The Mysterious Bell – Chapter 701
दरवाज़े का हैंडल घूम रहा था।
धीरे-धीरे, बिना आवाज़, बिना जल्दी। जैसे किसी ने उँगलियाँ उस पर रख दी हों और अब बस यह देख रहा हो कि कितना ज़ोर लगे तो कुंडी अपनी जगह से हिले।
मैं दरवाज़े से सटा खड़ा था। कमीज़ की पीठ पर पसीना ठंडा हो रहा था। हथेली में घंटी दबी थी और वो गरम थी, इतनी गरम कि जले के निशान वाली जगह पर झुनझुनी छूट रही थी, पर मैंने हाथ नहीं खोला।
"सुनो," मैंने दरवाज़े की तरफ़ मुँह करके ज़ोर से कहा, "मैं अपना नाम नहीं बोलूँगा। और ये दरवाज़ा नहीं खोलूँगा। तुम जो करना है करो।"
मेरी आवाज़ कमरे में टकराई और लौट आई।
पीछे कोई हिला नहीं।
माँ दरवाज़े से चार कदम पीछे खड़ी थीं, चेहरा सख़्त, होंठ दबे हुए। काजल ने टिंकू का कंधा पकड़ रखा था। टिंकू मेरी तरफ़ देख रहा था, आँखें बड़ी, और उसके होंठ हिल रहे थे जैसे अंदर ही अंदर कोई गिनती कर रहा हो।
उस्ताद अली बक्श कैंची गोद में रखे बैठे थे। शबनम आपा के हाथ में लोहे की चिमटी थी और वो उसे ऐसे पकड़े थीं जैसे कोई हथियार पकड़ा हो। मीरा का कैमरा चल रहा था, छोटी लाल बत्ती अंधेरे में आँख जैसी लग रही थी। दुबे अंकल सीढ़ी की आख़िरी पायदान पर खड़े थे, छड़ी का सिरा फ़र्श पर, और उनका साँस लेना भी सुनाई दे रहा था।
पूरी गली बाहर थी। मुझे दरवाज़े के फटे हुए कोनों से रोशनी नहीं दिख रही थी, पर मुझे पता था — वही तीस-चालीस लोग, जो रात ग्यारह बजे अस्पताल के फाटक पर खड़े थे, अब मेरे घर के पिछले दरवाज़े के बाहर साँस रोके खड़े हैं।
और हैंडल घूम रहा था।
फिर रुका।
फिर घूमा।
जैसे कोई बाहर से पहले नाप रहा हो कि कुंडी किस तरफ़ खुलती है।
पापा टूटे रेडियो के पास बैठे थे। उनका चश्मा नाक पर तिरछा था, टेप टूट चुका था, और वो उसे ठीक करने की कोशिश भी नहीं कर रहे थे। उनका अंगूठा मेरी तरफ़ था — वो सफ़ेद गोल निशान, चिकना, बिना खाल का।
मैंने अपनी हथेली देखी।
मेरे अंगूठे के पास भी एक गोल जला निशान था, छोटा, ताज़ा, रेडियो का तार जोड़ते वक़्त बना हुआ।
बाप-बेटे के हाथ पर एक ही आकार का निशान। मुझे हँसी आई — बिना मज़ाक वाली हँसी, जो गले में ही अटक गई।
तभी बाहर से आवाज़ आई।
पर वो वही बूढ़ी आवाज़ नहीं थी।
ये कोई और था। डरा हुआ, हाँफता हुआ, टूटा हुआ।
"अंकुश भाई… अंकुश भाई, मैं हूँ। बबलू।"
कमरे में जो चुप्पी थी, वो पहले से भी भारी हो गई।
माँ ने तुरंत कहा, "मत खोल।"
"बबलू है," काजल ने धीरे से कहा।
"बबलू भी वही है जो कल तक तेरे भाई का गला पकड़ता था," माँ ने कहा, और उनकी आवाज़ में डर नहीं, गुस्सा था, "आज चेन नहीं पहनी, तो क्या हो गया? चेन उतारकर कोई इंसान नहीं बन जाता।"
और ठीक उसी वक़्त मुझे कुछ अजीब महसूस हुआ।
बाहर जो बूढ़ी आवाज़ बोल रही थी — "तीसरी दस्तक के बाद कोई नाम बोलेगा", "दो ने खोला, तेरी बारी है" — वो अचानक चुप हो गई थी।
पूरी तरह चुप।
जैसे किसी ने उसका मुँह दबा दिया हो।
या जैसे उसने कुछ देख लिया हो जिसकी उसे उम्मीद नहीं थी।
"उस्ताद," मैंने धीरे से कहा, "आपने सुना? बाहर वाली आवाज़ बंद हो गई।"
उस्ताद ने आँखें बंद करके सिर हिलाया।
"सुना," उन्होंने कहा, "और यही सबसे बड़ी बात है, बेटा। जो चीज़ गिनती कर रही थी, वो रुक गई।"
"मतलब?"
उस्ताद ने कैंची मेज़ पर रखी। बहुत धीरे से।
"मतलब ये कि जो अब तक गिन रहा था," उन्होंने कहा, "अब देख रहा है। और जो देखता है, वो कभी-कभी गिनती भूल जाता है।"
टिंकू ने धीरे से कहा, "उस्ताद, बबलू भैया का हाथ?"
मैंने देखा — टिंकू ने दरवाज़े के नीचे की दरार से बाहर झाँका था।
"क्या हुआ उसके हाथ को?"
"सफ़ेद रूमाल बँधा है," टिंकू ने कहा, "और रूमाल पर सूखा गुलाबी दाग है।"
मेरे पेट में कुछ ठंडा हुआ।
मुझे याद आया — रात वो मंच के पीछे बार-बार जेब टटोल रहा था। बच्चों ने बताया था। और उसका हाथ उस वक़्त से घायल था, और किसी ने नहीं पूछा था।
"बबलू," मैंने दरवाज़े से कहा, "तू अकेला है?"
"अकेला हूँ भाई। कसम से अकेला हूँ। कोई नहीं है। सिर्फ़ मैं हूँ और… और मेरे हाथ में एक चीज़ है।"
मेरी उँगलियाँ कुंडी पर चली गईं।
माँ ने कहा, "अंकुश।"
"माँ, वो अकेला है।"
"वो कल भी अकेला नहीं था, और फिर भी तेरे पास दो आदमी आए थे।"
"माँ," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ खुद मुझे सुनाई दी — थकी हुई, "मैंने कल रात कहा था कि मैं अकेले नहीं लड़ूँगा। पर इसका मतलब ये नहीं कि मैं हर आवाज़ को दुश्मन मान लूँगा। अगर मैं आज बबलू को दरवाज़े पर खड़ा मरने दूँ, तो मैं वही काम करूँगा जो वो करता था।"
काजल ने धीरे से कहा, "माँ, उसका हाथ…"
माँ ने उसकी तरफ़ देखा और कुछ नहीं बोलीं।
मैंने कुंडी पकड़ी। घंटी हथेली में और गरम हो गई, पर मैंने उसे कान के पास लाया और फुसफुसाया, "कुछ कहना है?"
घंटी ने कहा, "नाम मत बोल।"
"बस?"
"बस।"
और फिर वो चुप हो गई। इतनी चुप कि मुझे लगा कि वो भी सुन रही है।
मैंने कुंडी खींची।
दरवाज़ा आधी बित्ते भर खुला — बस इतना कि बाहर की ठंडी हवा अंदर आ जाए और मैं देख सकूँ कौन खड़ा है।
बबलू खड़ा था।
पर ये बबलू नहीं लग रहा था।
सोने की मोटी चेन नहीं थी, गले में कुछ भी नहीं था। पीली कमीज़ फीकी पड़ चुकी थी, कंधों पर सिलवटें, और उसका एक बटन गायब था। उसके होंठ सूखे थे और उसके माथे पर पसीना ठंडा होकर चमक रहा था। दाहिने हाथ पर सफ़ेद रूमाल बँधा था, और रूमाल पर वो सूखा गुलाबी दाग था जिसे देखकर काजल भी चुप हो गई।
और उसके बाएँ हाथ में कपड़े में लिपटी एक चीज़ थी।
छोटी। चौकोर। कैसेट जितनी बड़ी।
बबलू ने मुझे देखा और उसकी आँखें भर आईं।
"भाई," उसने कहा, और उसकी आवाज़ टूट रही थी, "मैं… मैं सच में यही देने आया हूँ।"
मैंने कुछ नहीं कहा।
"साहब ने मुझे कैसेट ढूँढने भेजा था," उसने कहा, "रात दो बजे। मैं आया। मैंने दरवाज़ा खोला। पर मैंने कुछ नहीं उठाया। कुछ नहीं।"
"फिर?"
"फिर मैंने साहब के दफ़्तर में जाकर उनके काग़ज़ देखे," उसने कहा, और जैसे उसने खुद अपने ऊपर थूक दिया हो, "जो आदमी इतने साल उनका कुत्ता बना रहा, वो एक रात में उनका दराज़ खोलकर देखने लगा।"
"क्यों?"
बबलू ने कपड़े में लिपटी चीज़ को आगे किया।
"क्योंकि वो मुझे भूत बनाकर छोड़ गया," उसने कहा, "मुझे बताया गया था कि डर सबसे बड़ी चीज़ है। और कल रात, जब मैं तेरी दुकान पर आया, तो मैंने अपना डर देखा। तेरे पीछे वो काली अंगूठी वाला आदमी खड़ा था और तू उससे बात कर रहा था, और मुझे पता था कि मैं उस आदमी की तरफ़ देख भी नहीं सकता।"
उसने काँपते हुए साँस ली।
"मुझे उस वक़्त समझ आया कि मैंने लोगों को किस चीज़ से डराया है। मैंने उन्हें अपने जैसा बनाया है।"
मीरा आगे आई। कैमरा अभी भी चल रहा था।
"बबलू," उसने कहा, "ये कैसेट कहाँ से आई?"
बबलू ने उसकी तरफ़ देखा, और मुझे लगा कि वो उससे डरता है — उस लाल बत्ती से, उस कैमरे से। पर वो पीछे नहीं हटा।
"साहब के दफ़्तर से," उसने कहा, "दराज़ के सबसे नीचे। एक आदमी की फोटो के नीचे। फोटो पर धूल जमी थी।"
उस्ताद उठे और आगे आए। उन्होंने वो कपड़ा छुआ, और फिर उन्होंने उसे नाक के पास लाकर सूँघा।
उनका चेहरा बदल गया।
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