The Mysterious Bell708 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 708

7 min read November 5, 2026

रास्ते में मीरा ने मेरे कान में कहा, "मशीन पीछे के प्लॉट पर खड़ी है। सुबह से। सात बजे आई थी, पर गली के लोग सामने खड़े हो गए थे — उस्ताद, बंसी बाबा, हाफ़िज़ बाबा, हबीब चाचा। सब चुपचाप। कोई कुछ बोला नहीं। बस खड़े रहे। और साहब का आदमी उतरा भी नहीं। उसने खिड़की से कहा — पहले नाम लिखा जाएगा, फिर मशीन चलेगी।"

"नाम?"

"तेरा नाम।"

मैंने सिर हिलाया।

"अंकुश," मीरा ने कहा, "आज दस बजे रज़ा सलीम रजिस्टर लाएगा। और आज शाम छह बजे बैठक। और चार बजे साहब का बुलावा। और अब ये भी। एक दिन में सब कुछ।"

"तो क्या करूँ, मीरा?" मैंने कहा। "रो दूँ?"

"ना।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "बस एक बात करना — जब तुझे लगे कि सब हाथ से निकल रहा है, तो किसी को बता देना। मुझे बता देना। तू हर बार सबको सहारा देता है, और खुद को कभी देना नहीं सीखा।"

मैं हँसा। "तू मेरी किताबें क्यों दोहरा रही है?"

"क्योंकि तेरी किताबें तेरे ज़बान पर रहती हैं, तेरे काम में नहीं आतीं," उसने कहा और आगे बढ़ गई।

और फिर हम दुकान के सामने पहुँचे।

शटर आधा खुला था। मेज़ पर टूटा रेडियो खुला पड़ा था, तार बिखरे हुए, और पीछे फ़र्श पर वो सूखा पानी का दाग।

और शटर के सामने, गली की धूप में, लक्ष्मी देवी खड़ी थीं।

उनके दाहिने हाथ पर सफ़ेद कपड़ा बँधा हुआ था। कपड़े के नीचे से हल्का गुलाबी रंग झाँक रहा था, और उनके चेहरे पर वो थकान थी जो रोने से नहीं, काम करने से आती है। उनके दूसरे हाथ में एक पोटली थी — टिंकू के कपड़े, मैंने दूर से पहचान लिए। वही नीली कमीज़ जो उसने पिछले महीने पहनी थी, और वो सफ़ेद मोज़े जो उसने कभी नहीं पहने।

मैंने टिंकू का कंधा और कसकर पकड़ा, क्योंकि मुझे लगा कि वो फिर भागेगा।

लक्ष्मी देवी ने अपना घायल हाथ उठाया। कपड़ा बंधा हुआ, उँगलियाँ हिलीं।

और उन्होंने वो कहा जिससे पूरी गली ठंडी पड़ गई।

"मैं इसे लेने आई हूँ। आज ही।"

॥

"मैं इसे लेने आई हूँ। आज ही।"

लक्ष्मी देवी की आवाज़ में कोई चीख नहीं थी। कोई काँपती हुई गुस्से वाली आवाज़ नहीं थी। वो आवाज़ ऐसी थी जैसे कोई सुबह चार बजे उठकर, बिना चाय पिए, दस घरों की सीढ़ियाँ चढ़कर आया हो और अब बस एक ही चीज़ माँग रहा हो।

गली में धूप तेज़ हो चुकी थी। शटर के लोहे पर हाथ रखो तो जल जाए। और उसी धूप में लक्ष्मी देवी खड़ी थीं, घायल हाथ पर सफ़ेद कपड़ा, दूसरे हाथ में टिंकू की पोटली।

टिंकू मेरे बगल में खड़ा था। मैंने उसका कंधा पकड़ रखा था और मुझे उसकी नसें महसूस हो रही थीं — पतली सी, काँपती हुई, जैसे किसी पुराने तार में बिजली आ जाए और वो तार खुद डर जाए।

"आपा," मैंने कहा।

"मुझसे बात मत कर, अंकुश।" उन्होंने मेरी तरफ़ नहीं देखा। उनकी नज़र सीधी टिंकू पर थी। "तेरे पास मेरा बच्चा रखने का कोई हक़ नहीं है। तू न उसका बाप है, न माँ, न मास्टर। तू तो खुद…"

वो रुक गईं। जो बात वो कहने वाली थीं, वो मुझे पता थी — तू तो खुद वो लड़का है जिसका घर टूट रहा है, तू किसी को क्या सहारा देगा। मगर उन्होंने वो बात नहीं कही। शायद इसलिए कि वो बात कहने के लिए उन्हें भी अपना घाव खोलना पड़ता।

"बात सुनिए," मैंने कहा। "जो कहना है, अन्दर कहिए। गली के बीच खड़े होकर नहीं।"

"मुझे गली से क्या डर, मैं तो रोज़ इसी गली में झाड़ू लगाती हूँ।"

आपा ने धीरे से मेरी कमीज़ पकड़ी और मेरे कान में कहा, "इनके हाथ पर जो कपड़ा है, वो भीगा है। बांधकर आई हैं, ऊपर से। इन्होंने पहले चोट देखी ही नहीं है।"

मैंने लक्ष्मी देवी के हाथ को देखा। कपड़े के नीचे से हल्का गुलाबी रंग झाँक रहा था, और कपड़े का एक कोना सूख रहा था — जैसे कोई खून पहले ही बह चुका हो और अब रुक गया हो।

"दीदी," मीरा आगे आई, "मैं आपको दवा…"

"मुझे कुछ नहीं चाहिए।" लक्ष्मी देवी ने पोटली को टिंकू की तरफ़ बढ़ा दिया। "ले। चल।"

टिंकू ने हाथ नहीं बढ़ाया।

"ले, मैं कह रही हूँ।"

"अम्मी…"

"चल।"

और मैंने देखा — टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। एक पल के लिए भी नहीं, आधे सेकंड के लिए। पर उसकी आँखों में जो था, वो मदद की भीख नहीं थी। वो एक सवाल था — उस्ताद, तू अब क्या करेगा? और मुझे पता था कि अगर आज मैंने ये आदमी नहीं हुआ, तो अब कभी नहीं होऊँगा।

"अंदर चलिए," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ खुद मेरे कानों में अलग लगी — ज़्यादा धीमी, ज़्यादा सीधी। "पीछे के कमरे में। दो कुर्सियाँ हैं।"

"मैंने कहा ना, मुझे—"

"दीदी, आपको मना करने का पूरा हक़ है।" मैंने उनकी आँखों में देखा। "पर एक बात। आप इसे ले जाइएगा। कल। या परसों। या जब आपका दिल माने। उससे ये सच नहीं हो जाएगा कि आपने इसकी बात कभी सुनी नहीं। और ये लड़का ज़िंदगी भर यही सोचता रहेगा कि अम्मी ने मुझसे एक बार नहीं पूछा कि तू ये क्यों कर रहा था।"

गली चुप हो गई।

लक्ष्मी देवी ने पोटली को सीने से लगाया, जैसे वो पोटली भी भाग जाने वाली हो। फिर उन्होंने टिंकू को देखा। बहुत देर तक देखा। उनके चेहरे पर से वो थकान नहीं उतरी, पर उस थकान के पीछे से कुछ और निकला — एक फटी हुई, छोटी सी डर।

"दस मिनट," वो बोलीं।

"दस मिनट," मैंने कहा।

"और तू बीच में नहीं बोलेगा।"

मैं हँसा। "दीदी, मैं बीच में नहीं बोलूँगा। पर हो सकता है आप दोनों मुझे कोसते रहें, वो मंज़ूर है।"

उन्होंने मेरी हँसी पर ध्यान नहीं दिया, पर मैंने देखा कि उनके जबड़े ढीले हो गए। थोड़े से।

दुकान के पीछे वाला कमरा छोटा है। इतना कि फूटियाँ भी इसमें रास्ता बनाकर चलती हैं। एक तरफ़ दीवार से चिपका औज़ारों का ट्रंक, ऊपर एक झूलता पुराना बल्ब जो अब भी गुनगुनाता रहता है, और बीच में लकड़ी की वो मेज़ जिसकी एक टाँग नाप में नहीं है।

मैंने दो कुर्सियाँ डालीं। एक लक्ष्मी देवी के लिए, एक टिंकू के लिए। दोनों आमने-सामने।

और बीच में, बस बीच में, मैंने वो टूटा रेडियो रख दिया।

तार बिखरे हुए थे — लाल, पीला, काला, हरा। मैंने उन्हें जान-बूझकर सीधा नहीं किया। वो ऐसे ही उलझे पड़े रहे, जैसे कोई सवाल जो अधूरा छूट गया हो।

लक्ष्मी देवी ने रेडियो देखा और उनका चेहरा बदल गया।

"ये क्या है?"

"रेडियो," मैंने कहा। "टूटा है। तार टूटा है, आवाज़ आती है, फिर चली जाती है।"

"मुझे रेडियो नहीं सुनना।"

"आपको रेडियो नहीं सुनना है।" मैंने कुर्सी खींचकर बैठते हुए कहा। "आपको बस बैठना है। और आज कोई झगड़ा नहीं है। आज हम एक-एक सच बोलेंगे और बस।"

लक्ष्मी देवी कुर्सी पर नहीं बैठीं। वो खड़ी रहीं, पोटली सीने से लगाए।

"मैं झूठ नहीं बोलती," उन्होंने कहा।

"मैं जानता हूँ," मैंने कहा।

"तो फिर ये सब क्या है? तू क्या समझता है, तू कोई जज है?"

"मैं कुछ नहीं हूँ, दीदी।" मैंने अपने हाथ देखे। उँगलियों में ग्रीस के निशान थे, और एक नाखून के नीचे स्याही जैसा काला दाग। "मैं बस एक आदमी हूँ जिसकी दुकान में एक टूटा रेडियो पड़ा है और जिसके घर में एक टूटी चीज़ रोज़ नई होती है। मैं नहीं जानता सबका इलाज। पर इतना जानता हूँ — आज सुबह इस लड़के ने मेरे सामने रोते हुए वो बात कही जो उसने आपको नहीं कही। और अब मैं उसे लेकर चुप नहीं बैठ सकता।"

टिंकू ने सिर नीचा कर लिया।

लक्ष्मी देवी कुर्सी पर बैठ गईं। धीरे से, जैसे उनकी कमर उन्हें बैठा रही हो, वो खुद नहीं बैठ रही हों।

पहले कुछ नहीं हुआ।

कमरे में सिर्फ़ बल्ब की गुनगुनाहट थी और बाहर से एक-दो आवाज़ें — चिंटू किसी को धक्का दे रहा था दरवाज़े के बाहर, और शबनम आपा उसे डाँट रही थीं कि हट, साँस लेने दे।

वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।

यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।

Audio mein suno

Apni raay likho