The Mysterious Bell – Chapter 707
"टिंकू," मैंने पुकारा।
कोई जवाब नहीं।
"टिंकू!"
धूल में सूखी खाँसी जैसी आवाज़ आई। फिर एक बहुत छोटी आवाज़ — "जाओ।"
मैं बक्सों के पीछे गया।
वो वहाँ बैठा था। घुटने सीने से चिपका, मुँह घुटनों में, एक चप्पल हाथ में, दूसरा पैर नंगा। उसके बाल धूल से सफ़ेद थे और घुटने पर वो पट्टी खुल गई थी, जिसे मैंने खुद तीन दिन पहले बाँधी थी।
मैं उसके पास बैठ गया। ज़मीन ठंडी थी।
"मैं मशीन सीख लूँगा," उसने बिना सिर उठाए कहा। "नहीं, मेरा मतलब — मैं कुछ और भी सीख लूँगा। हिसाब, पंचर, चेन, सब सीख लूँगा। रात में भी सीखूँगा। तुम मुझे मत निकालो।"
मुझे लगा किसी ने मेरे सीने पर हथौड़ा रख दिया है।
"कौन कह रहा है कि मैं निकालूँगा?"
"माँ कह रही थी। और माँ जो कहती है, करती है।" उसने सिर उठाया। उसकी आँखें लाल थीं और उनमें वो डर था जो बच्चों की आँखों में तभी आता है जब उन्हें लगता है कि कोई उनका नाम भी गिनता है सिर्फ़ इसलिए कि वो किसी काम का हो। "उस्ताद, मैं पढ़ने में कमज़ोर हूँ। मास्टर जी ने दो बार बुलाया था और कहा था कि मैं पिछली क्लास में बैठा रह जाऊँगा। और काम का भी नहीं हूँ — मैंने तुम्हारा पेचकस एक चश्मे वाले को बेच दिया था, तुम्हें पता भी नहीं चला। बेच दिया था। तीन महीने पहले। और उस्ताद अली बक्श ने देखा था, पर कुछ नहीं बोले। तो मैं किसी काम का नहीं हूँ।"
वहाँ बैठे-बैठे मुझे हँसी आ गई। सच में आ गई।
"तूने पेचकस बेच दिया था?"
"हाँ।"
"किसको?"
"पता नहीं। चश्मे वाला आदमी था। पैसा नहीं लिया मैंने।"
"पैसा नहीं लिया?"
"नहीं। मैंने सोचा, मुझे कोई ज़रूरत नहीं है। पर फिर भी बेचा तो।"
मैंने उसका सिर पकड़कर अपनी तरफ़ किया।
"सुन," मैंने कहा। "मैं तुझे कुछ बताता हूँ, और तू किसी को मत बताना। वरना पूरी गली में मेरी इज़्ज़त का क्या होगा, तू जानता है।"
उसने सिर हिलाया।
"मैं डरता हूँ," मैंने कहा।
वो चुप हो गया। "किससे?"
"इस सबसे।" मैंने अपने चारों तरफ़ हाथ घुमाया — बक्से, धूल, लोहा, ये पूरी जगह। "इस घर से। इस दुकान से। कि एक सुबह उठूँ और शटर पर ताला हो। कि माँ की दवा रुक जाए। कि पापा फिर से वो चुप्पी पहन लें जिसे उन्होंने इतनी मुश्किल से उतारा है। कि मेरे हाथ में जो एक चीज़ है — ये घंटी, ये दुकान, ये गली — वो सब मेरी उँगलियों के बीच से रेत की तरह फिसल जाए और मैं देखता रह जाऊँ। और सबसे बड़ी बात — मुझे ये भी नहीं पता कि मैं कैसे रोकूँगा। मैं सुबह उठता हूँ और अंदर से लगता है कि आज वो दिन है जब मैं हार जाऊँगा।"
टिंकू मेरी तरफ़ देख रहा था, और उसका मुँह खुला रह गया था।
"तुम?" उसने कहा। "पर तुम तो… तुम तो सब ठीक कर लेते हो।"
"ना, बेटा," मैंने कहा। "मैं सब ठीक करने की कोशिश करता हूँ। जो ठीक हो जाता है, वो हो जाता है। जो नहीं होता, वो रात भर मेरे सीने पर बैठा रहता है। और मैं उसे किसी को नहीं बताता, क्योंकि जिस दिन गली को पता चलेगा कि उस्ताद भी डरता है, उस दिन सबको लगेगा कि अब कोई नहीं बचा।"
"तो तुम झूठ बोलते हो?"
"नहीं," मैंने कहा। "मैं चुप रहता हूँ। और इन दोनों में ज़मीन-आसमान का फ़र्क़ है। झूठ बोलने से इंसान टूटता है, चुप रहने से सिर्फ़ थकता है।"
वो थोड़ी देर मेरे कंधे से चिपका रहा। फिर उसने एक बात कही, बहुत धीमी आवाज़ में, जिससे मुझे लगा कि आज उसने वो बात कही है जो वो किसी को नहीं कहता।
"उस्ताद, मेरे पापा जब गए थे, तब माँ ने मुझे कहा था — अब तू घर का आदमी है। और मैं उस दिन से हर रोज़ सुबह उठकर यही सोचता हूँ कि आदमी को क्या करना चाहिए। और मुझे समझ नहीं आता। किसी से पूछ भी नहीं सकता, क्योंकि पूछने पर माँ को लगेगा कि मैं कमज़ोर हूँ।"
मैंने उसका कंधा पकड़ा।
"मैं तुझे कुछ बताता हूँ, और ये मेरी तरफ़ से पहला उस्तादी सबक है — इसके बाद तू मुझसे उस्ताद कहने का हक़दार होगा।" मैंने उसकी तरफ़ देखा। "घर का आदमी वो नहीं होता जो अकेले सब उठा लेता है। घर का आदमी वो होता है जो ये बता सके कि उससे क्या नहीं हो रहा। यही सबसे बड़ी हिम्मत है।"
उसने गले लगकर मुझे पकड़ लिया। इतनी ज़ोर से कि मेरी पसलियाँ दुखीं, और उसके कंधे काँप रहे थे, और वो रो रहा था — वैसे नहीं जैसे बच्चे रोते हैं, ज़ोर से; बल्कि वैसे, जैसे बड़े रोते हैं जब कोई देख न रहा हो।
और उसी वक़्त, बक्सों के पीछे, बहुत दूर, कुछ ऐसा हुआ जिसे मैं समझ नहीं पाया। हवा रुक गई। एक सेकंड के लिए लोहे पर धूल जमी रह गई, जैसे किसी ने साँस रोक ली हो। और मेरी जेब में घंटी ठंडी हो गई — एकदम बर्फ जैसी — फिर नार्मल।
घंटी ने कुछ नहीं कहा।
पर मुझे पता था कि उसने कुछ देखा है।
"चल," मैंने कहा, टिंकू को उठाकर। "यहाँ से चलते हैं।"
"उस्ताद," टिंकू ने चप्पल पहनते हुए कहा, "मैं आज माँ से सच बोलूँगा।"
"क्या सच?"
"कि मैं स्कूल गया था। गेट तक गया था। पर अंदर नहीं गया।" उसने सिर झुकाया। "क्योंकि अंदर जाने पर मास्टर जी को देखना पड़ता है, और उनके सामने मुझे अपना नाम बोलना पड़ता है, और मुझे लगता है कि वो मेरा नाम सुनकर कहेंगे — ये वही है जो पिछली क्लास में बैठा रह गया।"
"तो तू माँ से ये भी बोल," मैंने कहा, "कि तुझे मशीन सीखनी है। सच बोलकर सीख। छिपकर नहीं। क्योंकि छिपकर सीखी चीज़ इंसान को बड़ा नहीं करती, सिर्फ़ चालाक बनाती है। और चालाक आदमी अकेला रह जाता है।"
वो कुछ सोचता हुआ चला।
और फिर, फाटक से बाहर निकलते वक़्त, उसने पीछे मुड़कर उस अंधेरे हॉल की तरफ़ देखा और कहा, "उस्ताद, वहाँ अंदर कोई था।"
मेरे पैर रुक गए।
"कैसे पता?"
"मुझे नहीं पता," उसने कहा। "पर जब मैं रो रहा था, तब मुझे लगा कि कोई मेरी तरफ़ देख रहा है। और वो हँस नहीं रहा था। वो… वो जैसे गिन रहा था।"
मैंने कुछ नहीं कहा। मैंने सिर्फ़ उसका कंधा पकड़कर उसे तेज़ चलाया।
बाहर धूप में आते ही हवा बदल गई। गली के मुँह पर रफ़ीक़ और गुड्डू खड़े थे, और रफ़ीक़ ने दूर से देखकर सीटी बजाई — वो सीटी जो हमने तय की थी। दो सेकंड में सानिया, चिंटू, मीरा और शबनम आपा सब वहाँ थे।
"मिल गया!" चिंटू चिल्लाया, जैसे उसने खुद ढूँढा हो।
"तेरे जूते कहाँ हैं?" सानिया ने टिंकू को घूरकर पूछा।
"एक मेरे पास है, एक उस्ताद के पास," टिंकू ने कहा, और पहली बार उसके चेहरे पर वो पुरानी शरारत लौटी।
शबनम आपा ने उसका सिर पकड़कर ज़ोर से चूमा, फिर तुरंत डाँटा — "दोबारा भागा तो गुमटी का पूरा तेल तेरे सिर पर डाल दूँगी, समझा?" — और फिर मुड़कर मुझसे धीरे से कहा, "और तू, उस्ताद, एक बात सुन। आज सुबह से मैं हर आदमी से पूछ रही हूँ। तेरह लोगों ने कहा कि उन्होंने उसे नहीं देखा। और मुझे पता है उनमें से कम से कम चार झूठ बोल रहे थे, क्योंकि उन्होंने आँख चुराई। ये गली डर गई है, अंकुश। डरा हुआ मोहल्ला सच नहीं बोलता।"
"पता है," मैंने कहा। "इसीलिए तो तेरे पास बैठाया है सबको। तेरे सामने झूठ बोलना आसान नहीं है।"
वो हँसीं — वो हँसी जिसमें चिमटी की आवाज़ भी थी और ममता भी।
हम दुकान की तरफ़ चले।
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