The Mysterious Bell – Chapter 727
"मेरे साथ टिंकू है।" मैंने दरवाज़े की तरफ़ देखा। "और माँ का यहाँ रहना ज़रूरी है। समझ रही है ना?"
काजल ने माँ की तरफ़ देखा। माँ दीये के पास खड़ी थीं, काग़ज़ हाथ में, और उनका चेहरा ऐसा था जैसे उन्होंने हज़ार बातें सोच ली हों, और एक भी नहीं कह पा रही हों।
"ठीक है," काजल ने कहा। "पर भैया…"
"हाँ?"
"पापा को लेकर आना।"
मैंने सिर हिलाया। "लाऊँगा।"
मैंने काग़ज़ पापा की कॉपी के बीच रखा, दोनों को अपनी छाती से लगाया, और कमरे से बाहर निकला।
दरवाज़े पर टिंकू खड़ा था।
नंगे पैर नहीं।
जूते पहने हुए।
बिना कुछ कहे। जैसे उसने सब सुन लिया हो। जैसे उसने पहले से जान लिया हो कि रात में कभी ऐसा मौक़ा आएगा, और उसके लिए जूते तैयार रखने हैं।
"तू कहाँ?" मैंने पूछा।
"आपके साथ।"
"मैंने कब कहा?"
"आपने नहीं कहा," उसने कहा। "मैंने सुना।"
"क्या सुना?"
"दरवाज़ा।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "आपके कमरे का दरवाज़ा खुद खुला। मैंने सुना। और मैंने देखा भी।"
मैं ठिठका।
"देखा?"
"बोरी के पीछे से।" उसने कहा। "आप खड़े थे। दरवाज़ा खुला। हवा नहीं थी।"
"तो फिर बताता क्यों नहीं?"
"क्योंकि मैं डर गया था।" उसने कहा, आवाज़ धीमी। "और अब नहीं डर रहा।"
मैंने उसका कंधा पकड़ा।
"सुन।" मैंने कहा। "अगर मैं कहूँ रुक जा, तो तू रुक जाएगा।"
वो कुछ नहीं बोला।
"टिंकू।"
"रुक जाऊँगा," उसने कहा। "पर पहले आप रुकेंगे।"
मैं हँसा।
मुश्किल में हँसना आता है ना? कभी-कभी तो हँसी ही आख़िरी चीज़ होती है जो आदमी के पास बचती है।
"चल," मैंने कहा।
बाहर निकले।
गली में चाँदनी और अंधेरे के बीच की वो ऊँची रात थी, जब पूरा मोहल्ला सोता है और सिर्फ़ कुत्ते जागते हैं।
मैंने टॉर्च जलाई।
और मैंने निशानों को फिर देखा।
पर इस बार मैंने ध्यान से देखा।
और मैं रुक गया।
क्योंकि पहले मुझे सिर्फ़ एक जोड़ी निशान दिख रही थी। अब दो दिख रही थीं।
काजल और माँ को दिखाने से पहले मैंने खुद झुककर देखा था।
पहला निशान — चप्पल का। रबर के तलवे का, आम सा। जैसे किसी ने घर के बाहर चप्पल उतारी हो और फिर पहनकर चला हो। चप्पल का निशान लंबा था, पैर छोटा।
दूसरा निशान — अलग था।
लकड़ी का।
मैंने टॉर्च झुकाई।
वो जूते नहीं थे। वो थे — खड़ाऊँ।
लकड़ी के जूते। जैसे साधु पहनते हैं। या…
या जैसे कोई पुराना आदमी पहनता है।
मेरे हाथों की उँगलियाँ ठंडी हो गईं।
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। "उस्ताद?"
"ये खड़ाऊँ हैं," मैंने कहा। "लकड़ी के जूते।"
"कौन पहनता है आजकल?"
"कोई भी नहीं।" मैंने कहा। "कोई भी नहीं।"
मैंने टॉर्च आगे बढ़ाई।
और मुझे तीसरा निशान दिखा।
पर ये पैर का नहीं था।
बेलन जैसा। लंबा। चौड़ा।
जैसे कोई घिसटकर गया हो।
मैंने टिंकू की तरफ़ देखा।
उसने भी देखा।
"ये आदमी घसीट कर लाया गया?" उसने पूछा।
"या खुद घसीटकर आया," मैंने कहा।
"क्यों आएगा कोई खुद घसीटकर?"
मैंने कुछ नहीं कहा।
क्योंकि यही सवाल मेरे अंदर भी चल रहा था, और मुझे डर था कि अगर जवाब सोचा तो आँखों से नींद हमेशा के लिए चली जाएगी।
टिंकू ने दहलीज़ पर झुककर निशानों को गौर से देखा।
"उस्ताद।"
"हाँ।"
"ये निशान घर की तरफ़ आ रहे हैं। जा नहीं रहे हैं।"
मैंने साँस रोकी।
"क्या कहा?"
"देखिए।" उसने उँगली रखी। "चप्पल का निशान — पंजा यहाँ, पीछे की तरफ़ बाहर। माने पैर आ रहा है। अगर जा रहा होता, तो पंजा पीछे होता, और एड़ी आगे।"
मैंने अपने हाथ से उँगली निशान पर रखी।
वो सही कह रहा था।
ये निशान भीतर आ रहे थे।
फिर दूसरे निशान — खड़ाऊँ — भी।
और फिर वो घसीटने वाला निशान भी।
तीनों… घर की तरफ़।
मैं सीधा खड़ा हुआ।
और मेरी जेब से घंटी फिर फुसफुसाई, इतने धीमे से कि जैसे कोई दूसरी गली में बोल रहा हो।
"अंकुश।"
"हाँ।"
"पापा यहाँ से निकले।"
"कहाँ से?"
"यहीं से। दहलीज़ से।"
मैंने चारों तरफ़ देखा।
"तो फिर कब निकले?"
"जब तू अपने कमरे में कॉपी उठा रहा था।"
मैं वहीं खड़ा रह गया।
मैं उसी वक़्त कॉपी उठा रहा था, जब पापा…
माने वो उसी वक़्त चले गए।
मुझे बस उनकी चश्मा और लाठी छोड़कर।
उन्होंने जान-बूझकर छोड़ा।
छोड़ा ताकि मैं जानूँ कि वो गए कहाँ नहीं, गए कैसे।
या छोड़ा ताकि मैं जानूँ कि वो अब वापस नहीं।
नहीं।
ऐसा नहीं सोचते।
हम अंकुश यादव के घर में हैं। यहाँ लोग वापस आते हैं। और मैं उन्हें लेकर आऊँगा।
"टिंकू।"
"हाँ।"
"तेरे पास टॉर्च है?"
"नहीं।"
"मेरी दूसरी टॉर्च रखी है दुकान के पीछे के ट्रंक में। जा ले आ।"
वो दौड़ा।
मैं अकेला रह गया — निशानों के बीच।
और फिर वो किया जो शायद नहीं करना चाहिए था।
मैं झुका।
मैंने उँगली खड़ाऊँ के निशान पर रखी।
लकड़ी की बनावट मुझे ज़मीन पर महसूस होने लगी — पानी अभी भी हल्का गीला। ठंडा।
और उसी पल…
मेरी जेब में घंटी बजी।
नहीं हिली। बजी।
पूरी आवाज़ से।
चाँदनी में वो आवाज़ फैल गई, जैसे किसी ने दो पत्थरों को एक साथ मारा हो।
और घंटी बोली, वो आवाज़ जो एक बार में ही पूरी कहानी कह गई —
"ये जूते पहले भी तेरे दरवाज़े पर आ चुके हैं।"
मैं उँगली निशान पर ही रखे हुए था।
मेरा शरीर जम गया।
क्योंकि मुझे पता था।
मुझे पता था कि ये जूते कहाँ से आते हैं।
लकड़ी के जूते।
खड़ाऊँ।
पुराने बाज़ार के पुराने रास्ते।
वही रास्ता, जिस पर मीरा और मैंने एक बार पीछा किया था।
वही जूते, जिनके निशान एक बार मेरे घर के पीछे वाले रास्ते में भी मिले थे।
मैंने उँगली उठाई।
टॉर्च इधर-उधर घुमाई।
टिंकू दौड़कर वापस आया, हाथ में दूसरी टॉर्च, और साँस फूली हुई।
"मिल गई।"
"टिंकू।"
"हाँ।"
"ये निशान जिस जगह जाकर खत्म हुए हैं…" मैंने टॉर्च से इशारा किया। "वहीं से शुरू भी हुए हैं।"
वो रुक गया।
"माने?"
"माने कोई बाहर से आया, दरवाज़े तक पहुँचा, फिर लौट गया। और पापा उसके साथ गए।"
"कैसे पता?"
"क्योंकि पापा के पैरों के निशान नहीं हैं।"
टिंकू ने देखा। टॉर्च घुमाया।
सच। पापा के पैरों के निशान नहीं थे।
केवल चप्पल के। खड़ाऊँ के। और वो तीसरा घसीटने वाला।
"पापा कैसे गए तो?"
मेरा गला सूख गया।
"मुझे नहीं पता," मैंने कहा। "पर मुझे पता है कि यह लकड़ी का जूता किसका है।"
मैंने टिंकू का हाथ पकड़ा।
"चल।"
"कहाँ?"
"पहले रामलाल चौकीदार के पास।"
"क्यों?"
"क्योंकि उसने कहा था — एक आदमी रोज़ सुबह आठ बजे पुराने बिजलीघर के दरवाज़े पर दो खटखटें देकर दो मिनट खड़ा रहता है।"
"तो?"
"तो उस आदमी के पैरों में या तो लोहे के जूते होंगे, या लकड़ी के।"
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा।
"उस्ताद।"
"हाँ।"
"अगर वो पहले से हमारे घर के अंदर है?"
मैं रुका।
मैंने पीछे मुड़कर घर को देखा।
माँ दरवाज़े पर खड़ी थीं। काजल उनके पीछे।
और मुझे लगा… कि घर अब पहले जैसा नहीं है।
घर अब घर नहीं रहा।
घर अब रास्ता बन गया है।
"अगर वो अंदर है," मैंने कहा, "तो हम उसे बाहर निकालेंगे।"
"कैसे?"
"क्योंकि जिसके पास घंटी है, वो कभी अकेला नहीं होता।"
मैंने घंटी जेब से निकाली।
उसे हथेली पर रखा।
वो ठंडी नहीं थी।
वो गुनगुनी थी।
जैसे किसी ने अभी-अभी उसे छुआ हो।
और मैंने एक बात नहीं बताई टिंकू को।
घंटी की आवाज़ में जो आख़िरी शब्द बचे थे, वो मैंने सिर्फ़ सुने थे।
"और अंकुश…"
"हाँ।"
"वो तीसरा निशान।"
"हाँ।"
"वो घसीटने का नहीं।"
"…तो?"
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