The Mysterious Bell733 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 733

7 min read November 5, 2026

"तो तुम आज आए।" मीरा ने कहा।

"मैं कल से इस शहर में हूँ।" उसने कहा। "कल शाम स्टेशन पर एक आदमी ने मुझे बताया कि यहाँ क्या चल रहा है। स्कूल, अस्पताल, गली — सब। और उसने ये भी बताया कि एक लड़का है जो रिश्ते जोड़ता है।"

"कौन था वो आदमी?" मैंने पूछा, शायद ज़रूरत से ज़्यादा तेज़ी से।

"नाम नहीं बताया।" नदीम ने कहा। "बस इतना कहा — जब उससे मिलो, तो कहना, घंटी वाला लड़का जानता है कि काग़ज़ काटने वाला एक ही नहीं है।"

घंटी जेब में हिली। इतनी हल्की कि शायद सिर्फ़ मैंने महसूस की।

तभी काजल आई।

उसने वो घिसा सफ़ेद कोट पहना हुआ था जो डॉक्टर इसरानी ने उसे दिया था — डॉक्टर की बीवी का पुराना कोट, जिसकी जेब एक जगह सिली हुई है और बाँहें थोड़ी छोटी हैं। उसके हाथ में दवा की एक प्लास्टिक थैली थी, जिसमें दो पत्ते बचे थे।

वो सीधी नदीम के सामने आकर खड़ी हो गई।

"तुम काग़ज़ देखने आए हो या डराने?" उसने पूछा।

नदीम ने उसकी तरफ़ देखा।

फिर वो हँसा।

हँसी छोटी थी, पर सच्ची — जैसे छत से एक बूँद गिरे।

"दोनों।" उसने कहा। "पर पहले काग़ज़।"

काजल एक पल रुकी।

मुझे पता है वो क्या सोच रही थी। मुझे भी पता है तुम क्या सोच रहे होगे — कि एक अजनबी आया, हँसा, और मैंने उसे बैठने दिया। तुम सही हो। मैंने उसे बैठने दिया। क्योंकि घंटी ने मेरी जेब में एक बार भी ठंडी नहीं होने दी।

और घंटी झूठे आदमी के पास ठंडी हो जाती है।

नदीम ने डायरी खोली।

पन्ने पीले थे, किनारों से मुड़े हुए, और हर पन्ने पर दो क़िस्म की लिखाई थी — एक काली स्याही में साफ़, और एक पेंसिल में जल्दी में लिखी, जैसे भागते-भागते लिखी गई हो।

वो पन्ने उलटता गया — धीरे, बिना जल्दी के, जैसे कोई रास्ता याद कर रहा हो। दवाइयों के नाम। तारीख़ें। कुछ नाम जो काटे हुए थे। कुछ हिसाब जो आधे थे। कहीं-कहीं सिर्फ़ एक शब्द — "मरीज़", "बाढ़", "छत टपकी"।

और फिर वो एक पन्ने पर रुका।

उसे मेरी तरफ़ घुमाया।

उस पन्ने पर, ऊपर दाईं तरफ़, एक छोटी सी जगह में दो लकीरें थीं और उनके बीच में एक बिंदु।

वही निशान।

वही दो लकीरें और बिंदु जो बिजलीघर के बक्से की दीवार पर था, चूल्हे के पीछे वाले दरवाज़े पर पुराने पेंट के नीचे था, और उस्ताद की पीतल की घंटी के छल्ले पर।

मेरा हाथ अपने आप मेरी जेब की तरफ़ गया।

"ये तुमने बनाया?" टिंकू ने आगे झुककर पूछा।

"नहीं।" नदीम ने कहा। "मेरे दादा ने बनाया।"

"कब?"

"जिस दिन उन्होंने यहाँ पहली दवा दी थी।" नदीम ने कहा। "ये उनका निशान था — यानी जो ज़मीन, जो काग़ज़, वो हमारा नहीं, हम सिर्फ़ उसके रखवाले हैं। दो लकीरें — दो हाथ। बीच में बिंदु — और दोनों हाथों के बीच जो है।"

"जो दोनों हाथों के बीच है।" मीरा ने धीरे से दोहराया।

"यही।" नदीम ने कहा।

उसने पन्ने को थोड़ा और नीचे किया, ताकि रोशनी उसके नीचे के हिस्से पर पड़े।

और वहाँ, निशान के ठीक नीचे, एक नाम लिखा था।

औरत का नाम।

पर आधा।

किसी नुकीली चीज़ से काटा हुआ — सिर्फ़ पहला अक्षर बचा था और उसके बाद एक सीधी लकीर जो कटी हुई थी। बाकी नाम जाने कहाँ गया।

मैंने काग़ज़ की सतह पर उँगली रखी। कटा किनारा टेढ़ा था — बिल्कुल टेढ़ा, जैसे एक ही बार में नहीं, दो बार में काटा गया हो, जैसे किसी का हाथ काँपा हो।

"ये पन्ना फटा नहीं है।" नदीम ने कहा। उसकी आवाज़ बदल गई थी — अब उसमें वो धीमापन नहीं था, अब उसमें कुछ सख़्त था। "ये कोई पुरानी फटन नहीं है। देखो — फटा किनारा रेशेदार होता है, ये किनारा सीधा और टेढ़ा है। इसे किसी ने जान-बूझकर काटा है। चाकू से, या कैंची से।"

"क्यों?" काजल ने पूछा।

"क्योंकि वो नाम इस हिसाब में नहीं होना चाहिए था।" नदीम ने कहा। "उस वक़्त भी नहीं, और आज भी नहीं।"

मैंने अपनी जेब से आधी जली रसीद निकाली।

वो रसीद जो हमें औज़ारदान के नीचे मैले कपड़े से मिली थी, जिसके ऊपर भारद्वाज कंस्ट्रक्शन की नीली गोल मोहर बची थी, और जिस पर उस औरत का अंगूठा था, जो पापा का नहीं था।

मैंने उसे बेंच पर रख दिया।

मीरा ने तुरंत अपना फोन निकाला और उसकी बत्ती जलाई और उसे नीचे से ऊपर घुमाया।

और मैंने देखा।

दो काग़ज़। एक डायरी का पन्ना, एक जली रसीद।

दोनों के कटे किनारे एक जैसे टेढ़े थे।

बिल्कुल एक जैसे।

जैसे एक ही हाथ ने, एक ही बैठक में, एक ही चाकू से दोनों जगह काटा हो।

मैंने घंटी हथेली पर रखी।

वो गरम थी।

बहुत गरम नहीं। बस इतनी कि मेरी उँगलियों में एक झुनझुनी चली गई।

"देखा?" नदीम ने कहा।

"देखा।" मैंने कहा।

"मेरे दादा ने इस पन्ने को बचाया था।" उसने कहा। "पूरी डायरी में एक ही पन्ना ऐसा है जिसके किनारे पर उन्होंने अपनी उँगली रखकर मोड़ा है, ताकि वो खुलते ही यहीं खुले। मतलब वो जानते थे कि ये किसी दिन कोई देखेगा।"

"और उन्होंने तुमसे कुछ कहा था?" मीरा ने पूछा। "जो लिखा नहीं है?"

नदीम कुछ देर चुप रहा।

"एक बात कही थी।" उसने कहा। "बोले थे — बेटा, जिस दिन कोई उस ज़मीन का काग़ज़ सामने रखे और कहे कि ये सब साफ़ है, उस दिन तू उससे पूछना कि उस औरत का नाम क्या था।"

"कौन सी औरत?" काजल ने पूछा।

"वो नहीं बताया।" नदीम ने कहा। "बस इतना कहा — वो औरत डर गई थी, और डरे हुए आदमी का नाम काग़ज़ पर कभी पूरा नहीं आता।"

बरामदे में चुप्पी छा गई।

दूर, किसी कमरे में, कोई खाँसा। माँ का कमरा उसी तरफ़ था।

और मुझे अचानक ऐसा लगा जैसे मैं बहुत दूर खड़ा हूँ और सब कुछ बहुत धीमा चल रहा है।

डरे हुए आदमी का नाम काग़ज़ पर पूरा नहीं आता।

मैंने पापा की लिखाई याद की। पापा जो पाँच साल से उस नाम को मिटाने गए हैं जो उन्होंने नहीं लिखा।

मैंने माँ की आँखें याद कीं, जब उन्होंने कहा था — वो अंगूठा पापा का नहीं है।

मीरा ने कैमरा नीचे किया।

"आज रात।" उसने कहा। "इन दोनों को जोड़कर देखेंगे।"

"कैसे?" नदीम ने पूछा।

"जोड़कर।" मीरा ने कहा। "सामने रखकर। जैसे जिगसॉ के दो टुकड़े। अगर किनारे मिलते हैं, तो नाम पूरा बनेगा।"

"और अगर नाम पूरा बन गया?"

मीरा ने मेरी तरफ़ देखा।

"तो आज रात हमें पता चल जाएगा।" उसने कहा। "कि रणवीर भारद्वाज किस औरत का नाम जानता है जो घर में भी पता है।"

नदीम ने सिर हिलाया। फिर उसने डायरी बंद की और रस्सी से फिर बाँधने लगा — तीन गाँठें, एक-एक करके।

और तभी, रस्सी बाँधते-बाँधते, उसकी नज़र बरामदे की जालीदार खिड़की से बाहर गई।

उसके हाथ रुक गए।

रस्सी की तीसरी गाँठ आधी बनी रह गई।

"क्या हुआ?" मैंने पूछा।

वो चुप रहा।

"नदीम?"

उसने बहुत धीरे, बिना मेरी तरफ़ देखे, बिना आवाज़ उठाए, कहा —

"तुम्हारी गली के मुँह पर सफ़ेद कुर्ते वाला कोई खड़ा है, और वो हमें देख रहा है।"

मैंने खिड़की की तरफ़ देखा।

धूप में, गेट के उस पार, नीम के पेड़ की छाया के किनारे पर, एक आदमी खड़ा था।

सफ़ेद कुर्ता। सफ़ेद जूते। हाथ पीछे बँधे। और चेहरा — चेहरा नीम की छाया में था, आधा, जैसे किसी ने जान-बूझकर उसे वहीं खड़ा किया हो, जहाँ रोशनी न पहुँचे।

वो हिला नहीं।

उसने हाथ नहीं उठाया।

बस खड़ा रहा।

मैंने घंटी दबाई।

वो ठंडी हो चुकी थी।

"अंकुश।" मीरा ने कहा, और उसकी आवाज़ में पहली बार वो तेज़ी आई जो डर से नहीं, समझ से आती है। "वो हमारा इंतज़ार नहीं कर रहा। वो गिन रहा है कि इस कमरे में कौन-कौन है।"

वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।

यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।

Audio mein suno

Apni raay likho