The Mysterious Bell – Chapter 725
माँ के हाथ में बैसाखी थी। उनका दुपट्टा कंधे से खिसका हुआ था। उन्होंने चेहरा नहीं ढका। उन्होंने कुछ नहीं कहा। वो सीधे चलीं।
बक्से तक।
उन्होंने पापा को घुटनों पर देखा, और उनके चेहरे पर कोई रोना नहीं आया। सिर्फ़ एक चीज़ आई, जो बहुत दिनों से अंदर पड़ी थी।
"उठो," माँ ने कहा।
"सुशीला—"
"उठो," माँ ने दोहराया। "तुम बैठोगे, तब मैं बोलूँगी नहीं। और आज मुझे बोलना है।"
पापा उठे। टिंकू ने फौरन उनका हाथ पकड़ लिया। पापा ने उसका हाथ देखा, फिर उसका सिर सहलाया, जैसे कह रहे हों—तू ठीक है, बेटा।
माँ ने अपनी बैसाखी मेरी तरफ़ बढ़ा दी। मैंने पकड़ ली। फिर वो बक्से के सामने खड़ी हुईं और एक पल को सब चुप हो गए।
"तुम सब ये सोच रहे हो," माँ ने कहा, "कि मैं यहाँ क्यों आई। मैं यहाँ इसलिए आई कि मेरे घर का आदमी पच्चीस साल से एक काग़ज़ के नीचे दबा हुआ है और मैं बाईस साल से उसे देख रही हूँ।"
उन्होंने रुककर साँस ली।
"और आज मैं वो बात बोलूँगी जो मैंने आज तक नहीं बोली।"
मैंने माँ की तरफ़ देखा।
"वो अंगूठा," माँ ने कहा, "जो उस जली रसीद पर है—वो तुम्हारे पापा का नहीं है।"
"मैंने अभी बताया," पापा ने कहा।
"तुमने आधा बताया," माँ ने कहा, और उनके मुँह से आधा शब्द ऐसे निकला जैसे कोई चाकू घिस रहा हो। "अब पूरा मैं बताऊँगी।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"बेटा, वो अंगूठा किसी और का है।"
"किसका?"
माँ ने एक पल आँखें बंद कीं।
"किसी औरत का," उन्होंने कहा।
हवा रुक गई।
मुझे लगा जैसे पूरे बिजलीघर की धूल भी सुन रही है।
"मैंने वो रसीद देखी थी," माँ ने कहा। "एक बार, जब तुम्हारे पापा उसे कमीज़ की जेब में रखकर सो गए थे। मैंने निकालकर खिड़की की रोशनी में देखा। उस पर अंगूठा था, पर वो अंगूठा पापा के हाथ का नहीं था। पापा का अंगूठा चौड़ा है, भारी है। उस पर बना निशान पतला था। छोटा था।"
उन्होंने अपनी उँगली उठाई।
"किसी औरत का हाथ।"
किसी ने कुछ नहीं कहा।
उस्ताद दहलीज़ के पास खड़े थे। उन्होंने अपना चश्मा उतारा, पोंछा, फिर लगाया, जैसे देखना चाहते हों कि सुनी हुई बात सच है या नहीं।
शबनम आपा ने अपना हाथ मुँह पर रख लिया।
बंसीलाल ने धीरे से कहा, "राम राम।"
और रणवीर ने हँसना शुरू किया।
पहले बहुत धीमे। फिर पूरे मुँह से। एक ऐसी हँसी जिसमें मज़ाक नहीं था, सिर्फ़ एक राहत थी — जैसे कोई बहुत देर से एक तार खींच रहा हो और अब वो टूट गया हो।
"बहुत बढ़िया," उसने कहा। "बहुत बढ़िया। मैं इंतज़ार कर रहा था कि इस घर से ये लाइन कब निकलेगी।"
उसने कदम बढ़ाया और बक्से के किनारे पर हाथ रख दिया। इस बार उसकी आवाज़ में वो मिठास नहीं थी। सिर्फ़ एक सूखी सी सच्चाई थी।
"शंकर भाई," उसने कहा, "तुमने अभी तक ये नहीं सोचा कि उस रात तुम्हारे काग़ज़ पर अंगूठा किसने लगाया? तुम्हें लगता है वो कोई गरीब औरत थी? कोई मजबूर औरत? नहीं। वो वो औरत थी जो उस कमरे में सबसे ज़्यादा हँस रही थी।"
मैंने मुट्ठी बाँध ली।
"और अब," रणवीर ने कहा, और उसने अपने दोनों हाथ जोड़ लिए, जैसे किसी समारोह में धन्यवाद दे रहा हो, "असली खेल शुरू होगा।"
"तुम्हारा खेल?" मैंने कहा।
"हाँ," उसने कहा। "तुम सब ये सोच रहे हो कि तुमने कुछ खोज लिया। एक अंगूठा। एक औरत। एक काग़ज़। बेटा, तुमने अभी सिर्फ़ दरवाज़ा छुआ है। कमरा बाक़ी है।"
उसने मेरी तरफ़ देखा और उसकी आँखों में वो चीज़ आई जो मुझे सबसे ज़्यादा डराती है — धैर्य। वो किसी चीज़ की जल्दी में नहीं था।
"कल सुबह सात बजे," उसने कहा, "मशीन। तीन दिन में दुकान। ये तारीख़ें मेरी नहीं, तुम्हारे अपने काग़ज़ों की हैं। मैं तो सिर्फ़ मेज़ पर बैठा हूँ।"
और वो मुड़ा।
जाते-जाते वो रुका, पर पलटा नहीं।
"और हाँ," उसने कहा, "उस औरत का नाम मुझे पता है। तुम्हारे घर में भी पता है। बस कोई लेना नहीं चाहता।"
वो गया।
उसके जाने के बाद बक्से से कोई आवाज़ नहीं आई। जैसे उसके पैरों की आवाज़ के साथ ही वो चुप हो गया हो।
मैंने झुककर बक्से में फिर देखा। राख। लकीरें। और कुछ नहीं।
"इसने सुना," पापा ने धीमे से कहा। "इसने सब सुना और चुप रहा।"
माँ ने अपनी साड़ी का पल्लू सीधा किया।
"आज घर चलो," उन्होंने कहा। "सब। आज कोई अलग नहीं सोएगा।"
उस रात घर में सब थे।
उस्ताद दुकान के बाहर चारपाई पर लेटे। शबनम आपा गुमटी का चूल्हा बंद करके आँगन में बैठी रहीं, और कहा कि मैं आज घर नहीं जाऊँगी। बंसीलाल फाटक की चारपाई पर ही सो गए। काजल ने माँ के पास चटाई बिछाई। टिंकू को उसकी माँ ने बुला लिया था, पर वो आधी रात को फिर आ गया और दुकान के पीछे बोरी पर बैठ गया। मैंने उसे देखा, पर कुछ नहीं कहा। कुछ बातें बिना बोले ही ठीक होती हैं।
पापा आज कुछ नहीं बोले। खाना खाया, पानी पिया, और अपने कमरे में चले गए।
मैंने उन्हें देखा। उनकी पीठ पहले से ज़्यादा झुकी लग रही थी, और ये झुकाव सिर्फ़ कमर का नहीं था।
मैं आधे घंटे तक दुकान के पीछे बैठा रहा। मैंने औज़ारों का ट्रंक खोला, फिर बंद किया। मैंने दो पेंच उठाए, फिर रख दिए। मेरे हाथ काम नहीं कर रहे थे।
माँ ने दरवाज़े से झाँका।
"सो जा," उन्होंने कहा।
"अभी आता हूँ," मैंने कहा।
"बेटा।"
"अभी आता हूँ, माँ।"
वो कुछ नहीं बोलीं। पर जाते-जाते उन्होंने कहा, "उससे ज़्यादा मत माँगना जो वो दे न सके।"
और मैं उसी बात के साथ उनके कमरे की तरफ़ गया।
दरवाज़ा खुला था।
मैंने खटखटाया। "पापा।"
कोई जवाब नहीं।
"पापा, मैं आ रहा हूँ।"
मैंने दरवाज़ा धकेला। कमरे में बल्ब जल रहा था। उसकी पीली रोशनी में बिस्तर दिख रहा था।
बिस्तर खाली था।
चादर एक तरफ़ से उलझी हुई थी, जैसे कोई उठकर गया हो, पर बैठकर जूते पहनने की जगह भी नहीं थी। पापा के चश्मे की जगह खाली थी। उनकी लाठी नहीं थी। उनका पुराना ट्रंक खुला था और उसमें से कुछ निकाला गया था।
"पापा!"
मैं आँगन में दौड़ा। रसोई। चूल्हे की तरफ़।
चूल्हे के पीछे वाला दरवाज़ा।
वो बंद था। ताला लगा था। मैंने उसे छुआ। ठंडा।
मैं वापस कमरे में आया।
और तभी मेरी नज़र तकिये पर पड़ी।
वहाँ दो चीज़ें रखी थीं।
एक पुरानी कॉपी। मोटी, पीली पड़ी जिल्द वाली, जिसके कोने मुड़े हुए थे और जिस पर कोई नाम नहीं लिखा था। उसके ऊपर एक काग़ज़ रखा था, जो आधा मोड़ा हुआ था और जिस पर पापा की वो टेढ़ी-मेढ़ी लिखाई थी जो बहुत जल्दी में लिखी जाती है।
मैंने काग़ज़ उठाया।
मेरे हाथ काँप रहे थे।
लिखा था—
"बेटा, मैं वो नाम मिटाने गया हूँ जो मैंने नहीं लिखा था।"
उसके नीचे एक छोटी लाइन थी। बहुत छोटी।
"अगर सुबह तक न आऊँ, तो कॉपी खोल लेना। और माँ को मत बताना कि मैं अकेला गया।"
मैंने कॉपी उठाई।
और उसी वक़्त कमरे के दरवाज़े की तरफ़ से आवाज़ आई।
धातु की। छोटी। जानी-पहचानी।
मैंने पलटकर देखा।
दरवाज़े का हैंडल घूम रहा था।
धीरे-धीरे।
बिना किसी हाथ के।
एक बार। फिर आधा पल रुककर। फिर पूरा।
और मेरी जेब में, पहली बार पूरे दिन के बाद, घंटी ने कुछ कहा। बहुत धीमा। इतना धीमा कि जैसे किसी ने मेरे कान के अंदर सिर्फ़ होंठ हिलाए हों।
"दरवाज़ा खुल रहा है, अंकुश।"
"कौन सा?" मैंने फुसफुसाकर पूछा।
और घंटी ने कहा—
"वो जो तेरे घर में नहीं है।"
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