The Mysterious Bell735 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 735

7 min read November 5, 2026

उसने पीछे देखा। बक्सों की तरफ़ नहीं — दीवार की तरफ़। जहाँ से कोई आवाज़ नहीं आ रही थी। पर वो पलटकर देख रहा था।

"किसने पुकारा?" उसने कहा।

हम सब चुप हो गए।

"क्या?"

"किसी ने मेरा नाम लिया।" चिंटू ने कहा। उसकी आवाज़ में अब हँसी नहीं थी। "चिंटू, किसी ने चिंटू कहा।"

"किसी ने नहीं कहा।" सानिया ने कहा। "तू खुद ही—"

"नहीं, मैंने सुना।" वो एक कदम पीछे आया। "दीवार के उस पार से, किसी ने चिंटू कहा।"

अगली ही घड़ी वो भागा।

भागा इतने ज़ोर से कि मेरी टाँग से टकराया और मेरा संतुलन बिगड़ा। उसने टिंकू को धक्का दिया और सीधा खिड़की की तरफ़ भागा, फिर रुका, क्योंकि खिड़की तीन हाथ ऊँची थी और उसे चढ़ना था। वो वहीं खड़ा गया — साँस फूलती हुई, दोनों हाथ घुटनों पर।

"देखा?" टिंकू की आवाज़ धीरे से आई। "मैं डरपोक नहीं हूँ।"

"हूँ मैं।" चिंटू ने साँस लेते हुए कहा। "मैं डरपोक हूँ। और अब मुझे इसका बिल्कुल बुरा भी नहीं लग रहा।"

मीरा ने यह सब नहीं रोका। उसने कैमरा चालू रखा था और शायद सोच रही थी कि सच्ची बात जब सामने आती है तो उसे रोकना नहीं चाहिए।

मैं बक्से के पास खड़ा था।

और तभी मेरी नज़र ज़मीन पर पड़ी।

बक्से के आगे, उस कोने में जहाँ खिड़की की रोशनी आती है, धूल वाली ज़मीन पर कुछ चीज़ें रखी थीं।

एक स्टील का गिलास। आधा पानी। पर पानी बहुत पुराना नहीं था — उसमें उँगली डालो तो ठंडा मिलेगा, ऐसा पानी था। गिलास के नीचे धूल में छोटा सा गोल घेरा था — जैसे गिलास वहाँ रखा हुआ घूमा हो।

उसके पास — आधी जली मोमबत्ती। पीतल के पुराने स्टैंड पर। मोम बूँदें ज़मीन पर फैली हुई थीं और फिर जम गई थीं।

और मोमबत्ती के पास — माचिस।

मेरे हाथ काँपने लगे।

मैंने उसे उठाया। माचिस की डिब्बी में अब भी कुछ दाने बचे थे। डिब्बी के पीछे पेंसिल से कुछ लिखा था — पर इतना घिसा हुआ कि पढ़ा नहीं जा रहा था। सिर्फ़ एक शब्द बचा था — "हिसाब"।

पापा की माचिस। पापा की माचिस का डिब्बा, जिसके पीछे उन्होंने हर बार कुछ लिखा करते थे। हिसाब, तारीख़, किसी का सामान, किसी का उधार। पापा का दिमाग़ हमेशा डिब्बी के पीछे चलता था।

"वो यहाँ थे।" मैंने धीरे कहा। "वो यहाँ देर तक बैठे थे।"

"कितनी देर?" नदीम ने पूछा।

मैंने आधी जली मोमबत्ती देखी। एक इंच से ज़्यादा जल चुकी थी। पानी का गिलास आधा खाली था। माचिस की डिब्बी में बची बत्तियाँ गिनकर मैंने देखा — करीब आधा खर्च हो चुका था।

"शायद पूरी रात।" मैंने कहा।

टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा।

"उस्ताद," उसने कहा, "अगर उन्होंने पूरी रात यहाँ बिताई… तो सुबह क्यों नहीं दिखे?"

यही तो सवाल था। यही सवाल मेरे सीने में चुभ रहा था।

मीरा ने कैमरा दीवार से खिसकाकर बक्से की तरफ़ किया।

"अंकुश।" उसकी आवाज़ बदल गई। "ये देख।"

मैं पास गया।

बक्से की भीतरी दीवार पर — धूल हटी हुई थी। और उस धूल हटी जगह पर, चॉक से, ताज़ी चॉक से, कुछ लिखा था।

वही नाम।

जो नाम पहले धूल में उभरता दिखा था। शंकरलाल। पर इस बार ज़्यादा साफ़। जैसे किसी ने सोच-समझकर, बराबर अक्षरों में लिखा हो।

और उसके नीचे — एक नई लाइन।

"मैं मिटाने नहीं आया।"

मैंने कुछ देर उसे देखा। कुछ समझ नहीं आया। मन में बात आई — मिटाने नहीं आया? तो फिर आया क्या करने?

"इसका मतलब?" सानिया ने पूछा। उसने अपनी कॉपी खोल ली थी और लिखने लगी थी। "लिखना है क्या — मिटाने नहीं आया। पर क्या करने आया, ये तो नहीं लिखा।"

"यही सबसे बड़ा सवाल है।" मीरा ने कहा। "जो आदमी अपना नाम मिटाने निकले, वो अगर यहाँ लिखकर जाए कि वो मिटाने नहीं आया — तो वो क्या करने आया?"

मैंने माथा खुजाया।

"सवाल पूछने?" मैंने कहा।

"किससे?"

बक्सा चुप था। दीवार चुप थी। छत भी।

नदीम ने तब कहा, जो उसने शायद काफ़ी देर से सोच रखा था।

"ये जगह किसी काग़ज़ में नहीं है।"

हम सबने उसकी तरफ़ देखा।

"इसका मतलब?"

"पुराने बिजलीघर की ज़मीन।" नदीम ने कहा। "मैंने दादा की डायरी में देखा था। बंद बिजलीघर का ज़िक्र है, पर ज़मीन किसकी है — कुछ नहीं लिखा। कोई रजिस्ट्री नहीं, कोई नंबर नहीं, कोई नाम नहीं। ये ज़मीन हवा में लटकी है।"

"हवा में लटकी ज़मीन पर बक्से रखे हैं?" गुड्डू ने पूछा।

"हाँ।" नदीम ने कहा। "और जो चीज़ हवा में लटकी हो, उस पर सबका हक़ होता है — और किसी का नहीं भी होता है। ये जगह इसीलिए चुनी गई है। क्योंकि यहाँ काग़ज़ कुछ नहीं बोलता।"

बच्चे चुप हो गए।

मीरा ने कैमरा घुमाकर दीवार से लेकर बक्सों तक सब कुछ रिकॉर्ड किया। फिर बक्से में झुककर उसने राख के किनारे पर कैमरा टिकाया।

"सोच रही हूँ," उसने कहा, "क्या ये राख किसी का नाम बताने वाली है?"

मैं बक्से के ठीक सामने खड़ा था।

और तभी — फिर वही आवाज़ आई।

बक्से के अंदर से।

मेरी ही आवाज़।

नहीं — मेरी आवाज़ जैसी आवाज़।

पर गहरी। थोड़ी दबी हुई। ऐसी जैसे कोई रिकॉर्डिंग चल रही हो जिसमें मैंने खुद कुछ बोला हो, बहुत साल पहले, और वो अभी प्ले हो रहा हो।

"तेरे पापा अंदर बैठे हैं।"

मेरे पैर जम गए।

आवाज़ फिर आई — वही।

"दरवाज़ा बंद कर।"

मैंने पीछे देखा।

सब वैसे ही खड़े थे — जैसे किसी ने सबको एक साथ जमा दिया हो।

टिंकू का चेहरा सफ़ेद था।

मीरा का कैमरा अब भी चालू था। वो हिल नहीं रही थी। उसकी आँखें सिकुड़ी हुईं थीं, जैसे कुछ सुन नहीं पा रही हो या सुनकर भी मानने को तैयार न हो।

"ये—" नदीम ने कहा।

"मेरी आवाज़ थी।" मैंने कहा। मेरा गला सूख रहा था। "मेरी ही आवाज़ थी, ना?"

नदीम ने सिर हिलाया।

"जैसी।" उसने कहा। "बिल्कुल वैसी नहीं। थोड़ी और… थोड़ी और पुरानी।"

"मैंने कभी ऐसा नहीं कहा।" मैंने कहा। "मैंने कभी ये शब्द नहीं बोले।"

"पर बोलेगा।" नदीम ने धीरे कहा। "शायद इसीलिए।"

मैंने पीछे देखा — बच्चों को।

सानिया अपनी कॉपी पकड़े खड़ी थी, रफ़ीक़ उसके पीछे छिप गया था, गुड्डू खिड़की की तरफ़ देख रहा था जहाँ से रोशनी आ रही थी, और चिंटू — चिंटू खिड़की के नीचे खाड़ा साँस रोककर मुँह पर हाथ रखकर बैठा था।

और टिंकू?

टिंकू मेरे ठीक पीछे था। कमीज़ अभी भी पकड़े हुए।

पर वो कमीज़ नीचे खिंच रही थी। पैरों की तरफ़।

मैंने नीचे देखा।

टिंकू एक पैर से नंगे पैर खड़ा था।

दूसरे पैर में चप्पल नहीं थी।

"तेरी चप्पल?" मैंने पूछा।

उसने जवाब नहीं दिया। बस आँखों से बक्से की तरफ़ इशारा किया।

मैंने मुड़कर देखा।

बक्से के अंदर।

राख के बीच।

टिंकू की एक चप्पल।

अभी-अभी रखी हुई जैसी — राख पर हल्का सा दबाव बना हुआ, कोई धूल नहीं जमी।

और मैंने उसे वहाँ रखते हुए कोई नहीं देखा।

तुम सोच रहे होगे कि ये सब इतना ठंडा क्यों लग रहा है। तो सुनो — ठंडा इसलिए लग रहा है कि अंदर जो आवाज़ बोली थी, वो मेरी ही थी। और जो चीज़ आदमी की अपनी आवाज़ में बोले, वो उससे सबसे ज़्यादा डराती है। क्योंकि तब कोई बाहरी दुश्मन नहीं होता। तुम खुद ही अपने अंदर बैठे होते हो, और तुम्हें अपने ही हाथों से डर लगने लगता है।

मीरा ने कैमरा नीचे किया।

"अंकुश।" उसने कहा। उसकी आवाज़ में कोई तेज़ी नहीं थी — सिर्फ़ बहुत सधी हुई साफ़गोई। "जो आवाज़ आई, वो कहे कि पापा अंदर बैठे हैं। मैं इसका मतलब समझ रही हूँ। पर मैं चाहती हूँ कि तू समझे भी और चुप ना रहे।"

मैंने सोचा।

"मतलब ये कि पापा वाकई इस बक्से के अंदर नहीं हो सकते।" मैंने कहा। "क्योंकि बक्सा खुला है और खाली है। जो आवाज़ आ रही है, वो मुझसे ये कह रही है कि मैं घबरा जाऊँ और दरवाज़ा बंद कर दूँ।"

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