा सा हिलाया। पर हिलाया।
फिर वो बैठ गया, ज़मीन पर, और मैंने देखा कि उसके होंठ काँप रहे हैं।
मैं भी बैठ गया। उसके सामने।
"अब सुन सब लोग।" मैंने कहा। "आज रात, या कल सुबह, या जब भी — मैं अंदर नहीं जाऊँगा।"
मीरा ने कैमरा बंद किया।
"अंकुश।"
"नहीं, सुन। मैं बहादुरी का नाटक नहीं कर रहा। मैं सच बोल रहा हूँ और सच यह है — मुझे नहीं पता कि उन पाँच बक्सों में क्या है। मुझे नहीं पता कि मेरी जेब की घंटी क्यों ठंडी है। मुझे नहीं पता कि टिंकू की चप्पल राख में किसने रखी। और जिस आदमी को ये न पता हो, उसका अंधेरे कमरे में घुसना सिर्फ़ बहादुरी नहीं — बेवकूफ़ी है। मैं बेवकूफ़ हूँ, पर इतना बेवकूफ़ नहीं।"
नदीम ने धीरे से कहा, "तो जानकारी कहाँ से आएगी?"
"उस आदमी से जो वहाँ गया था।"
"कौन?"
मैंने नीम के पेड़ की तरफ़ देखा।
"बबलू।"
सानिया ने तुरंत कहा, "वो नहीं बोलेगा। वो कभी नहीं बोलता।"
"वो बोलेगा।" मैंने कहा। "क्योंकि वो डरा हुआ है, और डरे हुए आदमी को बस एक आदमी चाहिए जो उससे पहले अपना डर बोल दे।"
शाम सात बजे, नीम के नीचे, शबनम आपा की गुमटी से लाई हुई चाय ठंडी हो रही थी। चूल्हा बंद था, इसलिए चाय रखी हुई थी, बनी हुई नहीं।
बबलू आया।
स्कूटर पर नहीं। पैदल। और पैदल आना उसके लिए बहुत बड़ी बात थी, क्योंकि बबलू पैदल चलता नहीं, घूमता है — मोटा शरीर, सोने की चेन, पान का डिब्बा, और एक ऐसी चाल जैसे गली उसकी जागीर हो।
आज वो चुप आया।
"क्यों बुलाया?" उसने कहा। "मैं कह चुका न, साहब का काम है—"
"बैठ।"
"मैं खड़ा रहूँगा।"
"बैठ जा, बबलू।" मैंने कहा। "आज कोई काग़ज़ नहीं है, कोई वकील नहीं है, कोई अंगूठा नहीं है। सिर्फ़ तू है और मैं हूँ। और सच कहूँ तो मुझे भी तेरी तरह घुटनों में कमज़ोरी लग रही है।"
वो रुका।
फिर बैठा। बेंच पर, एक कोने में, जैसे जगह कम पड़ रही हो।
"मुझे नहीं पता तू क्या पूछेगा।" उसने कहा। "पर मैं कुछ नहीं बोलूँगा।"
"मैं तुझसे सवाल नहीं पूछ रहा।" मैंने कहा।
उसने मेरी तरफ़ देखा।
"मैं तुझे अपनी बात बता रहा हूँ।" मैंने कहा। "और ये बात मैंने आज तक किसी को नहीं बताई। मीरा को नहीं, टिंकू को नहीं, माँ को नहीं।"
मीरा ने कुछ कहना चाहा, पर मैंने हाथ उठाकर रोक दिया।
"मुझे लगता है कि मैं अपना घर नहीं बचा पाऊँगा।"
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