The Mysterious Bell – Chapter 724
टिंकू मेरे पीछे खड़ा था और मैंने उसका हाथ अपनी पीठ पर महसूस किया। वो डर के मारे मेरी कमीज़ की तह पकड़े हुए था, पर भागा नहीं।
पापा ने ढक्कन उठाया।
धीरे। बहुत धीरे। जैसे कोई पुराना ज़ख़्म खोलता हो।
ढक्कन के किनारे ने लोहे की कराह जैसी आवाज़ की। हवा अंदर से बाहर निकली, और इस बार वो सिर्फ़ ठंडी नहीं थी। उसमें बदबू थी — जला हुआ काग़ज़, और उसके पीछे एक हल्की सी गंध, पुरानी स्याही की, जैसे कोई पुराना दफ़्तार खुला हो।
मैंने अंदर टॉर्च की।
बक्सा खाली था।
बिल्कुल खाली।
फ़र्श पर सिर्फ़ एक पतली परत थी, राख जैसी, और उस पर कुछ लकीरें, जैसे कोई उँगली से लिखकर मिटा गया हो।
और फिर आवाज़ आई।
बक्से के अंदर से नहीं।
मेरे ठीक सामने से। उस खालीपन के बीच से।
एक आवाज़, जो बूढ़ी थी, दबी हुई थी, और जिसमें एक अजीब सी अपनाइट थी। जैसे कोई बहुत पुराना रिश्तेदार बरसों बाद बुला रहा हो, पर बुलाने में गुस्सा न हो, सिर्फ़ शिकायत हो।
"शंकर।"
पापा का हाथ मेरे हाथ में सख़्त हो गया।
"शंकर, तूने वादा तोड़ दिया।"
पापा की आँखें बंद हो गईं।
और मैंने, उस पल, अपनी जेब में घंटी को ठंडा होते महसूस किया। पूरी तरह ठंडा। इतना ठंडा कि जैसे वो वहाँ हो ही नहीं।
और घंटी ने कुछ नहीं कहा।
पहली बार, जब मुझे उसकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी, उसने कुछ नहीं कहा।
॥
आवाज़ अंदर से नहीं आई। वो उस खालीपन के बीच से आई, जैसे कोई बरसों से बंद कमरे में बैठा हो और बाहर किसी की परछाईं देखकर बोल उठा हो।
"शंकर। तूने वादा तोड़ दिया।"
पापा के घुटने उसी वक़्त मुड़े।
मैंने उन्हें पकड़ना चाहा। मेरा हाथ उनकी बाँह तक पहुँचा भी, पर वो पहले ही ज़मीन पर बैठ चुके थे। घुटनों के बल। दोनों हाथ बक्से के किनारे पर, और सिर झुका हुआ, जैसे कोई मंदिर में नहीं, किसी के सामने माफ़ी माँगने बैठा हो।
"पापा।"
उन्होंने जवाब नहीं दिया।
"पापा, उठिए।"
"रुक जा बेटा," उन्होंने कहा। आवाज़ बहुत धीमी थी, पर साफ़। "रुक जा। ये मेरी जगह है। मैं यहीं रहूँगा।"
टिंकू ने मेरी कमीज़ की तह पकड़ ली। उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं, पर वो पीछे नहीं हटा। मैंने उसका हाथ नहीं छुड़ाया।
मीरा दहलीज़ पर खड़ी थी। कैमरे की लाल बत्ती उसके चेहरे पर पड़ रही थी और उसकी साँस इतनी धीमी थी कि लगता था वो साँस लेना भूल गई है।
रणवीर बक्से से चार कदम दूर खड़ा था। उसके सफ़ेद जूतों पर इस जगह की धूल नहीं लगी थी, जैसे धूल भी उससे दूर ही रहती हो। उसके चेहरे पर कोई जीत नहीं थी। सिर्फ़ एक अजीब सी शांति थी, जो मुझे हँसी से भी ज़्यादा डरावनी लगी।
बक्से से फिर आवाज़ आई।
"पच्चीस साल। पच्चीस साल तूने मुझे बंद रखा, शंकर। और मैं तेरा इंतज़ार करता रहा।"
पापा ने सिर उठाया। उनकी आँखों में पानी था, पर वो बह नहीं रहा था। जैसे अंदर ही अंदर सब सूख गया हो।
"मैं आया था," पापा ने कहा। "मैं आया था। बार-बार आया। पर डर गया। हर बार डर गया।"
"हाँ," आवाज़ ने कहा। "डर गया। और डर के बदले मुझे क्या दिया? आधा सच। आधी बात।"
पापा ने मेरी तरफ़ देखा।
उस पल उनकी आँखों में जो था, वो मैंने पहले कभी नहीं देखा। शर्म नहीं थी। गुस्सा नहीं था। एक अजीब सी सफाई थी, जैसे कोई बहुत दिनों से जूते में फँसा कंकड़ निकालने की हिम्मत कर रहा हो।
"बेटा," उन्होंने कहा, "तेरे दादा भी इसी बक्से के पास आए थे।"
मैं ठिठक गया।
"क्या?"
"पच्चीस साल पहले," उन्होंने कहा। "जब यह बिजलीघर चलता था। तब यहाँ बक्से नहीं थे। यहाँ तार थे, लोहे की बड़ी चीज़ें थीं, और एक कोने में यह जगह थी। तेरे दादा यहाँ आते थे। किसी से मिलने। कोई उनसे मिलने आता था।"
"कौन?"
"मुझे नहीं पता," उन्होंने कहा। "मैं उस वक़्त जवान था और मुझे लगता था कि बाप की बातों में दम है। पर एक दिन वो यहाँ से लौटे और बदल गए।"
उन्होंने रुककर साँस ली। उनकी साँस में सीटी जैसी आवाज़ थी।
"बदल गए कैसे?" मैंने पूछा।
"बोलना बंद कर दिया," पापा ने कहा। "पहले वो दुकान पर बैठकर सबसे हँसते थे। गली के बच्चों को साइकिल मुफ़्त में ठीक कर देते थे। फिर अचानक बंद। वो दुकान में आते, काम करते, और घर आकर हिसाब की कॉपी खोलकर बैठ जाते। रात भर। मैंने एक बार पूछा तो उन्होंने सिर्फ़ इतना कहा कि दुकान का काग़ज़ साफ़ होना चाहिए।"
"काग़ज़?" मैंने कहा।
"हाँ। काग़ज़। वही शब्द। काग़ज़ साफ़ होना चाहिए।"
मेरी जेब में घंटी ठंडी थी। इतनी ठंडी कि मुझे लगा जैसे जेब में कुछ नहीं, सिर्फ़ ठंडक है।
"और तेरे दादा यहाँ से जो लौटकर आए," पापा ने कहा, "वो अपने साथ एक डर लेकर आए। ऐसा डर जो बोलता नहीं, बस बैठा रहता है। मैंने वो डर देखा और मैंने सोचा कि मैं ऐसा नहीं बनूँगा।"
वो हँसे। बहुत छोटी, टूटी हँसी।
"और मैं वही बन गया।"
"पापा—"
"अब सुन," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में कुछ ऐसा आया जो मैंने उनमें कभी नहीं सुना था। हुक्म। "मैंने अंगूठा लगाया था। हाँ। मैंने लगाया था। उस रात, उस दफ़्तार में, उस मेज़ पर।"
मेरा मुँह सूख गया।
"मैंने झूठ नहीं बोला था, बेटा," उन्होंने कहा। "मैंने कहा था कि मैंने अंगूठा लगाया। पर वो काग़ज़ वो नहीं था जो तूने देखा।"
"मतलब?"
"मैंने जिस काग़ज़ पर अंगूठा लगाया," पापा ने कहा, "उस पर सिर्फ़ मेरा नाम था। ऊपर। एक लाइन। बस। मैंने पूछा कि ये क्या है, तो कहा गया कि ये दुकान के काग़ज़ का हिस्सा है, बाक़ी काग़ज़ बाद में आएगा। और मैंने लगा दिया। क्योंकि उस वक़्त तेरी माँ अस्पताल में थी और मेरे पास सिर्फ़ दो रास्ते थे—काग़ज़ पर अंगूठा, या बिना दवा के घर।"
उन्होंने अपनी हथेली देखी। उस पर कोई निशान नहीं था, पर वो देख रहे थे, जैसे निशान वहीं हो।
"और फिर," उन्होंने कहा, "वो काग़ज़ मेरे हाथ से छिन गया।"
"छिन गया?" मैंने कहा। "किसने छीना?"
"मैंने लगाया," पापा ने कहा, "और जैसे ही मैंने लगाया, वहाँ खड़े आदमी ने वो काग़ज़ उठाया, मोड़ा, और अपनी जेब में रख लिया। मैंने कहा कि मुझे उसकी नकल चाहिए। उसने कहा कि बाद में मिलेगी। मैंने कहा कि कम से कम मुझे दिखा दो कि मैंने किस चीज़ पर अंगूठा लगाया। उसने कहा—बेटा, जिस काम के लिए आए हो, वो हो गया। अब जाओ।"
पापा ने मेरी तरफ़ देखा।
"और मैं चला आया," उन्होंने कहा। "पच्चीस साल से मैं उसी रास्ते पर चल रहा हूँ, जो उस रात से शुरू हुआ था, और आज तक मुझे पता नहीं कि मैंने किस चीज़ पर अंगूठा लगाया। जो काग़ज़ तूने देखा, वो मेरा लगाया हुआ नहीं है। मेरा अंगूठा उस पर है नहीं। और मैं इतने साल इसी शर्म में जीता रहा कि मैंने कुछ ऐसा किया होगा जिसका हिसाब मैं खुद नहीं दे सकता।"
बक्से से आवाज़ आई। धीमी। बूढ़ी। और इस बार उसमें गुस्सा नहीं था। थकान थी।
"अब बोल, शंकर," आवाज़ ने कहा। "जो बोला नहीं, वो अब बोल। वरना मैं फिर बंद हो जाऊँगा।"
मैंने पापा का कंधा पकड़ा। मेरे हाथ में पापा की हड्डी इतनी साफ़ महसूस हुई जैसे कोई चीज़ हो जो बस टिकी हुई है। मैंने मन में सोचा कि अगर इस वक़्त भी कुछ नहीं हुआ, तो फिर कभी नहीं होगा।
और तभी फाटक की तरफ़ से आहट आई।
दो जोड़ी चप्पलें। एक तेज़, एक धीमी।
मैंने पलटकर देखा।
काजल पहले आई, दौड़ती हुई। उसके हाथ में दवा की प्लास्टिक थैली थी, जो उसने चलते-चलते किसी तरह सँभाली हुई थी। और उसके पीछे, धीरे-धीरे, माँ।
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