The Mysterious Bell – Chapter 714
सक्सेना जी ने पहली बार बोला। उनकी आवाज़ में शहद था और शहद में पत्थर।
"बेटा," उन्होंने कहा, मुझे बेटा कहकर। "सोच-समझकर बोलना। यह कोई बात नहीं है। एक पुरानी कैसेट है। तुम्हारे पास रखी, तो क्या? किसी और के घर की चीज़ इंसान के घर में नहीं रहती। मैं काग़ज़ों का आदमी हूँ, मैं कहूँ कि दस साल में क्या होता है, तो तुम्हारा सिर घूम जाएगा। यहीं साफ़ कर दो।"
"मैंने कुछ साफ़ नहीं रखा," मैंने कहा। "कैसेट दुकान में पड़ी है। गली में चली है। जिसने सुनी, सबने सुनी।"
रणवीर ने हाथ उठाकर सक्सेना जी को रोका, बड़े प्यार से।
"अंकुश भाई," उसने कहा, "मैं तुम्हारे पापा से बात करना चाहता हूँ।"
और मुड़ गया।
"शंकर भाई," उसने कहा।
मैं पलटा। पापा मेरे कंधे के पास खड़े थे, सीधे। उनका चश्मा कान पर टेप से बँधा हुआ था, और वो टेप आज सुबह ठीक से चिपकी भी नहीं थी। उनका एक हाथ — मैंने देखा — जेब से बाहर था, पर उँगलियाँ हल्की सी मुड़ी हुई थीं, जैसे किसी चीज़ को पकड़ने की कोशिश कर रही हों और उस चीज़ ने खुद को छोड़ दिया हो।
रणवीर ने धीरे से अपना हाथ बढ़ाया और पापा के कंधे पर रखा।
"शंकर भाई," उसने फिर कहा, और उसकी आवाज़ में वो मिठास थी जो बीमार आदमी को दवा देते वक़्त लाई जाती है। "आप बूढ़े हो गए। आपको ये सब नहीं सहना चाहिए।"
पापा ने कुछ नहीं कहा।
"और," रणवीर ने कहा, "आपकी जो मेडिकल फ़ाइल है — अस्पताल में जो पुरानी फ़ाइल पड़ी है — वो भी मेरे पास है।"
मेरा पेट ठंडा हो गया।
"आपकी जाँचें," रणवीर ने कहा, जैसे कोई हिसाब बता रहा हो। "आपकी दवाइयाँ। आपके दो जाँचें जो दो बार टलीं। सुशीला जी की दवा। सारा हिसाब है उसमें। मैं आज सुबह उसे पढ़कर आया हूँ।"
वो पापा के कंधे पर हाथ रखकर मुझे देखने लगा, और उसकी आँखों में वो चीज़ थी जो मुझे पहले कभी नहीं दिखी थी — पूरा यक़ीन। ऐसा यक़ीन जिसे किसी ने बनाया नहीं, खरीदा था।
"आपका कुछ नहीं बिगड़ेगा," उसने पापा से कहा। "मैं इंसान से बात कर रहा हूँ, काग़ज़ से नहीं। पर भाई, जब सब कुछ मेरे हाथ में है, तो आप लोग मेरे साथ क्यों नहीं खड़े हो?"
पापा काँपने लगे।
धीरे से। पहले उनका कंधा, फिर उनकी बाँह, फिर उनका जबड़ा। और मैंने देखा कि उनके चश्मे के पीछे उनकी आँखें झुक गईं — वो झुकी नहीं, गिरीं, जैसे किसी कुएँ में बाल्टी।
मैंने पापा का हाथ पकड़ा।
"पापा," मैंने कहा, बहुत धीरे।
और फिर रणवीर की तरफ़ देखा।
अब मेरे अंदर कोई मज़ाक नहीं बचा था। मुझे नहीं पता आज क्या होगा, पर जो मैं अब करने जा रहा था, वो मैंने रात भर सोचा था। रणवीर चालाक है। वो हर आदमी का एक ऐसा बटन ढूँढ़ लेता है जो बाहर से दिखता नहीं। पापा का बटन उसने अभी दबाया था।
अब बारी मेरी थी।
"कैसेट नहीं मिलेगी," मैंने कहा।
रणवीर की मुस्कान थोड़ी रुकी।
"क्यों?"
"क्योंकि वो मेरी नहीं है," मैंने कहा। "और आपकी भी नहीं है। जिसकी है, वो अब इस गली की है। जिसने सुना, वो गवाह है। गवाह की कोई कीमत नहीं होती, साहब — यही तो आपकी सबसे बड़ी तकलीफ़ है।"
मैंने एक कदम आगे रखा।
"और उससे पहले," मैंने कहा, "मुझे एक काग़ज़ दिखाइए।"
"कौन सा काग़ज़?"
"वो काग़ज़," मैंने कहा, "जिस पर मेरे पापा ने अंगूठा लगाया है। जो काग़ज़ उन्होंने अंगूठे से सीला है।"
कमरे में इतनी चुप्पी हुई कि मुझे उस्ताद की मशीन की टिक-टिक अपने कानों में सुनाई दी — जबकि मशीन बंद थी।
रणवीर ने अपना हाथ पापा के कंधे से हटाया। धीरे से। और मुस्कुराया।
वो मुस्कान मैंने पहले कई बार देखी थी — कंबल बाँटते वक़्त, टीवी पर, मेले में बच्चों को टॉफ़ी देते वक़्त। आज वो थोड़ी अलग थी। आज उसमें एक अलग चीज़ थी, जो मुझे लगा कि जीत की नहीं, हिसाब की थी। जैसे किसी ने किताब का पन्ना पलटकर देखा हो और कहा, "अरे, ये लाइन तो मैंने पहले ही पढ़ ली थी।"
"अंकुश भाई," उसने कहा, "वो काग़ज़ अब मेरे पास नहीं है।"
"तो किसके पास है?"
उसने सक्सेना जी की तरफ़ देखा। सक्सेना जी ने फ़ाइल अपने सीने से थोड़ी दूर की, जैसे किसी को दिखाने के लिए नहीं, छिपाने के लिए।
"वो काग़ज़ उस आदमी के पास है," रणवीर ने कहा, "जिसने तुम्हारे पापा से अंगूठा लिया था।"
दुकान के दरवाज़े पर खड़े लोगों में एक हल्की हरकत हुई। मैंने पीछे मुड़कर नहीं देखा, पर मैं सुन सकता था — किसी ने साँस ली, किसी ने जूता हिलाया।
रणवीर ने मेरी तरफ़ देखा।
"और वो आदमी," उसने कहा, "मेरा आदमी नहीं है।"
वो रुका। जान-बूझकर रुका। उसने रुकने का इंतज़ार किया, जैसे कोई काँटा ज़मीन में गाड़कर हट जाता है।
"तुम्हारे घर की बात है, अंकुश भाई," उसने बहुत धीरे कहा। "मैं उसमें मुँह नहीं डालूँगा।"
और मैं समझ गया कि वो क्या कर रहा है।
वो मुझे नहीं हरा रहा था। वो गली को हरा रहा था। वो एक ऐसी बात बोलकर गया था जिसे सुनकर हर आदमी अपने बगल वाले को देखेगा। आज रात जब गली सोएगी, तो हर घर में एक सवाल जगेगा — किसने अंगूठा लिया? और जब घरों में सवाल जगे, तो गली दो हिस्सों में बँट जाती है। यही उसका असली हथियार है। यही उसने मुझे पहले भी बताया था — बगैर कहे।
"आप गलत आदमी को ढूँढ रहे हैं," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ अपने ही कानों में थोड़ी ऊँची लगी। "अंगूठा लेने वाला गली में है, ये मुझे पता है। पर उसे खोजना मेरा काम है, आपका नहीं। आपका काम बस ये बताना है कि उस काग़ज़ पर मेरे पापा के नाम के नीचे किसका नाम लिखा है।"
रणवीर की मुस्कान गहरी हुई।
"वो तुम्हारे पापा से पूछो," उसने कहा।
"मैं पूछूँगा," मैंने कहा। "पर पहले आप जवाब दो।"
"मैं जवाब नहीं दूँगा," उसने कहा, मीठी आवाज़ में। "क्योंकि जवाब देने से बात बढ़ती है। और मैं आज बात बढ़ाने नहीं, मिटाने आया हूँ।"
तभी मीरा आगे आई।
उसने अपना कैमरा उठाया। मुझे लगा वो पीपल की डाल पर बँधा है, पर वो एक छोटा कैमरा हाथ में भी लाई थी। उसने उसे चालू किया — वो लाल बत्ती जल उठी, जो मुझे हमेशा लगती है कि किसी की आँख है, बस बिना पलक के।
"साहब," मीरा ने कहा, बिल्कुल सपाट आवाज़ में। "आप कह रहे हैं कि आप भलाई के लिए आए हैं। कैमरे में यही बोलिए।"
दुकान में सन्नाटा।
और फिर रणवीर भारद्वाज मुड़ा।
वो सीधा कैमरे में देखकर मुस्कुराया।
बिना एक पल हिचके। बिना आँख हटाए। जैसे वो अपने ही घर में आईने के सामने खड़ा हो।
"नमस्ते," उसने कैमरे से कहा, दोनों हाथ जोड़कर। "मैं रणवीर भारद्वाज। और मैं यहाँ अपने ही शहर के लोगों से बात करने आया हूँ।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "रिकॉर्डिंग अच्छी बात है। रिकॉर्ड रहता है। मैं तो चाहता हूँ कि सब रिकॉर्ड रहे — जो मैं कहूँ, और जो मुझसे कहा जाए।"
उसकी आवाज़ में एक भी काँप नहीं थी।
मुझे लगा था कि कैमरा देखकर वो झिझकेगा। मुझे लगा था कि कम से कम एक बार वो अपनी आवाज़ धीमी करेगा। पर वो नहीं किया। और उसी पल मुझे समझ आया कि रणवीर को कैमरे का डर नहीं है, क्योंकि रणवीर को काग़ज़ का डर नहीं है। उसे सिर्फ़ एक चीज़ का डर है, जो आज तक उसने किसी से नहीं कहा।
उसका डर काग़ज़ नहीं है।
उसका डर ये है कि गली एक साथ बोलेगी।
"मीरा जी," रणवीर ने कैमरे से कहा, "आपका चैनल है — बस्ती की आवाज़। अच्छा नाम है। पर एक बात बताइए — पूरी सच्चाई छापने का दाम क्या है आजकल?"
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