The Mysterious Bell709 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 709

7 min read November 5, 2026

लक्ष्मी देवी ने पोटली को गोद में रखा। उन्होंने उसकी तहें सीधी कीं। फिर दोबारा सीधी कीं। फिर तीसरी बार। यही आदत है ना — जब हाथ कुछ नहीं कर पाते, तो वो किसी चीज़ को सीधा करने लगते हैं।

"मैं मना कर रही हूँ," उन्होंने कहा।

"मना कर दीजिए," मैंने कहा।

चुप्पी।

"मना कर रही हूँ," वो फिर बोलीं, इस बार ज़रा धीमे, जैसे खुद को याद दिला रही हों।

मैंने कुछ नहीं कहा।

और फिर वो टूट गईं। अजीब तरह से टूटी — न रोईं, न चिल्लाईं। बस बोलने लगीं, और शब्द निकलते गए, एक के बाद एक, जैसे कोई पुरानी मोटी किताब से पन्ने फटकर गिर रहे हों।

"मैं दस घरों में झाड़ू लगाती हूँ।"

मैं चुप रहा।

"दस घर।" उन्होंने अपनी उँगलियाँ उठाईं और गिनने लगीं, पर घायल हाथ की वजह से गिनती अधूरी रह गई। "सुबह पाँच बजे मोहन के घर। छह बजे भाटिया की हवेली। सात बजे नसीमा की दुकान के पीछे वाला हिस्सा — वो अलग है, उसका पैसा उसी महीने देती है। आठ बजे चूड़ी वाली की दुकान। नौ बजे डॉक्टर साहब के यहाँ — वहाँ चार मंज़िल है और लिफ़्ट नहीं है।"

वो रुकीं। अपनी कमर पर हाथ रखा। फिर बोलीं, "दोपहर में बर्तन। शाम को दो और घर। और रविवार को लोगों के कपड़े।"

"दीदी—"

"तूने कहा था बीच में नहीं बोलेगा।"

मैं चुप हो गया।

"मैंने गिना है," उन्होंने कहा। "एक बार नहीं, सौ बार गिना है। मैंने सोचा है कि अगर मैं एक घर और ले लूँ, तो साल भर में टिंकू को अच्छे स्कूल में डाल दूँगी। फिर सोचा, अगर दो घर और ले लूँ, तो उसकी किताबें, उसकी फ़ीस, और उसके जूते भी। मेरे बेटे को मैंने आज तक नए जूते नहीं दिए। उसके जूते उसके चचेरे भाई के पुराने हैं। उसके जूते ढीले हैं और वो दौड़ता है तो उसके पैर फिसलते हैं। और वो मुझे कभी नहीं बताता। कभी नहीं। मैं उसकी माँ हूँ और मुझे पता चलता है…"

उनकी आवाज़ रुक गई।

"पता चलता है उस्ताद से?" टिंकू ने धीरे से कहा। "अम्मी, मुझे पता है तुम क्या सोचती हो। तुम सोचती हो कि मैं स्कूल जाता हूँ।"

"तू जाता है।"

"मैं गेट तक जाता हूँ।"

कमरा ठंडा हो गया।

"मैं गेट तक जाता हूँ, अम्मी। और फिर मैं वापस मुड़ जाता हूँ। पिछले तीन महीने से।" टिंकू की आवाज़ पतली थी पर साफ़। "क्योंकि स्कूल में मास्टर जी दो बार मुझे बुला चुके हैं। और उन्होंने मास्टर जी के कमरे के बाहर कहा था — ये बच्चा पिछली क्लास में बैठा रह जाएगा। और उस दिन सब हँसे थे। सब। दो लड़के और एक मास्टर, जो मुझे उस कमरे से बाहर जाते हुए देख रहे थे।"

लक्ष्मी देवी ने पोटली को और कसकर पकड़ लिया।

"मैं डरता हूँ," टिंकू ने कहा। "मैं उस स्कूल से डरता हूँ, अम्मी। मैं उस गली से डरता हूँ। मैं सुबह बस्ता उठाता हूँ और रास्ते में सोचता हूँ कि आज क्या बहाना बनाऊँ।"

"तूने मुझे क्यों नहीं बताया?"

"क्योंकि तुम रोज़ थकी होती हो।" टिंकू की आवाज़ अब काँप रही थी। "तुम घर आती हो और चप्पल उतारते हुए पहले कमर पकड़ती हो, फिर पानी पीती हो। और उसके बाद तुम खाना बनाती हो। मैंने एक बार सोचा था कि बताऊँ, फिर देखा कि तुम नींद में बैठे-बैठे सिर हिला रही थी। फिर मैंने नहीं बताया।"

लक्ष्मी देवी ने अपनी आँखें बंद कर लीं।

और मुझे उस वक़्त अपनी माँ याद आई। वो भी ऐसे ही नींद में सिर हिलाती हैं, और वो भी मुझे कभी नहीं बताती कि दर्द कहाँ है। और मैं भी उन्हें कभी नहीं बताता।

ये गली कोई जगह नहीं है। ये लोगों का एक झुंड है जो एक-दूसरे के सच को बचाने के चक्कर में खुद को अकेला कर लेता है।

"तू मशीन सीखना चाहता है," लक्ष्मी देवी ने कहा। आँखें बंद थीं, पर आवाज़ साफ़।

"हाँ।"

"क्यों?"

टिंकू ने मेरी तरफ़ नहीं देखा। उसने छत की तरफ़ देखा और अपनी चप्पल — वो एक चप्पल जो उसने मुझे दी थी और जो अब मेरे पैर के पास पड़ी थी — देखकर बोला, "क्योंकि अस्पताल वाले कहते हैं कि तुम्हारी कमर में हड्डी घिस गई है। और इलाज में पैसा लगेगा। और मुझे पता है तुम नहीं जाओगी, क्योंकि तुम कहोगी कि पैसा नहीं है।"

लक्ष्मी देवी की आँखें खुल गईं।

"मैंने किसी से कहा नहीं," टिंकू ने जल्दी से कहा। "मैंने पर्ची देख ली थी। तुमने कमरे में रखी थी, आटे के डिब्बे के ऊपर। मैंने पढ़ लिया था। मैं पढ़ सकता हूँ, अम्मी। मुझे पढ़ना आता है। बस वो स्कूल…"

उसकी आवाज़ रुक गई।

"बस वो स्कूल ठीक नहीं लगता," उसने फुसफुसाया।

और फिर लक्ष्मी देवी ने वो किया जो उन्होंने शायद सालों में नहीं किया था। उन्होंने पोटली फ़र्श पर रख दी और आगे झुककर टिंकू का चेहरा अपनी दोनों हथेलियों में ले लिया। घायल हाथ भी, दोनों। कपड़ा सरक गया और खुली चोट पर टिंकू की गाल आ गई, पर उन्होंने हाथ नहीं हटाया।

"तो मेरे पास आ जाता," वो बोलीं। आवाज़ ऐसी जैसे किसी पुराने ताले में तेल डाला गया हो। "गेट से आगे मत जाता, मगर वापस घर मत आता। मेरे पास आ जाता। मैं तुझे चाय बना देती, और तू मेरी कमर पर मेरा हाथ रखकर बैठ जाता। मैं पूछती कि क्या करेगा, तू कहता कि पता नहीं। बस बैठ जाता। इतना ही चाहिए था, टिंकू।"

"तुम्हारे पास मेरे लिए वक़्त कहाँ था," टिंकू ने कहा — और वो रो पड़ा।

मैं मुड़कर दरवाज़े की तरफ़ देखने लगा। क्योंकि मैं रोता हुआ बच्चा देख सकता हूँ, पर माँ को रोते नहीं देख सकता। और लक्ष्मी देवी रो रही थीं — बिना आवाज़ के, बस होंठ काँप रहे थे।

घंटी गरम थी।

मैंने जेब में हाथ डाला। पीतल बिल्कुल ताज़ी उबली चाय जैसा। और फिर, कमरे के बीच में पड़े उस टूटे रेडियो से एक आवाज़ आई।

घरघराहट। दबी हुई, खुरदरी। जैसे कोई दूर के कमरे में पानी उबाल रहा हो।

लक्ष्मी देवी ने सिर उठाया। "ये चल रहा है?"

"नहीं," मैंने कहा। "इसमें तार टूटा है। इसमें प्लग नहीं है।"

"तो आवाज़ कहाँ से आ रही है?"

"Aapki nahi, मेरी भी नहीं," मैंने धीरे से कहा। "सबकी है।"

और फिर कैसेट वाली आवाज़ आई।

मैं उसे पहचानता हूँ। वो आवाज़ मैंने पिछली रात पहले भी सुनी थी — टूटी, बीच में कटती हुई, पर साफ़। पापा की जवान आवाज़। उससे दुबली, उससे तेज़, और उसमें वो चीज़ थी जो अब नहीं है — उम्मीद।

"मैंने अंगूठा लगाया था," आवाज़ ने कहा।

कमरे में लक्ष्मी देवी भी चुप, टिंकू भी चुप।

"मैंने अंगूठा लगाया था," आवाज़ दोहराई, "पर उस काग़ज़ पर नहीं।"

मेरे हाथ की पकड़ ढीली पड़ गई।

"उस काग़ज़ पर नहीं, जो तूने देखा।"

फिर सरसराहट। फिर कुछ गिरने की आवाज़, जैसे कोई मेज़ पर हाथ रखकर उठा हो।

और कैसेट चुप हो गई।

रेडियो अब भी घरघरा रहा था, फिर वो भी रुका। दो सेकंड का अंधेरा — न अंधेरा, खालीपन — और मैंने अपनी जेब में पीतल को फिर महसूस किया। ये बार वो ठंडी थी।

लक्ष्मी देवी मेरी तरफ़ देख रही थीं। "वो कौन था?"

"मेरे पापा," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ अपने कानों में ऐसी लगी जैसे किसी और की हो। "जवान पापा।"

"अंकुश…" — वो कुछ कहने ही वाली थीं कि मैंने हाथ उठा दिया।

क्योंकि मुझे एक चीज़ समझ आ रही थी। धीरे-धीरे, जैसे सुबह की धूप में दीवार पर कोई पुराना लिखा हुआ उभरता है।

मैंने सुना था — पापा ने अंगूठा लगाया। रात भर यही सुना। माँ ने कहा — उसने नाम दिया, अंगूठा लगाया। पापा ने खुद कहा — माँ की दवा के लिए, मजबूरी में, शंकर यादव नाम लिखा, अंगूठा लगाया, और नीचे अनकुश… मेरा नाम… एक खाली लाइन।

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