The Mysterious Bell732 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 732

7 min read November 5, 2026

"अंकुश।" मीरा ने कहा। "तू चल। मैं सानिया और बच्चों को यहीं रखती हूँ। डेढ़ घंटे में वापस आएँगे।"

"डेढ़ घंटे में क्या होगा?" टिंकू ने पूछा। "अगर पापा —"

"टिंकू।" मैंने कहा।

वो चुप हो गया।

मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा। उसका कंधा छोटा था, पर सीधा खड़ा था।

"सुन।" मैंने कहा। "तू यहीं रहेगा। सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़, चिंटू — सब यहीं। फाटक के पास कोई नहीं जाएगा। फाटक की दूसरी तरफ़ से जो भी आवाज़ आए, तू मुझे फोन करेगा। बस इतना।"

"और तू अस्पताल जाएगा?"

"हाँ।"

"तो मैं भी।"

"टिंकू —"

"उस्ताद।" उसने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में पानी नहीं था, पर आवाज़ में वो चीज़ थी जो पानी से भी ज़्यादा भारी होती है। "मैंने अपनी माँ से वादा किया है कि मैं सच बोलकर चलूँगा। मैं आज घर जाकर ये नहीं कह सकता कि मैं यहाँ खड़ा था और तू अकेला गया।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

फिर मीरा की तरफ़। मीरा ने बहुत हल्का सा सिर हिलाया — हाँ, ले जा।

"ठीक है।" मैंने कहा। "पर एक शर्त। तू मेरे पीछे चलेगा। आगे नहीं।"

"और एक शर्त मेरी तरफ़ से।" सानिया ने कहा।

हम सब पलटे।

वो चारों एक कतार में खड़े थे। सानिया के हाथ में उसकी लाल कवर वाली कॉपी थी, जिसमें वो हर चीज़ की तारीख़ लिखती है।

"हम यहाँ अंधेरे में खड़े नहीं रहेंगे।" उसने कहा। "हम घर के मोड़ तक जाएँगे, जहाँ रोशनी है। अगर कोई फाटक की तरफ़ गया तो हम ऊपर से देखेंगे। और —"

"और?"

"और आज मैं सब लिखूँगी।" उसने कॉपी दिखाई। "वक़्त, गाड़ी, आवाज़, चेहरा। सब।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा और अंदर से हँसा।

तुम सोच रहे होगे कि एक दस साल की बच्ची क्या लिखेगी।

सुनो — पूरी गली में सबसे साफ़ लिखाई उसी की है।

मैंने पापा का चश्मा उठाया, कमीज़ के अंदर, सीने के पास रखा। चश्मे का टेप खुला हुआ था और टेप की चिपचिपी सतह पर धूल चिपकी थी।

फिर मैंने उस छोटी कोठरी की तरफ़ देखा जहाँ धूल में तीन शब्द लिखे थे।

ऊपर मत जाना।

मैंने टिंकू की तरफ़ देखा।

"ये कोठरी याद रखना।" मैंने मीरा से कहा। "ताला लगाकर जाओ।"

मीरा ने सिर हिलाया और अपने फटे बैग से ताला निकाला। वो ताला उसके पास पुराने रिसर्च के काग़ज़ों के लिए था, पर आज वो लोहे के दरवाज़े पर लग गया।

हम बाहर आए।

उस वक़्त गली के मुँह पर खड़ी काली गाड़ी धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी। उसका शीशा पूरा बंद था। पहियों की आवाज़ भी नहीं आई — सिर्फ़ गर्मी में फिसलती हुई लोहे जैसी शांति।

मैंने घंटी हथेली में दबाई।

"जाने दे।" घंटी ने कहा।

"क्यों?"

"वो गाड़ी नहीं।" घंटी ने कहा। "वो इंतज़ार थी।"

"किसका?"

घंटी चुप हो गई।

मैंने शटर की तरफ़ देखा और ऐसे चल पड़ा जैसे कोई मुझे पीछे से धक्का दे रहा हो।

मीरा ने साइकिल निकाली। मैंने टिंकू को पीछे बैठाया और मैं आगे बैठा। मीरा अपनी साइकिल पर साथ चली।

सात मिनट में हम गली के मुँह पर पहुँचे।

और वहाँ उस वक़्त हवा में एक चीज़ थी जो मुझे समझ नहीं आई। गली खाली थी — पूरी खाली। शबनम आपा की गुमटी का चूल्हा बंद था, और उसकी जगह चबूतरी पर एक कटोरी रखी थी, ऊपर उलटी, जैसे किसी ने कह दिया हो — यहाँ आज चाय नहीं।

भोला भाई की दुकान का आधा शटर गिरा था।

उस्ताद की दुकान से सिलाई मशीन की आवाज़ नहीं आ रही थी।

और उसी चुप्पी में, साइकिल की घंटी — मेरी घंटी — मेरी जेब में गरम हो उठी।

"अंदर।" उसने कहा।

"कहाँ?"

"अस्पताल।"

हम अस्पताल के गेट पर पहुँचे।

गेट का पुराना पीला बोर्ड अब भी वहीं था, रंग उतरा हुआ, पर उसके नीचे एक नई पट्टी चिपकी थी, जिस पर नीली स्याही में कुछ लिखा था और मैंने उसे पढ़ा नहीं, सीधा अंदर चला गया।

अंदर का बरामदा।

टूटी बेंचें। धूल भरा पंखा जो आधा घूमकर रुक जाता था और फिर घूमता था, जैसे उसकी भी साँस फूल रही हो। जालीदार खिड़की से दोपहर की रोशनी आ रही थी, जिसमें धूल के कण ऐसे तैर रहे थे जैसे कोई उँगली से पानी में लकीरें बना रहा हो।

और बरामदे के आख़िरी कोने में, एक बेंच पर, एक जवान बैठा था।

पच्चीस-छब्बीस साल का रहा होगा। दुबला, पर कमज़ोर नहीं — दुबला जैसे रस्सी दुबली होती है, वज़न उठाने के बाद। कद मझोला, हल्की दाढ़ी, सफ़ेद कमीज़ जिसकी बाँहें घुटनों तक मोड़ी हुई थीं, और घुटनों पर एक पुराना चमड़े का बैग रखा था।

उसके हाथ में काग़ज़ों का बंडल था — मोटा, रस्सी से बँधा, जिसकी रस्सी में तीन गाँठें थीं।

और उसकी आँखें।

वो आँखें ऐसी थीं जो जल्दी किसी की बात नहीं मानतीं।

उसने मुझे देखा। फिर मेरे पीछे टिंकू को। फिर मीरा को, और मीरा के कैमरे को। और उसके चेहरे पर कोई बदलाव नहीं आया — न चौंकना, न खुशी, न शक। बस एक छोटी सी हरकत — उसने अपने बंडल को सीने से थोड़ा और चिपका लिया।

"तुम अंकुश हो।" उसने कहा।

आवाज़ धीमी थी, पर साफ़। जैसे कोई बहुत दिन बाद बोल रहा हो और उसे अभी भी याद हो कि कैसे बोलते हैं।

"हाँ।" मैंने कहा। "और तुम?"

"नदीम।" उसने कहा। "नदीम हकीम। हकीम अली का पोता।"

उसी वक़्त बगल के कमरे से डॉक्टर इसरानी निकले। उनके हाथ में पुराना स्टेथोस्कोप था, वो वाला जिसकी रबर की नली पर टेप लिपटा है। उन्होंने मुझे देखा और फिर नदीम को, और उनका चेहरा कुछ ऐसा हुआ जैसे कोई बूढ़ा आदमी अपनी जवानी की तस्वीर देख ले।

"ये बैठा है सुबह से।" उन्होंने कहा। "मैंने कहा, बेटा, तुम्हारी गाड़ी आई है, तुम घर जाओ, आराम करो। पर ये नहीं गया।"

"मुझे काग़ज़ देखने हैं।" नदीम ने कहा, बिना किसी की तरफ़ देखे।

"कौन से काग़ज़?" मैंने पूछा, हालाँकि मुझे पता था।

"अस्पताल की ज़मीन के।" उसने कहा। "वो ज़मीन जो गली के लोगों ने मिलकर दी थी। वो काग़ज़ जिस पर सात अंगूठे हैं। और वो आठवाँ पन्ना जिसे किसी ने काटकर अलग कर दिया।"

बरामदे में सन्नाटा। पंखे की आवाज़ भी रुक गई।

मैंने डॉक्टर इसरानी की तरफ़ देखा।

"ये सच बोल रहा है साहब?"

डॉक्टर इसरानी ने नदीम के कंधे पर हाथ रखा।

"मैं इसे बच्चा देखता हूँ।" उन्होंने कहा। "ये तब आया करता था, जब इसके दादा यहाँ आते थे। छोटा-सा था, हकीम साहब के साथ बैठता था, और सबको पूछता था — ये क्या है, वो क्या है। हकीम साहब इसका सिर पकड़कर कहते थे — ये मेरा पोता है, इसका नाम नदीम है, और ये मेरे बाद सब कुछ पूछेगा।"

उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।

"अंकुश, इस अस्पताल की पहली दवा हकीम साहब ने अपनी जेब से दी थी।" उन्होंने कहा। "तब यहाँ कोई इमारत नहीं थी। सिर्फ़ टिन का एक शेड था, चार खंभों पर, जिसकी छत बारिश में ऐसे बजती थी जैसे कोई बच्चा डिब्बे पर डंडा मार रहा हो। उस शेड के नीचे हकीम साहब बैठते थे, सामने लकड़ी की एक तख़्ती रखते थे, और जो आता था उसे बिठाकर सुनते थे। पैसा नहीं पूछते थे। और जब कोई दवा के पैसे निकालता था, तो वो हाथ हटा देते थे — बोलते, बाद में।"

उनकी आवाज़ धीमी हो गई।

"वो 'बाद में' कभी आया ही नहीं।" उन्होंने कहा। "और ये इमारत जो खड़ी है, इसकी पहली ईंट उसी 'बाद में' से बनी है।"

नदीम ने अपना बंडल खोला। रस्सी की तीन गाँठें एक-एक करके खुलीं, और उसके नीचे से एक डायरी निकली।

काली जिल्द। कोने घिसे हुए। जिल्द के किनारे पर सफ़ेद निशान, जैसे बार-बार उँगली रगड़ी गई हो।

"मेरे दादा ने ये मरने से दस दिन पहले मुझे दी थी।" उसने कहा। "उस वक़्त वो बोल नहीं सकते थे। बस इतना कहा — नदीम, इसमें जो लिखा है, वो मेरा नहीं, उस ज़मीन का है। और जिस दिन वो ज़मीन बिकने लगे, तू जाकर देख लेना।"

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