The Mysterious Bell – Chapter 734
टिंकू उठ खड़ा हुआ।
काजल ने उसका हाथ पकड़ा।
और नदीम ने अपनी डायरी सीने से चिपकाई, और मुझसे बहुत धीरे, बहुत साफ़, इतना ही कहा —
"तुमने मुझसे पूछा था कि मैं काग़ज़ देखने आया हूँ या डराने। अब पता चला। मैं तो बहाना था। असली काग़ज़ वो है जो तुम्हारी जेब में है। और ये आदमी उसी को लेने आया है।"
॥
वो आदमी हिला नहीं। बस खड़ा रहा।
मैं जालीदार खिड़की से चिपका रहा। मेरी साँस जाली की लोहे की तारों पर ठंडी हो रही थी, जबकि बाहर पूरी धूप थी। अजीब बात है ना — धूप बाहर रहती है, ठंड अंदर आ जाती है। कुछ चीज़ें ऐसी ही होती हैं। दिखती बाहर हैं, असर अंदर करती हैं।
फिर उसने हाथ उठाया।
सिर्फ़ एक हाथ। धीरे से। कोई जल्दी नहीं। ऐसे जैसे कोई स्कूल में हाथ उठाकर पूछता है — सर, एक बात कह सकता हूँ?
उसने हमारी तरफ़ इशारा नहीं किया।
उसने गेट के पार, गली के उस मोड़ की तरफ़ इशारा किया — जिधर पुराना बिजलीघर है।
फिर हाथ नीचे किया।
फिर मुड़ा।
और नीम की छाया में चला गया। इतनी आराम से, इतने आराम से जैसे उसे पता हो कि जो चीज़ उसे चाहिए, वो उसकी तरफ़ खुद आ जाएगी।
घंटी मेरी जेब में ठंडी थी। बर्फ़ जैसी नहीं — पत्थर जैसी। जैसे कोई पुरानी चीज़ हो जो बोलना भूल गई हो।
"वो हमें बता रहा है।" मैंने धीरे से कहा।
"क्या?" टिंकू ने पूछा।
"कि पापा कहाँ हैं।"
नदीम ने अपनी डायरी सीने से चिपकाई रखी थी, पर उसकी पकड़ ढीली हो गई थी। "ये बुलावा है।" उसने कहा। "पुराने काग़ज़ों में लिखा होता है — जब दुश्मन तुम्हें रास्ता दिखाए, तो रास्ता मत देखो, उसकी उँगली देखो। उँगली किस तरफ़ मुड़ी है।"
"उँगली बिजलीघर की तरफ़ मुड़ी है।" मीरा ने कहा। उसने कैमरा ऑफ कर दिया था, अब फिर चालू किया। "और मैं वहाँ जा रही हूँ।"
"तुम अकेली नहीं जाओगी।" मैंने कहा।
"मैंने कहा भी नहीं कि अकेली।"
काजल माँ के कमरे से बाहर आई। उसके हाथ में पानी का गिलास था और आँखें लाल।
"माँ पूछ रही हैं।" उसने कहा। "पापा कहाँ हैं।"
मैंने कुछ नहीं कहा।
"मैंने कहा — पापा काम से गए हैं।" काजल की आवाज़ काँपी, पर बात साफ़ थी। "और अब मैं झूठ नहीं बोलूँगी। अगर तुम लोग जा रहे हो, तो मैं भी चलूँगी।"
"तू माँ के पास रहेगी।" मैंने कहा।
"अंकुश—"
"काजल।" मैंने उसका कंधा पकड़ा। "अगर माँ को कुछ हुआ और वहाँ कोई नहीं था, तो मैं खुद को कभी माफ़ नहीं करूँगा। तू वहीं रह। तेरा काम सबसे कठिन है। तू सबसे बड़ी नर्स है इस गली की।"
वो कुछ देर मेरी तरफ़ देखती रही। फिर धीरे से सिर हिलाया।
डॉक्टर इसरानी बरामदे के उस पार खड़े थे। उन्होंने कुछ नहीं पूछा। बस मेरे हाथ पर नज़र डाली, कहा — "शाम तक लौट आना। अस्पताल का गेट इस वक़्त खुला रहेगा, पर साँझ के बाद मैं ज़िम्मा नहीं लेता।"
"डॉक्टर साहब," मैंने कहा, "आपने माँ को बचाया था, एक बार। आज सिर्फ़ दरवाज़ा खुला रखिए। मैं पूरी गली लेकर लौटूँगा।"
वो मुस्कुराए। बूढ़ी, थकी मुस्कान। "मेरी गली है बेटा। मैं भी उसी लौटने का इंतज़ार कर रहा हूँ।"
शाम को हम निकले।
धूप ढल चुकी थी। गली में वो पीली रोशनी थी जो हर चीज़ को पुरानी फ़िल्म जैसा बना देती है। लोग दुकानें बंद कर रहे थे, पर आज सब धीरे कर रहे थे — जैसे हर शटर उतरते वक़्त दो पल रुककर सोच रहा हो कि ये आख़िरी बार तो नहीं।
भोला भाई ने हमें देखकर हाथ उठाया।
शबनम आपा ने गुमटी से बाहर झाँका, कुछ कहा नहीं, बस लोहे की चिमटी उठाई और हवा में एक इशारा किया — जैसे कहे, मैं यहाँ हूँ, दरवाज़ा खुला है।
उस्ताद अपनी दुकान के बाहर खड़े थे। उनके हाथ में छोटी फूल वाली घंटी थी। उन्होंने मुझे देखा और बहुत धीरे कहा — "मिरासी का हिसाब भारी है। संभलकर।"
टिंकू, सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू — पाँचों पीछे-पीछे आ रहे थे। सानिया के हाथ में उसकी लाल कवर कॉपी थी। गुड्डू ने जेब में माचिस रखी थी। रफ़ीक़ ने अपना टूटा चश्मा तार से बाँध लिया था।
"जासूस बनना अच्छी बात है," मैंने कहा, "पर नियम याद है? जो मैं कहूँ, वही। जहाँ मैं रुकूँ, वहीं रुको। अगर हवा भी बदले और मैं कहूँ — भागो — तो कुछ मत पूछना।"
"और अगर हम भागते वक़्त गिर पड़ें?" चिंटू ने पूछा।
"तो उठकर भागना।"
"बहुत अच्छा नियम है।" चिंटू ने कहा। "ये मैं अपनी कॉपी में लिख लूँगा।"
टिंकू ने उसे घूरा। "तेरी कॉपी में क्या लिखा है? चार पन्ने हैं उसमें, और तीन पर तेरी ही तस्वीर है।"
"दो पर है।" चिंटू ने सुधारा।
"चुप।" मीरा ने कहा। "आगे बढ़ो।"
बिजलीघर की पिछली दीवार के पीछे वही सूखी नाली थी, वही टूटी ईंटें, वही पुरानी झाड़ियाँ जो किसी ने बरसों से नहीं छुई थीं। पीछे की तरफ़ एक टूटी खिड़की थी — लोहे के जंग लगे दो पल्ले, जिनमें से एक पूरा गिर चुका था और दूसरा टेढ़ा लटका था।
नदीम पहले चढ़ा। फिर मैं। फिर मीरा — उसने कैमरा पहले अंदर डाला, फिर खुद घुसी। फिर टिंकू। फिर बच्चे।
जैसे ही मैंने अंदर पाँव रखा — मेरी साँस रुक गई।
धूप बाहर थी। शाम की, पीली, तेज़। और अंदर — अंदर ऐसी ठंड थी जैसे किसी ने इस कमरे को जाड़े वाले किसी शहर से उठाकर यहाँ रख दिया हो। ऐसी ठंड नहीं जो कपड़े से जाए। ऐसी ठंड जो हड्डी में बैठ जाए।
टिंकू ने मेरी कमीज़ पकड़ ली। उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं।
"कोई नहीं है यहाँ।" मैंने धीरे कहा।
"तो फिर ऐसा क्यों लग रहा है कि कोई देख रहा है?" उसने फुसफुसाकर कहा।
मैंने कुछ नहीं कहा। क्योंकि मुझे भी वही लग रहा था।
अंदर बड़ा हॉल था — टूटी छत, बीच में धूल भरी मशीनों के ढाँचे, दीवारों पर पुराने तार लटके हुए जैसे कोई सूखा पौधा। और दीवार के साथ — छह बड़े लोहे के बक्से। बराबर अंतर पर। जैसे किसी ने तराज़ू से नापकर रखे हों।
मैंने एक-एक करके देखा।
पहला बंद। ढक्कन पर धूल। दूसरा बंद। तीसरा बंद। चौथा बंद। पाँचवाँ बंद।
और सबसे आख़िरी — खुला।
ढक्कन पूरा ऊपर उठा हुआ था। जैसे किसी ने जल्दी में खोला हो, फिर भूल गया हो। या जैसे अंदर से किसी ने धक्का दिया हो।
"अंकुश।" मीरा ने धीरे कहा।
"देख रहा हूँ।"
मैं करीब गया।
बक्से के भीतर सिर्फ़ राख थी। अब जमी हुई राख। बिल्कुल बराबर बिछी हुई, जैसे किसी ने सोच-समझकर समतल कर दी हो।
और उस राख पर — उँगली की लकीरें।
दो लकीरें। एक सीधी, एक लेटी। जैसे किसी ने उँगली रखकर खींच दी हो।
मैंने अपनी उँगली को वहाँ नहीं फँसाया। मैंने देखा बस। क्योंकि मुझे पता था अगर मैंने छुआ, तो वो राख फिर उसी जगह उड़कर बैठ जाएगी जहाँ से कोई उसे मिटाना नहीं चाहता।
टिंकू मेरे पीछे खड़ा था। उसने कमीज़ और ज़ोर से पकड़ ली।
चिंटू ने यह देखा।
"अरे, ये क्या कर रहा है?" वो हँसा। "अपनी कमीज़ छोड़ दे, ऐसे पकड़ रहा है जैसे डूब रहा हो।"
"चिंटू—" सानिया ने कहा।
"नहीं, सच में।" चिंटू ने मज़े लेते हुए कहा। "टिंकू तो जासूस बनने निकला था। अब देखो, डर के मारे भैया का पल्लू पकड़े खड़ा है, जैसे छोटा बच्चा राखी से चिपका हो।"
"चुप कर।" मैंने कहा।
पर देर हो चुकी थी। चिंटू को ज़ुबान चाहिए थी, और उसे मिल गई थी। वो लज़ीरा होकर बक्सों के बीच की तरफ़ गया — दिखाने के लिए कि वो नहीं डरता।
"देखो, मैं इतना करीब जाकर खड़ा हो जाता हूँ—"
वो तीन कदम और आगे गया।
फिर रुका।
फिर उसका चेहरा बदला।
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