The Mysterious Bell – Chapter 728
"वो तेरे पापा का है।"
मैंने घंटी को जेब में डाला।
और मैंने किसी को कुछ नहीं बताया।
पर मेरे पैर मुझे नहीं, मेरे डर को सुन रहे थे।
दहलीज़ से नीचे उतरते वक़्त, मैंने एक बार पीछे देखा।
और चाँदनी में, दरवाज़े की चौखट पर, जहाँ हमने रात भर पैर रखे थे…
…वहाँ, ठीक उस जगह पर जहाँ खड़ाऊँ का निशान खत्म हो रहा था…
…एक नया निशान उभर रहा था।
धुआँ जैसा। लकीर जैसा।
और उस लकीर में, बहुत हल्के से, मेरा नाम लिखा जा रहा था।
मैंने आँखें मूंद लीं।
और मैंने गली की तरफ़ चलना शुरू किया।
पीछे से घंटी ने मेरे कान में एक आख़िरी बात कही, जो बस मेरी ही थी, किसी और की नहीं।
"जो दरवाज़ा खुला है, वो अब भी खुल रहा है। और जब तक तू उस तक नहीं पहुँचेगा…"
"…वो बंद नहीं होगा।"
॥
मैं और टिंकू स्कूल की तरफ़ भागे।
सुबह के पाँच बज चुके थे। आसमान पर अभी भी वो कालापन था जो रात से चिपका हुआ था, और हवा में एक अजीब सी नमी थी, जैसे पूरी गली ने रात भर रोया हो।
स्कूल का लोहे का गेट आधा खुला था।
और गेट के अंदर, चौकीदार की कोठरी के बाहर, रामलाल बाबा चारपाई पर बैठे थे। उनके हाथ में स्टील का गिलास था, जिससे भाप उठ रही थी। बगल में उनकी लाठी रखी थी, और लाठी के सहारे वो बैठे थे — सीधे नहीं, थोड़ा झुककर, जैसे हवा के डर से।
मैंने गेट खटखटाया।
वो चौंके।
"अंकुश।"
"बाबा, आप जाग रहे हैं?"
"बूढ़े आदमी को नींद कहाँ आती है बेटा।" उन्होंने गिलास मेज़ पर रखा। "बैठ।"
"बाबा, सवाल है।"
"पूछ।"
मैंने टिंकू को इशारा किया। वो बाहर खड़ा रहा, गेट की जाली से गली देखता हुआ।
"बाबा, जो आदमी रोज़ सुबह आठ बजे पुराने बिजलीघर के दरवाज़े पर दो खटखटें देकर दो मिनट खड़ा रहता है — वो आपने ही बताया था न?"
रामलाल बाबा ने मेरी तरफ़ देखा।
फिर धीरे से नज़रें झुका लीं।
"हाँ।"
"वो कौन है?"
"नाम नहीं पता।"
"चेहरा?"
"नहीं देखा।"
"बाबा।" मैं उनके सामने बैठ गया। "पैर?"
वो चुप हो गए।
बहुत देर तक चुप।
फिर बोले, "लकड़ी के जूते।"
मेरा सीना ठंडा हो गया।
"खड़ाऊँ?"
"हाँ।" उन्होंने गिलास फिर उठाया, पर पिया नहीं। "जब चलता है तो आवाज़ आती है — टक, टक। जैसे दरवाज़ा बज रहा हो।"
"क्या वो आपको कभी दिखा?"
"दो बार।" उन्होंने कहा। "दोनों बार सिर्फ़ पीठ। सफ़ेद कुर्ता। और सिर पर एक पुरानी टोपी।"
"टोपी?"
"बिल्कुल खुली नहीं थी। आँखों तक झुकी हुई।"
मैंने टिंकू की तरफ़ देखा। टिंकू गेट की जाली से चिपका हुआ सुन रहा था, मुँह खुला हुआ।
"बाबा, आज रात पापा नहीं लौटे।"
रामलाल बाबा का गिलास हाथ से छूटा।
स्टील का गिलास ज़मीन पर गिरा और उसमें से बची चाय मिट्टी में फैल गई।
"क्या?"
"आज रात कोई हमारे घर आया। खड़ाऊँ पहनकर। दरवाज़े तक आया, फिर लौट गया। पापा उसके साथ चले गए।"
"तुमने बाहर देखा नहीं?"
"हम सो रहे थे।"
"कहाँ सो रहे थे?"
"जहाँ आप बताएँगे वहीं।" मैंने कहा। "घर के दरवाज़े के पास।"
वो उठे।
धीरे, बहुत धीरे, लाठी के सहारे।
और फिर उन्होंने वो किया जो मुझे उम्मीद नहीं थी।
उन्होंने मेरा कंधा पकड़ा।
बूढ़े की उँगलियाँ काँप रही थीं, पर पकड़ कसी हुई थी।
"सुन।" उन्होंने कहा। "मैं एक बात कहूँगा। बूढ़ा आदमी हूँ, अगर मर गया तो बात पूरी रहे।"
"बाबा —"
"पुराने बिजलीघर के पीछे वो बक्से हैं। छह बक्से। रात को उनके बीच से कभी-कभी आवाज़ आती है।"
"कैसी आवाज़?"
"जैसे कोई काग़ज़ फाड़ रहा हो।" उन्होंने मेरी आँखों में देखा। "मैंने तीन बार सुनी है। तीनों बार सुबह के पाँच बजे। और तीनों बार, उसी आवाज़ के बाद, गली में कोई एक चीज़ टूटी है।"
मैं चुप हो गया।
"क्या चीज़ टूटी?"
"एक बार शबनम आपा की गुमटी का बल्ब।" वो बोले। "एक बार उस्ताद भाई की सिलाई मशीन की सुई। और एक बार…" उन्होंने रुककर साँस ली। "मेरी बेटी की शादी की तारीख़।"
टिंकू ने गेट से मुँह खोला।
"बाबा, शादी वापस आई थी क्या?"
"हाँ।" रामलाल बाबा ने कहा। "ग्यारह महीने बाद। और उस दिन से मैं उस तरफ़ पीठ करके नहीं सोता।"
मैं उठ खड़ा हुआ।
"बाबा, आज रात हमें कुछ देर के लिए आपकी कोठरी चाहिए।"
"क्यों?"
"क्योंकि यहाँ से बिजलीघर का फाटक दिखता है।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, फिर कोठरी की तरफ़, फिर बिजलीघर की तरफ़।
"ले जा।" उन्होंने कहा। "पर एक बात रख।"
"कहिए।"
"अगर सुबह तक मैं इस चारपाई पर खाली न मिलूँ…" उन्होंने छड़ी उठाई। "तो किसी को बुलाना मत। अपने पापा को लेकर आना। बस वही काफ़ी है।"
मैंने सिर हिलाया।
और मैंने कहा, "बाबा।"
"हाँ।"
"आप भी आना। सुबह के सात बजे। दुकान पर।"
रामलाल बाबा हँसे।
बूढ़ी, थकी, खोखली हँसी।
"सात बजे का वक़्त बदल गया है बेटा।" उन्होंने कहा। "अब तो हर वक़्त सात बजे का ही है।"
स्कूल से निकलकर मैंने घड़ी देखी।
छह बजने वाले थे।
पीपल की डाल पर एक चिड़िया बैठी चीं-चीं कर रही थी। और मुझे लगा, चिड़िया भी आज बहुत तेज़ बोल रही है।
मैंने टिंकू की तरफ़ देखा।
"तू फ़ोन कर।" मैंने कहा। "मीरा दीदी को। बोल, बिल्कुल अभी आएँ।"
"और आप?"
"मैं मीरा को नहीं, पहले उस्ताद को बुलाना चाहता हूँ।"
मैं उस्ताद की दुकान की तरफ़ भागा।
दुकान का शटर आधा उठा था। उस्ताद अंदर बैठे थे, चश्मे के पीछे से कोई कपड़ा देख रहे थे।
मैं अंदर घुसा।
"उस्ताद।"
"बैठ।" वो सीधा बोले।
"उस्ताद, पापा नहीं लौटे।"
उनके हाथ में जो कपड़ा था, वो रुक गया।
उन्होंने कपड़ा मेज़ पर रखा।
चश्मा ठीक किया। दोनों हाथों से।
फिर बोले, "बैठ जा। दस मिनट मेरे पास बैठ जा। मेरी दुकान पर दस मिनट में कोई तीन लोग ही आते हैं। तू चौथा है।"
"उस्ताद, वक़्त नहीं —"
"यही तो वक़्त है।" उन्होंने कहा। "जब आदमी को सबसे कम वक़्त होता है, तभी उसे सबसे ज़्यादा बैठना चाहिए।"
मैं बैठ गया।
उस्ताद ने सिलाई मशीन का पहिया घुमाया।
टिक-टिक। टिक-टिक।
फिर बोले, "आदमी जब अपना नाम मिटाने निकलता है, तो नए रास्तों पर नहीं जाता।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"तो कहाँ जाता है?"
"पुराने मकान पर।" उन्होंने कहा। "जहाँ उसकी माँ उसे पहली बार बुलाती थी। जहाँ वो पहली बार मार खाया था। जहाँ उसने पहली बार किसी को झूठ बोला था।" उनका पहिया रुका। "और सबसे पहले… जहाँ उसने सबसे पहली बार अपना नाम लिखा था।"
मैं उठा।
"उस्ताद, वहाँ कौन सी जगह है?"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, ठीक चश्मे के ऊपर से।
"तू उसका बेटा है और तुझे नहीं पता?"
मैं चुप हो गया।
"मुझे नहीं पता।" मैंने कहा।
"तो यही तेरी सबसे बड़ी ग़लती है।" उन्होंने पहिया फिर घुमाया। "पूरी ज़िंदगी मशीन ठीक करता रहा, पापा को नहीं पढ़ा।"
मैंने सिर झुका लिया।
"उस्ताद, मैं —"
"अब मत बोल।" उन्होंने कहा। "अब जा। और जाते वक़्त एक बात सुन।"
"हाँ।"
"पापा जब लौटें, तो उनसे यह न पूछना कि कहाँ गए थे।"
"तो क्या पूछूँ?"
उन्होंने सुई उठाई।
और सुई में धागा डालते हुए बोले, "यह पूछना — सुबह की चाय पी ली या नहीं।"
मैं दुकान से निकला।
बाहर आसमान में पहली किरण आ रही थी।
और गली जाग रही थी।
लेकिन यह जागना नहीं था। यह उठना था।
जैसे कोई बीमार आदमी करवट बदलता है, हाँफते हुए, आँखें खोले बिना।
मैंने गली के बीच में खड़े होकर एक लंबी साँस ली।
और मैंने अपनी आवाज़ वो आवाज़ बनाई जो पापा के जाने के बाद बनी थी — पहले से थोड़ी ज़्यादा कड़क, थोड़ी ज़्यादा ऊँची।
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