The Mysterious Bell – Chapter 706
टिंकू ने अपनी माँ को देखा।
उसने कुछ कहना चाहा, पर आवाज़ नहीं निकली।
और फिर वो भाग गया।
बाल्टी को ठोकर लगी, पानी फ़र्श पर फैल गया, और वो दुकान के बाहर, गली की धूप में, दौड़ता हुआ निकल गया — छोटा, कमज़ोर, जूते पर ग्रीस, और कंधे हिलते हुए, जैसे उसने अपनी सारी ताक़त सिर्फ़ इसलिए लगाई हो कि कोई उसका चेहरा न देख सके।
लक्ष्मी देवी वहाँ खड़ी रह गईं।
"अंकुश भाई," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में वो थकान थी जो सिर्फ़ उन माँओं की होती है जिनके बच्चे उनसे नहीं बोलते, "ये सब ठीक होगा न?"
मैंने जेब में हाथ डाला। घंटी गरम थी, और उसकी गरमाहट में कुछ और भी था — एक हल्की सी धड़कन, जैसे कोई चीज़ जो अभी पूरी तरह जगी न हो, जागने की कोशिश कर रही हो।
"ठीक होगा," मैंने कहा।
और मैं झूठ नहीं बोल रहा था।
पर सच ये भी था कि मुझे अभी तक पता नहीं था कि कैसे।
॥
लक्ष्मी देवी वहीं खड़ी रह गईं। मैंने देखा — उनके होंठ हिल रहे थे, पर आवाज़ नहीं निकल रही थी। जैसे कोई दुआ पढ़ रहा हो, या कोई हिसाब कर रहा हो कि कितना बोला और कितना बाकी है।
गली की धूप अब पूरी चढ़ आई थी। बाल्टी का पानी फ़र्श पर फैलकर सूखने लगा था, और उस पानी में टिंकू के जूते की ग्रीस एक पतली काली लकीर बनकर शटर की तरफ़ बह रही थी। जैसे वो भागते वक़्त अपना निशान छोड़ गया हो।
"लक्ष्मी देवी," मैंने कहा, "आप घर जाइए। मैं उसे लाता हूँ।"
"मुझे पता है तुम लाओगे," उन्होंने कहा। "तुम हमेशा लाते हो। मेरा बेटा तुम्हारे पास रहता है, तुम्हारे पास खाता है, तुम्हारे पास हँसता है। और मेरे पास आकर वो दरवाज़े पर खड़ा रह जाता है, जैसे घर में घुसने की इजाज़त माँग रहा हो।"
मेरे पास इसका कोई जवाब नहीं था।
"मैं शाम छह बजे आऊँगी," उन्होंने कहा और मुड़ गईं। "गिनती कर लेना।"
वो चली गईं। साड़ी का पल्लू उनके कंधे पर ढीला लटक रहा था, और मुझे लगा कि आज पहली बार मैंने उन्हें बूढ़ा देखा।
मैंने जेब में हाथ डाला और घंटी को अँगूठे से हल्का दबाया। टन्।
घंटी ने कहा — "लोहे के पीछे।"
बस इतना। फिर चुप।
मैं शटर से बाहर निकला। गली में लोग खड़े थे, और सबसे पहले शबनम आपा की आवाज़ आई, गुमटी के बाहर की बेंच से, जैसे पूरी गली को चेतावनी दे रही हों।
"टिंकू! अरे टिंकू! इधर आ, तेरे लिए समोसा रखा है, ठंडा हो रहा है!"
कोई जवाब नहीं।
शबनम आपा ने लोहे की चिमटी थाली पर पटकी। चटाक। और फिर हर आने-जाने वाले से वही सवाल — "टिंकू दिखा? छोटा सा, घुटने पर पट्टी, जूते पर ग्रीस? दिखा?"
किसी ने नहीं देखा।
मीरा दौड़कर आई। उसके हाथ में कैमरा था और कंधे पर वही फटा बैग, जिसकी सिलाई हर महीने और फटती जाती है।
"क्या हुआ?"
"टिंकू।"
"कब से?"
"लगभग आधा घंटा।"
मीरा ने कैमरा बैग में डाला। "कहाँ देखा?"
"अभी कुछ नहीं।"
"तो अब क्या करोगे — गली के बीच खड़े होकर सोचोगे?"
"मीरा," मैंने कहा, "तू जब डरती है तो गुस्सा हो जाती है, और मुझे पता है तू डर गई है, इसलिए मैं तेरी हर बात सह लूँगा। पर अभी गुस्सा रख दे। मुझे लोग चाहिए।"
वो दो सेकंड मेरी तरफ़ देखती रही। फिर उसने सिर हिलाया।
और तभी कोने से चार सिर निकले — सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू। चारों के चेहरे पर वो भाव था जो बच्चों के चेहरे पर तभी आता है जब बड़ों को उनकी ज़रूरत पड़े।
"उस्ताद," सानिया ने कहा, "हमें सब पता है। टिंकू भागा है।"
"तुम्हें कैसे पता?"
"गली में जो होता है, हमें पता होता है," रफ़ीक़ ने कहा और चश्मा ठीक किया, जिसका एक काँच कब का गायब है। "हमने उसे भागते देखा नहीं, पर हमने सुना कि लक्ष्मी आंटी ने उसे डाँटा।"
"अच्छा। तो अब सुनो।" मैंने घुटने के बल झुककर उन्हें अपने बराबर किया। "ये कोई खेल नहीं है। टिंकू डरा हुआ है, और डरा हुआ बच्चा कभी-कभी ऐसी जगह छिपता है जहाँ बड़े नहीं ढूँढते। तुम चारों वही जगहें देखो। स्कूल की पिछली गली, पीपल की जड़, पत्थर का पुल, स्कूल की सीढ़ी के नीचे — और मंदिर के पीछे।"
"मंदिर के पीछे क्यों?" चिंटू ने पूछा।
"क्योंकि वहाँ साये में ठंडक है," मैंने कहा। "और रोने वाला इंसान ठंडक ढूँढता है।"
चारों तुरंत चले गए, और चिंटू ने भागते वक़्त अपनी चप्पल उतारकर हाथ में ले ली — "जासूसी में सबसे काम की चीज़," उसने कहा। मुझे समझ नहीं आया कि चप्पल जासूसी में कैसे काम आती है, पर आज वो बहस का दिन नहीं था।
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। "और तुम?"
"मैं पुराने बिजलीघर।"
"वहाँ क्यों?"
"पता नहीं," मैंने सच कहा। "घंटी ने कहा — लोहे के पीछे।"
मीरा का चेहरा बदल गया। वो बिजलीघर का नाम सुनकर ही सख़्त हो जाती है, और मुझे उसकी वजह पता है। वहाँ लोहे के बड़े बक्से रखे हैं, और उन्हीं में से एक में एक साया बैठा है जिसे रणवीर अपनी ताक़त बनाकर रखता है। शहर उसके नाम को नहीं जानता। मैं उसे किसी नाम से नहीं बुलाता। कुछ चीज़ों को बिना नाम के ही रहने देना चाहिए।
"मैं साथ चलती हूँ।"
"नहीं।"
"अंकुश—"
"मीरा, अगर वहाँ कुछ है, तो वो तेरे कैमरे को पहले देखेगा। और मुझे नहीं चाहिए कि आज कोई तुझे भी देखे। तू गुमटी पर रह, शबनम आपा के पास। अगर आधे घंटे में मैं न लौटूँ, तो पापा और उस्ताद को लेकर आ जाना।"
वो मान गई, क्योंकि वो बेवकूफ़ नहीं है। पर जाते वक़्त उसने मेरी कमीज़ की जेब में घंटी की तरफ़ देखकर कहा, "उसे चेतावनी देने दे। वो कभी बेकार नहीं बोलती।"
मैं चल पड़ा।
गली पार करके पीछे वाला पुराना रास्ता आता है, जहाँ ईंटें ढीली हैं और नाली कब की सूख चुकी है। रास्ते के आख़िर में अस्पताल की पिछली दीवार है, और उससे पहले बाएँ हाथ पर पीछे की गली मुड़ती है, जहाँ उस्ताद की पुरानी दुकान है।
और उसके भी पीछे, पुराने बाज़ार के पीछे, बिजलीघर।
धूप वहाँ तक नहीं पहुँचती। कम से कम आज नहीं।
मैं जैसे-जैसे आगे बढ़ा, हवा का स्वाद बदलता गया। धूल में वो गंध आ रही थी जो बरसों से बंद लोहे से आती है — जैसे सिर्फ़ हवा और ज़ंग ने मिलकर एक कसम खाई हो कि यहाँ कुछ ज़िंदा नहीं रहेगा।
फाटक पर मैंने कदम रोका।
वहाँ धूल में कुछ पड़ा था। एक चप्पल। छोटी, घिसी, दाहिनी। और उसके पास ही, बहुत हल्का, किसी बच्चे के नंगे पैर का निशान — जैसे वो एक चप्पल खोकर भागा हो और दूसरी भी हाथ में उतार ली हो।
मैंने चप्पल उठाई। उस पर उस्ताद की दुकान की धूल थी, और तली पर वो चिकना ग्रीस का निशान जो मुझे बहुत अच्छे से पहचाना हुआ था।
मैंने घंटी को हल्का बजाया।
"अंदर है," घंटी ने कहा। "बच्चा रो रहा है।"
"और कुछ?"
घंटी देर तक चुप रही। फिर बोली — "यहाँ कुछ और भी साँस लेता है। तू उससे बात न कर।"
मेरे भीतर कुछ ठंडा हुआ। पर मैं आज डरने के लिए नहीं आया था।
फाटक खटखटाया तो अपने आप खुल गया, और मैं अंदर गया।
भीतर बड़ा हॉल है। ज़मीन पर मोटी धूल, कोने में टूटे लोहे के बड़े बक्से, ऊपर टूटी छत से आती हुई पतली रोशनी, और हवा में एक बहुत हल्की सी चुभन, जो इंसानी नहीं लगती।
मुझे लगा जैसे मेरे कान के पीछे कोई मुझे देख रहा है।
मैंने उस तरफ़ देखा भी नहीं। क्योंकि मुझे पता था — देखने से वो कभी नहीं मिटता।
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