The Mysterious Bell – Chapter 703
"नहीं," मैंने कहा, "मैं अपना नाम नहीं दूँगा। पर सात बजे वो मशीन गली में घुसेगी, तो उसे यही मिलेगा — पूरी गली, नाम लिए हुए, खड़ी हुई।"
और तभी घंटी, मेरी जेब के अंदर से, बहुत धीरे से बोली — इतना धीरे कि सिर्फ़ मैंने सुना।
"आज वो गिनना छोड़ देगा। आज वो नाम से बुलाएगा। और जिसे वो नाम से बुलाएगा, वो चुप नहीं रह पाएगा।"
॥
रात की आख़िरी आवाज़ मशीन की थी, और सुबह की पहली आवाज़ भी वही थी।
मैं दुकान के पीछे वाले कमरे से निकला तो आसमान में अभी पूरा उजाला नहीं आया था। गली के मुँह पर धूल की एक मोटी लकीर बनी हुई थी, जैसे किसी ने रात में रस्सी खींचकर ज़मीन पर निशान छोड़ दिया हो। मीरा कहती है कि मैं हर चीज़ को कहानी बना देता हूँ। शायद सच है। पर उस वक़्त मुझे वो लकीर किसी रस्सी जैसी ही लग रही थी — जिसे कोई खींच रहा हो, और हम सब उसके दूसरे सिरे पर बँधे हुए।
पीपल के नीचे दो लोग पहले से बैठे थे। बंसी बाबा, और उनके साथ हाफ़िज़ बाबा। दोनों चुप। बंसी बाबा के हाथ में कुल्हड़ था, जो ठंडा हो चुका था, और वो उसे पकड़े बैठे थे जैसे कोई चीज़ पकड़ी हुई ही इंसान को ज़मीन पर टिकाए रखती हो।
"अंकुश," बंसी बाबा ने कहा, "सुबह सात बजे का मतलब क्या होता है?"
"मतलब यह होता है, बाबा," मैंने कहा, "कि जो लोग छह बजे से डर रहे हैं, उन्हें नौ बजे तक पता चल जाएगा कि डरना बेकार था या ज़रूरी।"
"हँसी मत कर।"
"मैं हँस नहीं रहा, बाबा। मैं अपनी आवाज़ को टेढ़ा कर रहा हूँ, ताकि सीधी सुनाई न दे।"
वो मेरी तरफ़ देखने लगे, और मैंने उनकी आँखों में वो चीज़ देखी जो बुज़ुर्गों की आँखों में तब आती है जब वो जानते हैं कि मामला उनके हाथ में नहीं है।
मैं दुकान के अंदर गया।
शटर आधा उठाकर मैंने पीछे वाला दरवाज़ा खोला, कमरा ठंडा था और उसमें पापा की कमीज़ की गंध थी — कुछ धूल, कुछ साबुन, कुछ पुराने लोहे की। ट्रंक खुला पड़ा था। उसके अंदर वो जली परत अब भी मुँह खोले बैठी थी। मैंने उसे छुआ नहीं।
मेज़ पर टूटा रेडियो रखा था।
कल रात जब पापा उसे लेकर फाटक के बाहर खड़े मिले थे, तो उनके हाथ इतने काँप रहे थे कि रेडियो गिर जाता, अगर मैंने बीच में हाथ न बढ़ाया होता। फिर रात भर वो कमरे में बोलती रही — वो कैसेट। और जब सुबह उजाला आया, तो कैसेट चुप हो गई, मानो उसने अपना हिस्सा कह दिया और अब उसने मुँह फेर लिया हो।
मैंने पेचकस उठाया और रेडियो की पिछली प्लेट के पेंच खोलने लगा।
चार में से तीन पेंच आसानी से खुल गए। चौथा जाम था और उस पर ज़ंग की एक पतली सी परत बैठी थी। मैंने रेती निकाली, दो बार घुमाया, और तभी नीचे से कुछ खिसका।
रेडियो खुला।
और मैं देखता रह गया।
अंदर तारों का ऐसा जाल बना हुआ था कि मुझे लगा किसी ने जान-बूझकर उलझाया है। लाल, पीला, काला, हरा — चार रंग के तार, जो एक-दूसरे पर ऐसे लिपटे थे जैसे बच्चे घूमते-घूमते थककर एक ढेर में सो गए हों। एक जगह तार जला हुआ था और उसका सिरा टूटकर टिन के खोल से चिपक गया था। दूसरी जगह किसी ने दो तारों को पीली टेप से बाँध दिया था, और वो टेप सूखकर काग़ज़ जैसी हो गई थी।
मैंने माथा पीटा।
"बाप रे," मैंने अपने आप से कहा, "पापा ने ये तार जोड़े हैं या सुलझाए हैं?"
कमरे में मेरी ही आवाज़ लौटी।
मैंने तारों को उँगली से सहलाया।
उनमें से एक लाल तार था, जो बीच से टूटकर दो हिस्सों में पड़ा था — और दोनों सिरे एक-दूसरे की तरफ़ ऐसे मुड़े थे जैसे एक-दूसरे को छूने के लिए बेताब हों, पर पास न आ पाएँ।
मैं हँसा।
फिर हँसी मेरे गले में ही अटक गई।
क्योंकि मुझे लगा — ये गली है।
लाल तार मीरा है, जो हर बात की सच्चाई नापना चाहती है। पीला तार माँ है, जो हर बात में हलवा खोज लेती है। काला तार पापा है, जो चुप रहकर सब कुछ से जुड़ा रहता है। और हरा तार — हरा तार वो है जो कभी किसी ने ठीक से नहीं देखा, पर जिसके बिना कोई भी पंखा नहीं घूमता।
"बोल," घंटी ने कहा।
मैंने उसे जेब से निकाला।
"तू तो कल रात से ही यही कह रही है," मैंने कहा, "बोल, बोल, बोल। मैं कोई रेडियो हूँ क्या, जो बटन दबाया और बजने लगा?"
"रेडियो की तारें उलझी नहीं हैं," घंटी ने कहा। "रेडियो की तारें टूटी हैं। फ़र्क़ समझ।"
मैंने उसे घुमाया, हथेली में रखा, गरमाहट महसूस की।
"क्या फ़र्क़?" मैंने पूछा।
"उलझी चीज़ सुलझती है," घंटी ने कहा। "टूटी चीज़ जोड़नी पड़ती है। और जोड़ने के लिए दो आदमी चाहिए।"
मैं कुछ कहता, उससे पहले ही गली में चप्पलों की तेज़ आवाज़ आई। फिर एक आवाज़ आई जिसे मैं पूरी गली में पहचानता हूँ — लक्ष्मी देवी की।
"टिंकू!"
मैंने सिर उठाया।
लक्ष्मी देवी दुकान के सामने खड़ी थीं। साड़ी का पल्लू कंधे से खिसका हुआ, बाल बेतरतीब, और हाथ में टिंकू का स्कूल बैग। वो बैग मेरे हिसाब से तीन किलो का तो होगा, क्योंकि उनका हाथ उसके वज़न से झुका हुआ था, और वो शिकायत कर रहा था जैसे बैग भी उनसे कह रहा हो — देखो, मुझे कितने दिन से कोई छू नहीं रहा।
"टिंकू!" लक्ष्मी देवी ने फिर कहा।
पीछे से टिंकू की आवाज़ आई, "मैं यहीं हूँ…"
वो दुकान के पीछे से निकला। हाथ में पीतल की एक छोटी बाल्टी थी, जिससे पानी टपक रहा था, और उसके जूते पर ग्रीस का काला निशान था। वो लक्ष्मी देवी को देखकर रुक गया।
"तीन दिन," लक्ष्मी देवी ने कहा, और उनकी आवाज़ कमरे के किसी कोने से आई हुई लगी। "तीन दिन हो गए, टिंकू। मास्टर जी ने दो बार मुझे बुलाया। दो बार। मैं शर्म से ऐसी बैठी कि मैं किसी के घर से उठकर भाग जाऊँ।"
टिंकू ने बाल्टी ज़मीन पर रखी।
"माँ," उसने कहा।
"माँ मुझे नहीं चाहिए।" लक्ष्मी देवी ने उसके सिर पर हाथ रखने के लिए हाथ बढ़ाया, फिर रोक लिया। "ये बैग ले। और इसके साथ स्कूल जा।"
टिंकू पीछे हटा।
और फिर मुझे क्या करना चाहिए था? मैं दुकान का मालिक हूँ, मैं उसका उस्ताद हूँ, मैं गली का वो आदमी हूँ जिसे हर कोई "अंकुश भाई" कहता है — तो मुझे सीधे बीच में नहीं पड़ना चाहिए था।
पर टिंकू ने मेरी ओर देखा, और उसकी आँखों में वो चीज़ थी जो मैं अपने ही चेहरे में कभी नहीं देख पाता — डर, जो गुस्सा बनकर बाहर आना चाहता है।
वो दौड़कर मेरे पीछे आया और मेरी कमीज़ पकड़ ली।
"मैं स्कूल नहीं जाऊँगा," उसने कहा।
लक्ष्मी देवी रुक गईं।
"टिंकू," उन्होंने कहा।
"मैं नहीं जाऊँगा," टिंकू ने दोहराया, और उसकी आवाज़ अब कमरे की छत से टकराने लगी थी। "मुझे पढ़ाई नहीं करनी। मुझे उस्ताद के साथ रहना है। मुझे साइकिल ठीक करनी है।"
लक्ष्मी देवी ने बैग उनके सामने ज़मीन पर रख दिया, जैसे कोई भारी चीज़ उतार रही हों, और उनकी आँखें भर आईं।
"मैं घरों में काम करती हूँ," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ धीमी हो गई, "अंकुश भाई, ये मुझे पता है कि तुम मेरे बेटे को अपने से कम नहीं मानते। पर सुनो। मैं सुबह छह बजे किसी के घर की रसोई साफ करती हूँ, दोपहर में दूसरे के बच्चों को खाना खिलाती हूँ, शाम में तीसरे के कपड़े धोती हूँ। जब मैं अपनी साड़ी पर लगा साबुन देखती हूँ, तो मुझे लगता है — ये साबुन किसी और के घर का है।"
उन्होंने आँचल से आँखें पोंछीं।
"मैं नहीं चाहती," उन्होंने कहा, "कि मेरा बेटा भी किसी और के घर का साबुन लेकर अपनी साड़ी धोए। मैं चाहती हूँ कि ये पढ़े। बड़ा आदमी बने। ताकि मैं किसी के आगे हाथ न फैलाऊँ।"
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