The Mysterious Bell – Chapter 713
और फिर उनके कदम लौट गए।
सुबह पाँच बजे माँ ने चूल्हा जलाया। मैंने खिड़की से देखा — धुआँ सीधा ऊपर उठ रहा था, बिना हिले, जैसे उसने भी तय कर लिया हो कि आज किसी से नहीं डरेगा। काजल और लक्ष्मी देवी बर्तन धोने में लग गईं, जैसे ये कोई आम दिन हो। शबनम आपा ने गुमटी में पानी डालकर भट्ठी साफ़ की और काली केतली चढ़ा दी। उस्ताद ने अपनी दुकान खोली और मशीन में नई सुई लगाई, और वो टिक-टिक शुरू हो गई।
छह बजकर पैंतालीस मिनट पर मीरा ने अपना कैमरा पीपल की डाल पर बाँध दिया — ऊपर से पूरी गली दिखती थी। उसके साथ वाले दो लड़के मुँह पर खड़े थे, फोन हाथ में।
और ठीक सात बजे, गली के मुँह पर सफ़ेद गाड़ी रुकी।
पहले जूतों की आवाज़ आई। सफ़ेद, चमकते जूते। इतने साफ़ कि गली की धूल उनसे अलग लगी — जैसे गली ही उन्हें छूने से डर रही हो।
फिर वो आया।
सफ़ेद कुर्ता। साफ़ कटा बाल। दोनों हाथों में मिठाई का डिब्बा — चमकीली सफ़ेद पन्नी चढ़ी, बड़ी गोल डिब्बी, वो वाली जिससे उसने पिछले साल मेले में बच्चों को टॉफ़ी बाँटी थी, केसर और इलायची वाली।
वो गली में आया। चाल में जल्दी नहीं थी। उसके पीछे वकील चंद्रेश सक्सेना थे, सफ़ेद कुर्ता, हाथ में सोने के रंग के किनारे वाली फ़ाइल। और उनके पीछे दो आदमी, जिनके हाथ खाली थे पर पूरी तरह तैयार।
मेरी जेब में घंटी गरम हो उठी।
रफ़ीक़ ने सीटी बजाई। गुड्डू ने सीटी बजाई।
गली में दोनों तरफ़ के शटर उठ चुके थे और दरवाज़ों पर लोग खड़े थे — अधिकतर चुप, कुछ अपने हाथों से बच्चों के कंधे पकड़े हुए।
रणवीर दुकान के सामने आया और रुक गया। उसने पीपल की बेंच देखी — खाली। उसने दुकान की कुर्सी ढूँढ़ी — कोई नहीं। उसके होंठों पर एक पल के लिए कुछ हुआ, फिर मिट गया।
फिर उसने मुझे देखा।
और वही मुस्कान आई। वही मीठी, नरम, चौड़ी मुस्कान — जिससे वो कंबल बाँटता है, टीवी पर भाषण देता है, और उसी शाम किसी के काग़ज़ में गड़बड़ करवा देता है।
उसने मिठाई का डिब्बा दोनों हाथों से आगे बढ़ाया, जैसे किसी के घर आया हो।
"अंकुश भाई," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो मिठास थी जो दूध में घुल जाती है। "सुबह-सुबह बिना नाश्ता आ गया।" उसने मेरी तरफ़ एक कदम बढ़ाया। "और ये लो, तुम्हारे लिए। तुम्हारी माँ से मिलना था, पर पहले ये स्वीकार कर लो।"
मेरी जेब में घंटी फिर बजी — एक बार, साफ़।
और मैंने पापा को अपने पीछे महसूस किया, बिल्कुल मेरे कंधे के पास, सीधे खड़े। उनका हाथ जेब में नहीं था।
सुबह की धूप पीपल की पत्तियों से छनकर उस सफ़ेद कुर्ते पर पड़ रही थी, और मिठाई का डिब्बा दोनों हाथों में ऊपर उठा था — जैसे कोई जीत का दीया लेकर आया हो।
उसकी मुस्कान एक इंच भी नहीं हिली।
"तो," रणवीर भारद्वाज ने कहा, "बताओ, कहाँ बैठें?"
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"तो," रणवीर भारद्वाज ने कहा, "बताओ, कहाँ बैठें?"
मैंने पीपल की तरफ़ इशारा किया।
"बेंच वहाँ है," मैंने कहा। "जहाँ बुज़ुर्ग बैठते हैं। छाँव भी है, हवा भी है।"
उसने बेंच की तरफ़ देखा। फिर मेरी दुकान की तरफ़ देखा। दुकान छोटी है — एक तरफ़ औज़ारों का ट्रंक, दूसरी तरफ़ पंचर वाला टब, बीच में लकड़ी की वो मेज़ जिस पर आज सुबह तक ग्रीस लगी उँगलियाँ रगड़ी गई थीं। दुकान की छत नीची है, बल्ब पुराना, और अंदर की हवा में आज सुबह से ही कुछ भारी था।
रणवीर ने एक कदम बढ़ाया और मेरी दुकान की देहरी पार कर ली।
"नहीं भाई," उसने कहा, बड़ी नरम आवाज़ में। "मेहमान दुकान में नहीं बैठता? बाहर तो धूप लग गई।"
और वो अंदर आ गया।
मैं कुछ नहीं बोला। मैंने उसे आने दिया। अगर मैं उसे रोकता, तो गली कहती कि अंकुश डर गया। और मुझे उस दिन सबसे ज़्यादा डर इसी बात का था।
वो अंदर आया, और उसकी सफ़ेद कुर्ते की चमक अंधेरी दुकान में और बढ़ गई। जैसे किसी ने कमरे में एक और बल्ब जला दिया हो — बिना बिजली के।
उसने मिठाई का डिब्बा मेरी मेज़ पर रख दिया।
वही मेज़। जहाँ रात को टूटा रेडियो खुला पड़ा था, जहाँ औज़ार रखे थे, जहाँ मैंने सुबह चार तार उलझे हुए देखे थे। उसने डिब्बा ठीक उसी जगह रखा, जैसे किसी घर में दीया रखा जाता है।
फिर उसने अपने हाथ से डिब्बे का ढक्कन खोला।
केसर और इलायची की महक दुकान में फैल गई। इतनी तेज़ कि एक पल के लिए मुझे अपनी दुकान की गंध — ग्रीस, रबर, पुराने लोहे की गंध — सूँघनी ही नहीं आई।
पीछे मेरे कंधे के पास पापा खड़े थे। मैंने उनकी साँस सुनी। वो लंबी थी, और अंदर जाकर अटक रही थी।
"लो," रणवीर ने कहा, और टॉफ़ी का एक डिब्बा टिंकू की तरफ़ बढ़ा दिया, जो मेरे पीछे खड़ा था। "बच्चे को क्यों खड़ा रखा है? ये वही है न, जो पिछले साल मेले में मेरे साथ फोटो खिंचवाने से डर गया था?"
टिंकू ने टॉफ़ी नहीं ली। उसने मेरी तरफ़ देखा। मैंने कुछ नहीं कहा। टिंकू ने हाथ पीछे कर लिया।
रणवीर हँसा। हल्की, गोल हँसी। ऐसी हँसी जिस पर कोई बुरा नहीं मान सकता।
"अरे, ये तो बड़ी बात हो गई," उसने कहा। "गली में मिठाई भी नहीं ली जाती अब?"
"मिठाई लेने की बात नहीं है, साहब," मैंने कहा। "आप बैठिए।"
"कहाँ?"
"यहीं।" मैंने मेज़ के पास पड़ी लकड़ी की एक छोटी स्टूल खींची। वो स्टूल जिस पर मैं खुद बैठता हूँ, जिसकी एक टाँग में अभी मैंने कल ही बोल्ट लगाया था। "आप बड़े आदमी हैं, पर स्टूल छोटा है। माफ़ करना।"
वो स्टूल पर बैठ गया।
मेरी दुकान के अंदर, मेरी मेज़ के पास, मेरे स्टूल पर — और उसकी मुस्कान एक इंच नहीं हिली।
"मैं तो भलाई के लिए आया हूँ, अंकुश भाई," उसने कहा, हाथ जोड़कर। "कल से मुझे नींद नहीं आ रही। सोचता हूँ, इस गली में जो हो रहा है, उसका कारण मैं हूँ। मेरी वजह से तुम लोगों के मन में मुझे लेकर कुछ गलत बैठ गया है।"
"बैठ गया है?"
"बैठ गया है," उसने कहा, बड़े सब्र से। "और ये ठीक नहीं। आपस में बात करके, बैठकर हर बात साफ़ हो जाती है।"
फिर उसने मेज़ पर रखे मिठाई के डिब्बे की तरफ़ देखा और कहा, "वैसे, ये कैसेट वाली बात मुझे सबसे ज़्यादा चुभी है।"
मेरे पीछे पापा की साँस रुक गई।
उस्ताद अली बक्श दुकान के दरवाज़े पर खड़े थे, हाथ में वो कैंची जो सुबह से उनके हाथ में थी। उनकी सिलाई मशीन की टिक-टिक, जो पूरी गली की आवाज़ है, अचानक बंद हो गई थी। जैसे गली ने साँस रोक ली हो।
"वो कैसेट," रणवीर ने कहा, और उसकी आवाज़ थोड़ी धीमी हुई, जैसे कोई बड़ी बात कह रहा हो, "मेरे पुराने काग़ज़ों की है।"
मैंने कुछ नहीं कहा।
"तुम सोच रहे होगे कि ये क्या बात हुई?" उसने अपनी उँगली मेज़ पर रखी, बहुत आराम से। "देखो, मैं झूठ नहीं बोलूँगा। उस दफ़्तर में पुराने काग़ज़ों के बंडल रखे हैं। वो सब मेरे पिता के ज़माने के हैं। कुछ चीज़ें ऐसी हैं जो मैंने खुद नहीं सुनीं, खुद नहीं देखीं। वो कैसेट उसी बंडल में थी।"
"अब आपको उसकी ज़रूरत क्या है?"
"ज़रूरत नहीं है।" उसने कंधे उठाए। "बात साफ़ रखनी है, बस। मेरे घर की चीज़ मेरे घर में रहे। तुम्हारे घर में क्यों रहे? तुम्हारे पास ये है —" उसने डिब्बे की तरफ़ देखा, "—और मेरे पास ये है।" उसने अपनी फ़ाइल की तरफ़ देखा, जो सक्सेना जी के हाथ में थी, हल्की सी उठी हुई, जैसे कोई सबूत हाथ में लिए खड़ा हो।
"कैसेट वापस कर दो," रणवीर ने कहा।
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