The Mysterious Bell738 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 738

7 min read November 5, 2026

मैंने जवाब नहीं दिया। मैं पर्ची को दोबारा पढ़ रहा था।

घंटी लाओ, नहीं तो उस औरत का नाम कल सुबह दीवार पर लिखा मिलेगा।

"उस औरत का।" मैंने धीरे से कहा।

मीरा शटर के नीचे से झुककर अंदर आई। उसके हाथ में कैमरा नहीं था। उसने मेरी तरफ़ देखा, फिर पर्ची की तरफ़।

"यह पापा का चश्मा है।" मैंने कहा। "जो कोठरी में मिला था और फिर गायब हो गया। ये वही है — एक काँच चटका हुआ, टेप उतरा हुआ।"

मीरा ने चश्मा हाथ में नहीं लिया। उसने बस देखा, फिर बोली, "जिसने ये लौटाया है, वो हमें बता रहा है कि वो वहाँ था। वो कोठरी में था। वो उस वक़्त भी वहाँ था जब हम वहाँ पहुँचे।"

"या वो हमारे बाद गया।"

"अंकुश।" मीरा ने कहा। "पापा का चश्मा उस आदमी के पास क्यों है?"

मैंने पर्ची मेज़ पर रखी। मेरे हाथ उस वक़्त काँप रहे थे — मैं झूठ नहीं बोलूँगा। डर से। गुस्से से। दोनों से।

"क्योंकि वो चाहता है कि मैं ये सवाल खुद से पूछूँ।" मैंने कहा। "वो मुझे यही बता रहा है — तुम जिसे बचाने निकले हो, वो मेरे हाथ में है। तुम्हारी घंटी मेरे पास आए, वरना वो औरत का नाम सबको दिख जाएगा।"

मीरा कुछ देर चुप रही।

फिर बोली, "तू क्या करेगा?"

मैंने अपनी जेब से घंटी निकाली।

पीतल। पुरानी। जंग लगे किनारे। मेरी हथेली में रखी तो ठंडी थी — पहली बार इतनी ठंडी कि जैसे कोई चीज़ मर गई हो। पर उसने खुद को बजाया था। पर्ची पढ़ते ही।

"मैं इसे देने वाला नहीं हूँ।" मैंने कहा। "पर मुझे पता होना चाहिए कि जो पर्ची लिख रहा है वो क्या जानता है। और उसके पास क्या है।"

"और तू वो कैसे पता करेगा?"

"मेरे पास एक तरीक़ा है।" मैंने कहा। "पर उसके लिए घंटी से पूछना पड़ेगा, और उस्ताद ने कहा है — अकेले में नहीं।"

मीरा ने बिना कुछ पूछे बाहर से एक स्टूल खींचा और मेरे सामने बैठ गई।

"अकेले में नहीं।" उसने कहा। "तो मैं यहाँ हूँ।"

मैंने घंटी मेज़ पर रखी।

"घंटी।" मैंने कहा। मेरी आवाज़ धीमी थी। "मेरे पास अंक हैं?"

कुछ देर तक कुछ नहीं हुआ।

फिर एक आवाज़ आई — बहुत धीमी, जैसे कोई दूर के कमरे से बोल रहा हो। पर साफ़।

"गिनती कम है।"

"कितनी कम?"

"बड़ी चीज़ के लिए अभी पूरा हिसाब नहीं मिलता।"

मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। मैंने उसे इशारा किया कि चुप रहे।

"मुझे छिपा दर्द चाहिए।" मैंने कहा। "चालीस अंक वाली।"

मेज़ पर घंटी हिली — ज़रा सी, जैसे हवा ने छुई हो। पर कमरे में हवा नहीं थी।

"एक बार खर्च हुआ तो लौटेगा नहीं।" घंटी ने कहा।

"मुझे पता है।"

"और तू जो देखेगा, वो तेरे साथ रहेगा। सिर्फ़ झलक नहीं होगी। उसका बोझ रहेगा।"

मैंने मीरा की तरफ़ देखा। वो चुप बैठी थी, पर उसकी आँखों में वो सवाल था जो वो ज़ुबान से नहीं पूछ रही थी — तू पक्का कर रहा है ना?

मैंने गहरी साँस ली।

अपने गले से चाबी निकाली, मेज़ पर रखी। मेरे सामने पापा का चश्मा था।

"हाँ।" मैंने कहा। "चालीस अंक। छिपा दर्द।"

घंटी बजी।

छोटी आवाज़। एक बार। ऐसे जैसे कोई कहे — ठीक है।

और फिर मैंने अपना हाथ आगे बढ़ाया।

मेरी उँगलियों ने पापा का चश्मा छुआ।

दुनिया घूम गई।

नहीं — घूमी नहीं। दुनिया मेरे सामने से हट गई, और उसकी जगह कुछ और आ गया। जैसे कोई पर्दा हटा दे और पीछे से कोई पुरानी तस्वीर खुल जाए।

मैंने अपने हाथ नहीं देखे। मैंने किसी और के हाथ देखे।

बूढ़े हाथ। झुर्रीदार। नाखून टूटे हुए। उँगलियों पर काम करने के निशान। एक कलाई पर, बहुत नीचे, हरी चूड़ी — शीशे की, चमक खो चुकी।

उसके सामने सफ़ेद दीवार थी। बहुत सफ़ेद। अस्पताल की दीवार। वो दीवार जिस पर नीचे से ऊपर तक एक पतली दरार चली जाती है और कोई उसे रोज़ देखता है और रोज़ भूल जाता है।

गलियारा। लंबा। ट्यूबलाइट की पीली रोशनी। कहीं दूर पानी की टोंगी की आवाज़।

और एक आवाज़ — दबी हुई, दबाकर रोई हुई। कोई औरत रो रही थी, पर ऐसे रो रही थी जैसे उसे रोने की इजाज़त नहीं मिली हो। जैसे वो रो रही है और साथ-साथ ये भी देख रही है कि कोई सुन न ले।

मैंने उन बूढ़े हाथों को दीवार पर रखा। फिर पलटा।

और मैंने उस औरत का चेहरा नहीं देखा। बस उसकी कलाई देखी — वही हरी चूड़ी — और एक छोटा सा काग़ज़ जो उसने मुट्ठी में दबाया हुआ था।

फिर सब कुछ मिट गया।

"अंकुश!"

मैं दीवार से टकरा रहा था। मेरी टाँगें काँप रही थीं। चश्मा मेरे हाथ से खिसकने लगा था — फ़र्श पर गिरता, पर मीरा ने झपटकर पकड़ लिया। एक हाथ से चश्मा, एक हाथ से मेरी बाजू।

"बैठ।" उसने कहा। "बैठ, अंकुश। तेरा चेहरा सफ़ेद है।"

मैंने कुर्सी टटोली। बैठ गया।

मेरा साँस फूल रहा था — जैसे मैंने दौड़ लगाई हो, और दौड़ मेरी नहीं थी।

मीरा ने पानी का गिलास आगे बढ़ाया। मैंने पिया। पानी मेरे मुँह को नहीं पहचान रहा था। सब कुछ अजीब लग रहा था।

"क्या देखा?" उसने पूछा।

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

"वो दर्द पापा का नहीं था।" मैंने कहा। और जब मैंने कहा, तो मेरी आवाज़ अपनी नहीं लगी। "वो हाथ पापा के नहीं थे। ऐसे नहीं लगा।"

"किसके थे?"

"किसी औरत के।" मैंने कहा। "बहुत पुराना दर्द था, मीरा। बहुत थका हुआ। जैसे कोई चीज़ बरसों से पी रहा हो और उसे कहने की जगह न मिली हो।"

मीरा ने चश्मा मेज़ पर रखा।

"वो क्या देख रही थी?"

"दीवार।" मैंने कहा। "अस्पताल की दीवार। गलियारा। और कोई रो रहा था — वो खुद या कोई और, समझ नहीं आया। बस इतना पता है कि वो रोने की आवाज़ दबी हुई थी। छुपकर।"

मैंने अपना सिर हाथ में लिया।

"और हरी चूड़ी।" मैंने कहा। "शीशे की। उसकी कलाई पर।"

घंटी ने कुछ देर बाद आवाज़ दी। बहुत धीमी। लगभग फुसफुसाहट।

"इस घर में एक दर्द पीढ़ी-दर-पीढ़ी हाथ बदलता रहा है।" घंटी ने कहा।

मैंने सिर उठाया।

"क्या मतलब?"

"हर आदमी उसे अपना समझकर ढोता रहा।" घंटी ने कहा। "कोई पूछता नहीं कि ये दर्द उसका है या नहीं। बस पीछे से मिला, आगे बढ़ा दिया।"

मैंने मीरा की तरफ़ देखा। वो भी मेरी तरफ़ देख रही थी।

"मेरे दादा?" मैंने पूछा। "दादा जगदीश यादव?"

घंटी चुप रही।

"घंटी।" मैंने कहा। "क्या वो औरत —"

"अभी तीन सवाल पूछे।" घंटी ने कहा। "एक ही सवाल का जवाब मिलेगा।"

मैं चुप हो गया।

ये घंटी का तरीक़ा था। ये कभी पूरी बात नहीं कहती थी। छोटे-छोटे वाक्य, और फिर सवाल, और फिर चुप्पी — जैसे कोई बूढ़ा आदमी बैठकर सिर्फ़ इतना कहे कि "सोच ले" और उठ जाए।

मीरा ने कहा, "अंकुश, मैं कुछ कहूँ?"

"कह।"

"अब तक हम नाम ढूँढ रहे थे।" उसने कहा। "काग़ज़ में नाम, रजिस्टर में नाम, फाइल में नाम। पर तू जो देखकर आया है — वो नाम नहीं है। वो इंसान है। अगर वो औरत ज़िंदा है, तो हमें उसे ढूँढना चाहिए।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

"मीरा, तूने अभी वही कहा जो मैं सोच रहा था।" मैंने कहा।

"तो अच्छा सोच रहा था।" उसने कहा। "पर आगे मत सोच, बोल। क्योंकि मैं तेरे चेहरे पर देख रही हूँ कि तू कुछ और देख रहा है।"

"गलियारा।" मैंने कहा। "सफ़ेद दीवार। और ट्यूबलाइट। मुझे लगता है वो नूर अस्पताल ही था। पर पुराना। बहुत पुराना।"

तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई।

काजल थी। उसके हाथ में नर्सिंग की किताब थी और आँखें लाल थीं — किताब पढ़कर नहीं, लड़कर।

"माँ ने कहा था कोई अकेला नहीं।" उसने कहा, अंदर आते हुए। "तुम दोनों यहाँ हो और मुझे नहीं बताया?"

"काजल, हम बस —"

"बस कुछ नहीं।" उसने कहा। "मैंने शटर के नीचे से देखा, तू दीवार से टकरा रहा था। तू ठीक है?"

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