The Mysterious Bell – Chapter 704
टिंकू मेरी कमीज़ पकड़े हुए था। उसकी उँगलियाँ कस रही थीं।
और उसने कुछ नहीं कहा।
चुप हो गया।
वो चुप्पी मुझे पहचानी लगी। मुझे याद आया कि मैं चौदह साल का था, और मैंने माँ से कहा था कि मुझे स्कूल छोड़कर दुकान पर बैठना है, क्योंकि पापा की आँखें कम हो रही थीं और कोई कमाने वाला नहीं था। माँ ने उस दिन चूल्हा बंद कर दिया था और मेरी तरफ़ नहीं देखा था। पूरी रात उनके हाथ से चूड़ियाँ खटकती रहीं। सुबह उन्होंने मुझे चाय और दो पराठे दिए, और कहा — "जा, जो तू कह रहा है वो कर। पर एक बात याद रख, मैंने तुझे किसी की सेवा करने के लिए जना था, अपनी माँ की चुप्पी के लिए नहीं।"
वो दिन मैंने कभी किसी को नहीं बताया। न मीरा को, न काजल को, न टिंकू को।
मैंने रेडियो के तार को हाथ में लिया। लाल तार, जो बीच से टूटा हुआ था।
"देख," मैंने टिंकू से कहा, "ये लाल तार।"
उसने देखा, आँखों में पानी भरा हुआ।
"अब मैं इसके दोनों सिरों को जोड़ने की कोशिश करूँ," मैंने कहा, "और ये जुड़ ही नहीं रहे, तो सही है न?"
"हाँ," टिंकू ने धीरे से कहा।
"क्यों नहीं जुड़ रहे?"
"टूटे हैं।"
"और जो टूटे हों, उन्हें क्या करना पड़ता है, ये तुझे पता है?" मैंने पूछा।
टिंकू ने कुछ देर सोचा। "जोड़ना पड़ता है।"
"नहीं," मैंने कहा, "उन्हें पहले एक-दूसरे के पास मानना पड़ता है।" मैंने तार के दोनों सिरों को उसकी हथेली पर रख दिया। "दबाने से जुड़ेंगे नहीं। गरम करने से जुड़ेंगे नहीं। चिल्लाने से जुड़ेंगे नहीं। इन्हें जोड़ने के लिए पहले इन्हें समझना पड़ता है कि ये एक ही तार के दो हिस्से थे।"
लक्ष्मी देवी ने उन्हें देखा। टिंकू ने तार देखा।
"तो ये जुड़ जाएँगे?" टिंकू ने पूछा।
"हाँ," मैंने कहा, "पर एक शर्त है। मुझे उन्हें जोड़ते वक़्त झूठ नहीं बोलना। अगर मैं कहूँ कि ये तार पूरा ठीक हो जाएगा और ये नहीं होगा, तो कुछ नहीं होगा।"
लक्ष्मी देवी ने मेरी तरफ़ देखा, और उनकी आँखों में वो चीज़ आई जो मैंने माँ की आँखों में देखी थी — थकान, जो गुस्से से ज़रूरी ज़्यादा होती है।
"अंकुश भाई," उन्होंने कहा, "मुझे ये सब समझ नहीं आता। मुझे इतना बता दो — मेरा बेटा स्कूल जाएगा या नहीं?"
और ठीक उसी वक़्त, मेरी जेब में घंटी बोली।
बहुत धीरे से। इतना धीरे कि लक्ष्मी देवी को सुनाई नहीं दिया होगा। पर मुझे साफ़ सुनाई दिया।
"अब," उसने कहा।
"क्या अब?" मैंने मन में पूछा।
"ये दो बात करेंगे, तब रेडियो बोलेगा। तारों से नहीं, इनसे।"
मैंने साँस ली।
"देवी जी," मैंने कहा, "मैं सीधी बात करूँगा, क्योंकि मुझे इस वक़्त झूठ नहीं बोलनी है।"
वो सीधी खड़ी हो गईं।
"टिंकू तीन दिन से स्कूल नहीं गया," मैंने कहा, "और आप जानती हैं ये क्यों है? सिर्फ़ इसलिए नहीं कि वो पढ़ाई नहीं करना चाहता। इसलिए भी कि उसे लगता है कि स्कूल में लोग उसे उसके पापा के बिना देखकर अलग बात करते हैं।"
लक्ष्मी देवी की साँस रुक गई।
टिंकू ने मेरी तरफ़ ऐसे देखा जैसे मैंने उसका कोई छिपा हुआ ढक्कन खोल दिया हो।
"उस्ताद," उसने कहा।
"चुप," मैंने कहा, "मैं देवी जी से बात कर रहा हूँ। और तू जानता है, मेरे बीच में बोले बिना, मैं तेरे से कभी झूठ नहीं बोलता। अब तेरी बारी। तेरी एक सच्ची बात।"
कमरे में चुप्पी बैठ गई।
लक्ष्मी देवी ने उसे देखा, और उनका चेहरा उस तरह बदला जैसे किसी नए नाम को पहचानने की कोशिश कर रही हों।
"माँ," टिंकू ने कहा, और उसकी आवाज़ टूट गई, "तुम सुबह चली जाती हो, और रात को जब लौटती हो, तब मैं सो जाता हूँ। मैं तुम्हारे चेहरे को पूरा दिन याद नहीं रख पाता। मुझे तुम्हारी साड़ी याद रहती है, तुम्हारा चेहरा नहीं।"
लक्ष्मी देवी ने अपना मुँह हाथ से ढक लिया।
"और स्कूल में," टिंकू ने कहा, "मास्टर जी ने एक दिन पूरी क्लास के सामने कहा कि मेरा दाख़िला ही रहम के पैसों से हुआ है। मैं उस दिन से क्लास में तीसरी बेंच से आगे नहीं बैठा। मुझे लगता है कोई मुझे देख रहा है।"
लक्ष्मी देवी ने हाथ नीचे किया। उनकी आँखों से पानी बह रहा था, और वो पोंछने की कोशिश भी नहीं कर रही थीं।
"तूने मुझे कभी नहीं बताया," उन्होंने कहा।
"तुम कब घर पर होती हो," टिंकू ने कहा, और इस बार उसकी आवाज़ में गुस्सा भी था और दर्द भी, "मैं बताता, तो कब बताता?"
लक्ष्मी देवी कुछ देर खड़ी रहीं।
फिर वो धीरे से दुकान के पास पड़ी लकड़ी की स्टूल पर बैठ गईं।
और उन्होंने कहा, "मैं रोज़ चार घरों में साफ़ करती हूँ, अंकुश भाई। चार। रोज़। मेरे हाथों की खाल सख़्त हो गई है। मुझे चाय का स्वाद नहीं आता, क्योंकि मैं चाय में चीनी डालकर भूल जाती हूँ कि मैंने डाली है या नहीं।" उन्होंने अपनी हथेली सामने की — सख़्त, फटी, उँगलियों पर सफ़ेद निशान। "मैं चाहती हूँ कि ये लड़का पढ़ ले, ताकि इसके हाथ ऐसे न हों। बस इतना चाहती हूँ।"
टिंकू ने उनका हाथ देखा।
और मैंने देखा कि उसके चेहरे पर से गुस्सा उतरने लगा — उतना नहीं जितना मैं सोच रहा था, पर थोड़ा।
मेरे हाथ में रेडियो था।
और ठीक उस वक़्त, उसमें से एक धीमी फुसफुसाहट आई।
न आवाज़, न शब्द — सिर्फ़ एक धीमी सरसराहट, जैसे किसी पुराने रेडियो में स्टेशन ढूँढते वक़्त आती है। मैंने रेडियो को कान के पास किया।
"क्या हुआ?" लक्ष्मी देवी ने पूछा।
"कुछ नहीं," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ धीमी थी।
पर सच ये था कि मेरा दिल तेज़ी से धड़कने लगा था। तीन दिन बाद रेडियो के अंदर कुछ हिला था। और वो कुछ मेरी वजह से नहीं, तारों की वजह से नहीं, पेचकस की वजह से नहीं।
वो उन दो लोगों की वजह से हिला था जो अभी यहाँ बैठे थे।
मैंने रेडियो नीचे रख दिया।
"देवी जी," मैंने कहा, "मैं आपसे एक बात कहूँगा, और ये बात मैं जान-बूझकर नहीं कह रहा, मजबूरी में कह रहा हूँ। मुझे अपनी दुकान पर टिंकू की ज़रूरत है। पर मुझे अपनी दुकान पर उसकी पढ़ाई से ज़्यादा ज़रूरत है।"
"क्या कह रहे हो?"
"मैं कह रहा हूँ," मैंने कहा, "कि अगर ये लड़का रोज़ स्कूल जाना छोड़ देगा, तो मैं इसे दुकान में नहीं रखूँगा। जो औज़ार ठीक से पकड़ नहीं सकता, वो गाड़ी में चोट मार देता है। और जो अपनी किताब नहीं पकड़ सकता, वो अपनी ज़ुबान नहीं पकड़ सकता। दोनों एक ही बात है।"
लक्ष्मी देवी ने मेरी तरफ़ देखा।
"पर मेरी एक शर्त है," मैंने कहा।
"क्या?"
"टिंकू स्कूल जाएगा, और शाम को दो घंटे मेरे पास आएगा।" मैंने टिंकू की तरफ़ देखा। "रोज़ आएगा। और तू जानता है कि मेरे पास आने का मतलब क्या है? मरम्मत। और मरम्मत का मतलब — सिर्फ़ रिंच घुमाना नहीं। हर चीज़ जो टूटी है, उसे पहले इंसान से ही जोड़ना पड़ता है।"
टिंकू ने सिर झुका लिया।
"और देवी जी," मैंने कहा, "मेरी भी एक सच्ची बात है। मुझे आपसे माफ़ी माँगनी है। मैं टिंकू को अपने पास रखता हूँ, उसे रोटी खिलाता हूँ, उसे मज़ाक करना सिखाता हूँ — पर मैंने कभी आपसे पूछा नहीं कि आप उसे किस चीज़ के लिए बड़ा करना चाहती हैं। मैंने मान लिया कि आप भी वही चाहती हैं जो मैं चाहता हूँ। ये मेरी गलती है।"
लक्ष्मी देवी ने कुछ देर मेरी तरफ़ देखा।
फिर उन्होंने धीरे से कहा, "मैं चाहती हूँ, ये मुझसे अच्छा आदमी बने। बस इतना। मुझे तनख्वाह नहीं चाहिए, नौकरी नहीं चाहिए। बस अच्छा आदमी चाहिए।"
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