The Mysterious Bell – Chapter 729
"सब सुनो।"
शबनम आपा ने गुमटी का चूल्हा बंद किया।
उस्ताद बाहर आए।
टिंकू फ़ोन लेकर भागता हुआ आया, "मीरा दीदी निकल पड़ीं।"
काजल स्कूल के मोड़ से आ रही थी, नर्सिंग की किताब दबाए, आँखें लाल।
और बच्चे — सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़, चिंटू — पीपल की चबूतरी से उतरकर दौड़ते हुए आने लगे, जैसे उन्हें पहले से पता था कि आज सुबह मुझे उनकी ज़रूरत पड़ेगी।
"गली दो हिस्सों में बँटेगी।" मैंने कहा। "मीरा, तू, टिंकू और मैं साइकिल पर गली-गली। उस्ताद, आप दुकान पर रहिए, कोई आए तो पूछिए, कोई कुछ बताए तो लिखिए। शबनम आपा —"
"मैं अस्पताल।" उन्होंने चूल्हे की आग पर आख़िरी पानी डाला, और चटचटाहट के साथ आग बुझी। "तुम्हारी माँ के पास कोई नहीं है। काजल रात भर रोई है। अब मैं रहूँगी।"
"पर आपा —"
"बेटा।" उन्होंने लोहे की चिमटी उठाई। "मैं पंद्रह साल अपनी बहन से नहीं बोली। पंद्रह साल में मैंने एक भी बार एक औरत से यह नहीं पूछा कि तू कैसी है। आज मैं तेरी माँ से पूछने जा रही हूँ। तू मुझे मना करेगा, तो मैं वही करूँगी जो मुझे करना है। इसलिए मना मत कर।"
मैंने सिर झुकाया।
और काजल ने आगे आकर, सबके सामने, वो कहा जो उसने रास्ते भर में बार-बार अंदर ही अंदर दोहराया था।
"डर में आदमी काग़ज़ पर नहीं, सबसे पहले अपने आप पर हस्ताक्षर करता है।"
सब चुप हो गए।
"क्या मतलब, काजल?" मैंने पूछा।
"मतलब, पापा ने अंगूठा डर से लगाया था, यह हम सब जानते हैं।" उसने आँखें साफ़ करते हुए कहा। "लेकिन एक बात हम सब भूल रहे हैं। उन्होंने वो अंगूठा लगाया, उससे पहले उन्होंने खुद से यह लिख दिया था कि 'मैं कमज़ोर हूँ'। और अब जब वो अपना नाम मिटाने गए हैं, तो वो उसी काग़ज़ को नहीं मिटाने गए हैं — वो उस लाइन को मिटाने गए हैं, जो उन्होंने खुद अपने मन पर लिखी थी।"
मेरा गला भर आया।
"काजल।"
"और सुन।" उसने किताब मेरे हाथ में थमाई, जैसे कोई हथियार दे रही हो। "पापा नहीं लौटे, तो इसका मतलब वो हारे नहीं हैं। हारा हुआ आदमी अपना नाम मिटाने नहीं जाता। हारा हुआ आदमी अपना नाम बदल लेता है।"
वो रुकी।
"पापा लड़ने गए हैं।"
फिर वो टिंकू की तरफ़ मुड़ी और बोली, "और अगर तुम सबको बचाना है तो पहले यह मानना पड़ेगा कि हम सब डर रहे हैं। डर को छिपाने से वो बढ़ता है।"
टिंकू ने सीधा जवाब दिया, "दीदी, मैं डर रहा हूँ।"
"अच्छा किया।" काजल ने कहा। "अब वो डर तेरे साथ चलेगा, तेरे आगे नहीं।"
उसी वक़्त मीरा की साइकिल घिसटती हुई आई।
वो रुकी नहीं। ब्रेक मारे, और साइकिल मेरे सामने रुकी।
"अंकुश।" उसकी साँस फूली हुई थी।
"क्या हुआ?"
"सुबह-सुबह।" उसने कैमरा उतारा। "पुराने बिजलीघर की तरफ़ दो आदमी जाते देखे।"
"कौन?"
"वही दो। जो रणवीर के साथ थे।" उसने कहा। "एक के हाथ में बंद लिफ़ाफ़ा था। दूसरे के हाथ में लोहे की लंबी पट्टी। और दोनों बिजलीघर के दरवाज़े पर कुछ करके आए हैं।"
मैंने टिंकू की तरफ़ देखा।
"आज कुछ होने वाला है।" मीरा ने कहा। "मुझे कुछ नहीं पता, पर यह जो आज सुबह मैंने देखा है, यह मज़दूरी करने वाले आदमी नहीं थे। ये ताले लगाने वाले आदमी थे।"
मैंने साइकिल उठाई।
"मीरा।"
"हाँ।"
"तू पीछे बैठ। टिंकू आगे।"
"मैं?" टिंकू ने कहा। "आगे?"
"तुझे बिजलीघर का रास्ता पता है?"
"हाँ।"
"तो आगे तू।"
"उस्ताद।" टिंकू ने कहा। "आप ठीक हैं?"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"नहीं।"
"तो फिर?"
"इसीलिए तू आगे बैठ।" मैंने कहा। "जब मैं ठीक नहीं हूँ, तब जो ठीक है उसे आगे रखता हूँ।"
वो हँसा।
और उस हँसी में कुछ ऐसा था कि मेरी छाती थोड़ी हल्की हो गई।
हम निकले।
मीरा पीछे बैठी, कैमरा गोद में। टिंकू आगे, और मैं पैडल मारता हुआ।
गली का पहला मोड़ आया। फिर दूसरा।
रास्ते में शबनम आपा गुमटी का ताला लगा रही थीं। उन्होंने ताला लगाया — और ताले को दो बार हिलाकर जाँचा।
"आपा, इतनी जल्दी?"
"चूल्हा बंद है।" उन्होंने कहा। "जब तक सच नहीं खुलता, मेरी गुमटी में चाय नहीं बनेगी।"
"आपा, यह —"
"अंकुश।" उन्होंने मेरी साइकिल का हैंडल पकड़ा और रोका। "एक बात कहूँ?"
"कहिए।"
"जब तू छोटा था, तेरे पापा रोज़ सुबह मेरी गुमटी पर एक चाय पीते थे। कभी बोलते नहीं। बस पीकर चले जाते।" वो रुकीं। "फिर एक दिन आना बंद हो गए। मैंने पाँच साल सोचा कि नाराज़ हैं।"
"और?"
"और आज मुझे पता चला कि उनके पास चाय के पैसे नहीं थे।" उनकी आवाज़ भारी हुई। "पाँच साल में मैंने एक बार भी नहीं पूछा कि शंकर भाई, चाय नहीं?"
मैंने सिर झुकाया।
"आपा, यह आपकी ग़लती नहीं है।"
"हर गली की एक ग़लती होती है बेटा।" उन्होंने मेरी साइकिल का हैंडल छोड़ा। "और वो ग़लती यह है कि हम पूछना बंद कर देते हैं। चाय से हम हिसाब रखने लगते हैं।"
वो गुमटी की तरफ़ मुड़ीं।
"मैं तेरी माँ के पास जा रही हूँ। और आज तेरी माँ को वो चाय पिलाऊँगी, जो मैंने पंद्रह साल किसी को नहीं पिलाई।"
हम आगे बढ़े।
साइकिल धीरे थी, पर हम तेज़ चल रहे थे।
पहली गली — कुछ नहीं।
दूसरी गली — बूढ़ा किराने वाला अपनी बोरी सीधी कर रहा था। पूछा तो बोला, "रात को कोई नहीं दिखा।"
तीसरी गली — नल का पक्का घेरा, पानी का छपाका। कुछ नहीं।
चौथी गली — भोला भाई की दुकान। शटर आधा गिरा था। भोला भाई अंदर बैठे थे, झुके हुए।
"भोला भाई।"
वो उठे।
"अंकुश।"
"रात को कुछ दिखा?"
वो रुके।
"दिखा।" उन्होंने धीरे से कहा।
मैं साइकिल से उतरा।
"क्या दिखा?"
"रात लगभग साढ़े ग्यारह बजे मैं दुकान बंद कर रहा था।" उन्होंने कहा। "और फिर मैंने देखा — तेरे पापा।"
मेरा दिल धक्क से रह गया।
"कहाँ?"
"बिजलीघर की तरफ़ जाते हुए।" उन्होंने कहा। "पर अकेले नहीं।"
"किसके साथ?"
"उसके आगे एक आदमी था। सफ़ेद कुर्ता। टोपी — आँखों तक झुकी हुई। और पैरों में लकड़ी के जूते।" उन्होंने अपना कंधा सहलाया। "टक, टक। मुझे आज भी वो आवाज़ सुनाई दे रही है।"
"और पापा?"
"तेरे पापा उसके पीछे-पीछे जा रहे थे।" भोला भाई ने कहा। "पर अजीब बात यह थी — तेरे पापा के पैर ज़मीन पर नहीं पड़ रहे थे।"
मेरा गला सूख गया।
"कैसे?"
वो रुके।
"मुझे नहीं पता।" उन्होंने कहा। "पर वो चल नहीं रहे थे, अंकुश। वो खींचे जा रहे थे।"
मीरा ने मेरा हाथ दबाया।
"अंकुश।" उसने धीरे से कहा।
मैंने आँखें बंद कीं।
फिर खोलीं।
"भोला भाई, धन्यवाद।"
"कहाँ जा रहे हो?"
"वहीं।"
"अकेले?"
"नहीं।" मैंने साइकिल उठाई। "अभी अकेले नहीं हूँ।"
हम निकले।
पाँचवीं गली के मोड़ पर सानिया मिली।
दौड़ती हुई आई, चप्पल हाथ में।
"अंकुश भैया!"
मैंने ब्रेक मारे।
"सानिया?"
"भैया, चिंटू ने कुछ देखा है!"
"क्या?"
"चिंटू!" वो चिल्लाई।
चिंटू दौड़ता हुआ आया, और रास्ते में उसने अपनी ही चप्पल पर पैर रखकर ठोकर खा ली।
वो गिरा।
"चिंटू!"
वो उठा, घुटने पर पट्टी बँधी हुई थी, धूल झाड़ी, और बोला, "भैया, देखिए!"
उसने ज़मीन पर मिट्टी में बने निशान की तरफ़ उँगली की।
"यह किसका पैर है?"
मैं झुका।
निशान छोटा था। चप्पल का। और बहुत ही परिचित।
टिंकू ने वो निशान देखा।
फिर चिंटू के पैर देखे।
फिर उसका चेहरा।
"चिंटू।"
"हाँ भैया?"
"तू जासूस नहीं है।"
"क्यों?"
"तू सबूत है।"
चिंटू का मुँह खुला रह गया।
सानिया हँसी।
गुड्डू और रफ़ीक़ पीछे से आए, दोनों हाँफ रहे थे।
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