The Mysterious Bell – Chapter 700
सिर्फ़ साँस। हल्की। बूढ़ी। जैसे कोई बहुत देर से चलकर आया हो और अब सहारे के लिए दरवाज़े पर झुका खड़ा हो।
मैंने उँगली कुंडी पर रखी।
तभी दूसरी दस्तक आई।
इस बार तेज़।
इतनी तेज़ कि मोमबत्ती की लौ एक तरफ़ झुक गई और फिर लौट आई। और दरवाज़े के ऊपर से सूखा प्लास्टर झरकर मेरे कंधे पर गिरा।
काजल ने एक छोटी सी आवाज़ निकाली।
और घंटी, मेरी जेब में, तब तक गरम हो चुकी थी। इतनी गरम कि मुझे कपड़े के आर-पार जलन महसूस हुई।
मैंने उसे हाथ में लिया।
वो फुसफुसाई —
"जो बाहर है, वो दरवाज़ा नहीं माँग रहा।"
मैंने आँखें बंद कर लीं।
"तो क्या माँग रहा है?"
"नाम।"
मेरी आँखें खुल गईं।
"किसका नाम?"
घंटी चुप हो गई। बस गरम बनी रही।
मैंने पीछे मुड़कर सबको देखा। पापा, माँ, काजल, मीरा, उस्ताद, शबनम आपा, बबलू, टिंकू — और दरवाज़े के बाहर, गली की तरफ़ जाती हुई सीढ़ी पर खड़े दुबे अंकल, जो पीछे से आ गए थे और अब अपनी पुरानी नीली शर्ट में, हाथ में छड़ी लिए, चुपचाप मेरी तरफ़ देख रहे थे।
"बोलो तो," मैंने कहा, "कोई तो बोले।"
उस्ताद ने कैंची मेज़ पर रखी और खड़े हो गए।
"अंकुश," उन्होंने कहा, "अगर मैं बोलूँ, तो बात तेरे और मेरे बीच रहेगी?"
"नहीं।"
तो वो चुप रहे।
अच्छा हुआ।
क्योंकि जो वो बोलने वाले थे, वो मुझे खुद पता लगाना था।
मैंने मीरा की तरफ़ देखा।
"कैमरा चालू करो," मैंने कहा।
"क्या?"
"कैमरा चालू करो," मैंने दोहराया, "अगर आज यहाँ कुछ होगा, तो वो टेप में रहेगा। और अगर अगली सुबह हममें से कोई याद नहीं कर पाए कि क्या हुआ, तो टेप याद दिला देगा।"
मीरा ने एक पल मुझे देखा, फिर कैमरा उठाया। लाल बत्ती जली। बत्ती न होने के बाद भी उसकी छोटी लाल रोशनी कमरे में एक नया रंग ले आई।
फिर मैं दरवाज़े के पास गया और तीसरी दस्तक का इंतज़ार करने लगा।
पर वो नहीं आई।
एक सेकंड।
दो सेकंड।
पाँच सेकंड।
बाहर से सिर्फ़ हवा आ रही थी।
और फिर मैंने वो सुना जिसने मेरी छाती में कुछ जमा दिया।
धातु की आवाज़।
दरवाज़े का हैंडल।
बहुत धीरे। बहुत सलीके से।
जैसे बाहर खड़ा आदमी अपनी उँगलियाँ हैंडल पर रखकर उसे बिना ज़ोर लगाए घुमा रहा हो। एक चौथाई। आधा। फिर रुक गया।
कुंडी अंदर से बंद थी। मैंने उसे खींचकर देखा — नहीं हिली।
और तभी मेरे कानों में एक आवाज़ आई, ऐसी जैसे दरवाज़े की लकड़ी के अंदर से कोई बोल रहा हो।
वही बूढ़ी आवाज़।
वही, जो फोन पर थी।
"अंकुश यादव," उसने धीरे से कहा, "हाँ, मैं जानता हूँ। तेरे घर में तीन आदमी हैं जिन्होंने इस दरवाज़े को रात में खोलने की क़सम खाई थी — तेरे दादा, तेरे पापा, और तू।"
मेरी उँगलियाँ हैंडल पर जम गईं।
"दो ने खोला," आवाज़ ने कहा, "तेरी बारी है।"
और हैंडल मेरे हाथ के नीचे, अपने आप, बहुत धीरे-धीरे, पूरा घूम गया।
हैंडल घूम गया।
पूरा।
मेरी हथेली के नीचे धातु ठंडी थी, पर मेरे भीतर कुछ गरम था जो गले तक चढ़ आया था।
मैंने साँस रोक ली।
कुंडी ने पकड़ा हुआ था। दरवाज़ा हिला भी नहीं। बस हैंडल घूमकर अपनी जगह पर लौट रहा था, बहुत धीरे, जैसे बाहर खड़ा कोई समझ गया हो कि आज अंदर से कोई नहीं खोलेगा।
और फिर एक हल्की सी आवाज़ आई।
टिक।
जैसे कोई चीज़ अपनी जगह पर बैठ गई हो।
"ये क्या था?" बबलू ने फुसफुसाया।
"चुप।"
"पर —"
"बबलू," शबनम आपा ने कहा, "अगर तुझमें हिम्मत है तो बोल, वरना मुँह बंद रख।"
बबलू चुप हो गया।
मैंने अपना हाथ हैंडल से हटाया। मेरी हथेली पर ज़ंग का एक निशान छप गया था — लाल, गीला, जैसे किसी ने उँगली से मेरे हाथ पर कुछ लिखा हो।
मैंने उसे रगड़ा। नहीं गया।
"पापा," मैंने कहा, बिना पीछे मुड़े, "आपने कहा था कि आज सच बाहर आएगा।"
"हाँ।"
"तो बोलिए।"
"अंकुश —"
"बोलिए," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ अपने ही कानों में अजनबी लगी, "क्योंकि अगर बाहर वाला आपका नाम जानता है, तो मेरा भी जानता है। और वो मेरा नाम ऐसे ले रहा था जैसे घर का कोई बुज़ुर्ग बुलाता हो।"
पापा ने कुछ कहना चाहा, पर माँ ने उनका हाथ पकड़ लिया।
"पहले वो," माँ ने धीरे से कहा, "जो सच है।"
पापा ने आँखें बंद कीं।
"तेरे दादा ने एक रात इस दरवाज़े पर कुछ बोला था," उन्होंने कहा, "और मैं उस रात सीढ़ी पर बैठा सुन रहा था। मैं आठ साल का था। उन्होंने कहा था — जो घर में रहता है, वो बाहर वालों से नहीं डरता। और फिर उन्होंने दरवाज़ा खोला।"
कमरे में इतनी चुप्पी फैल गई कि मुझे मोमबत्ती जलने की आवाज़ सुनाई दी।
"और अंदर क्या आया?" काजल ने पूछा।
पापा ने उसकी तरफ़ देखा, और उनकी आँखों में कुछ ऐसा था जो मैंने पहले कभी नहीं देखा — शर्म।
"कुछ नहीं आया," उन्होंने कहा, "बाहर से दादा गए, और अंदर से दादा आए। पर बोलने का ढंग बदल गया था। बाद में उन्होंने मुझे कभी उस रात के बारे में नहीं बताया। बस एक दिन कहा — बेटा, दरवाज़े पर तीन दस्तक होती हैं। तीसरी के बाद कोई नाम बोलेगा। तू अपना नाम न बोलना।"
"और आपने खुद कोशिश की?" मैंने पूछा।
पापा ने गला साफ़ किया।
"मैंने उस रात अंगूठा लगाया था," उन्होंने कहा, "कुंडी पर। और मेरा अंगूठा चिपक गया था। मैंने खींचा तो खाल उतर आई। देख —"
उन्होंने हाथ बढ़ाया।
उनके अंगूठे पर एक गोल निशान था, सफ़ेद, चिकना। बचपन से मैंने उसे नहीं देखा था। मुझे याद आया — जब वो चाय का कप पकड़ते थे, अंगूठा टेढ़ा रखते थे।
मेरे भीतर कुछ बैठ गया।
माँ ने मेरी तरफ़ देखा।
"अब समझा?" उन्होंने कहा, "ये सब नहीं है। ये सब तब से चल रहा है जब तू पैदा भी नहीं हुआ था।"
घंटी फिर गरम हुई।
मैंने उसे कान के पास लाया।
"बोल," मैंने कहा।
"अब जो होगा," घंटी ने कहा, "वो दरवाज़ा नहीं खोलेगा।"
"तो?"
"वो भीतर आएगा। और जब आएगा, तो तेरी आवाज़ में बोलेगा।"
मेरे हाथ से घंटी फिसल गई। मेज़ पर गिरी, एक बार लुढ़की, और रुक गई।
तभी दुबे अंकल सीढ़ी से नीचे आए। उनकी छड़ी की आवाज़ कमरे में गूँजी।
"अंकुश बेटा," उन्होंने कहा, "मैंने इस दरवाज़े को दो बार खुलते देखा है।"
"कब?"
"जब तुम्हारे दादा गए थे। और जब तुम्हारे पापा खड़े थे।"
"और दोनों बार?"
दुबे अंकल ने छड़ी का सिरा फ़र्श पर टिकाया।
"दोनों बार," उन्होंने कहा, "घर से एक नाम मिट गया।"
मीरा का कैमरा अभी भी चल रहा था। मुझे उसकी छोटी लाल बत्ती दिख रही थी और मुझे लगा कि दुनिया में शायद यही एक चीज़ है जो अभी सच बोल रही है।
मैंने कुंडी को एक बार हाथ लगाया।
फिर पीछे हट गया।
"अच्छा," मैंने कहा, "तो आज मैं अपना नाम नहीं बोलूँगा।"
माँ ने सिर हिलाया।
"और तू दरवाज़ा भी नहीं खोलेगा।"
"नहीं खोलूँगा।"
मैंने सबको देखा — टिंकू माँ की साड़ी का पल्लू पकड़े बैठा था, उस्ताद कैंची उठाकर अपनी गोद में रख चुके थे, जैसे अब किसी चीज़ की ज़रूरत पड़ेगी।
और फिर तीसरी दस्तक आई।
पर ये दस्तक थी ही नहीं।
ये एक धमाका था, जैसे कोई बाहर से अपनी पूरी देह दरवाज़े पर गिरा दे। दरवाज़ा अंदर की तरफ़ झुका, मोमबत्ती बुझ गई, और अंधेरे में मैंने सिर्फ़ इतना देखा कि हैंडल, बिना किसी हाथ के, बहुत धीरे-धीरे घूमने लगा।
धीरे-धीरे।
जैसे अब उसकी जल्दी न हो।
जैसे वो जानता हो कि दरवाज़ा खुद ही खुल जाएगा।
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