The Mysterious Bell – Chapter 699
उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा। उनके चश्मे पर मोमबत्ती की रोशनी पड़ रही थी, और उस रोशनी में उनके चेहरे की हर झुर्री साफ़ दिख रही थी।
"शंकर," उन्होंने धीरे से कहा, "एक बात सुन लो।"
पापा ने सिर नहीं उठाया।
"काग़ज़ बोलता है तो इंसान चुप हो जाता है," उस्ताद ने कहा, "पर आवाज़ बोलती है तो इंसान को बोलना पड़ता है। आज तुम चुप नहीं रह सकते।"
पापा ने कैसेट को अपनी हथेली पर रखा और देर तक उसे देखा।
फिर उन्होंने पहली बार मेरी तरफ़ देखा।
"अंकुश," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ किसी और आदमी की थी, "बैठ जा।"
मैं बैठ गया।
"मीरा," पापा ने कहा, "कैमरा रख दो।"
मीरा ने कैमरा नीचे नहीं किया। उसने सिर्फ़ इतना कहा, "पापा जी, ये सच है। सच को छिपाने से वो मरता है, बड़ा होता है।"
"कैमरा रख दो," पापा ने दोहराया।
मीरा ने एक पल सोचा, फिर कैमरा मोड़कर अपने सीने से लगा लिया। लाल बत्ती बंद हो गई। पर उसका हाथ बैग पर टिका रहा — मुझे पता था, वहाँ उसका छोटा रिकॉर्डर है।
पापा ने कैसेट को टूटे रेडियो की तरफ़ बढ़ाया।
और मैंने देखा — रेडियो का तार जला हुआ था। पीछे का प्लग निकला पड़ा था, जैसे किसी ने उसे छीनकर फेंक दिया हो। उसके अंदर से वो जली हुई, कड़वी गंध आ रही थी जो आज पूरे दिन मेरी नाक में घुसी हुई थी।
"पापा," मैंने कहा, "ये चलेगा नहीं। इसका तार जला है।"
पापा ने मेरी तरफ़ देखा और पहली बार उनके चेहरे पर कुछ और था — वो शर्म नहीं थी, वो डर नहीं था।
वो ज़िद थी।
"आज सच बाहर आएगा," उन्होंने कहा।
और उन्होंने कैसेट उस टूटे रेडियो में डाल दी।
क्लिक हुई। एक धीमी, कड़वी, मुर्दा आवाज़ आई।
फिर कुछ नहीं।
कमरे में सिर्फ़ मोमबत्ती की फुसफुसाहट बची। बाहर गली में कहीं एक कुत्ता भौंका और चुप हो गया।
काजल ने धीरे से कहा, "देखा? मैंने कहा था।"
और ठीक उसी वक़्त, रेडियो के अंदर से, बिना प्लग, बिना तार, बिना बत्ती — एक आवाज़ आई।
सरसराहट। जैसे कोई पुराना काग़ज़ खुल रहा हो।
फिर साँस।
फिर एक आवाज़।
"मैंने अंगूठा लगाया था।"
मेरी साँस रुक गई।
वो पापा की आवाज़ थी।
पर पापा की आवाज़ पच्चीस साल पुरानी थी। जवान। कमज़ोर। काँपती हुई। जैसे किसी ने दबे हुए गले से, रोते हुए, खुद से कहा हो।
"मैंने अंगूठा लगाया था।"
मैंने पीछे देखा।
पापा दीवार से टिके बैठे थे। उनका चेहरा मोमबत्ती की रोशनी से कटा हुआ लग रहा था।
और माँ।
माँ ने अपना मुँह दोनों हाथों से ढक लिया।
ये वो हरकत नहीं थी जो कोई चौंककर करता है। ये वो हरकत थी जो कोई सालों से जानता है, और अब बस सहन नहीं कर पा रहा।
मेरी आँखें अपने आप उनकी तरफ़ उठ गईं।
और उसी पल मुझे कुछ समझ आया — जो मुझे पहले कभी नहीं समझ आया था।
माँ चौंकी नहीं।
माँ सिर्फ़ टूट गईं।
फ़र्क़ समझ रहे हो न? चौंकना ये होता है कि "ये क्या हुआ"। और टूटना ये होता है कि "ये तो होना ही था"।
माँ को पता था।
शायद शुरू से पता था।
रेडियो फिर बोला, और इस बार आवाज़ थोड़ी साफ़ थी, जैसे कैसेट को अपनी जगह मिल गई हो।
"सुशीला की दवा के लिए मजबूरी थी। अंगूठा मैंने लगाया। काग़ज़ मेज़ पर रखा था। मैंने ऊपर का नाम पढ़ा — शंकर यादव। मैंने अपना अंगूठा लगा दिया।"
कमरे में कोई हिला नहीं।
"नीचे एक लाइन थी। मैंने वो नहीं पढ़ी। वो आदमी बोला — नीचे वाली लाइन में तेरा बेटा लिखा है। मैंने कहा, मेरा बेटा अभी छोटा है। वो हँसा। उसने कहा — छोटा है, इसीलिए तो लिखा है।"
मेरी छाती में कुछ भारी हो गया।
"मैंने उससे पूछा — क्या लिखा है? उसने कहा — जो लिखा है, वो तेरे अंगूठे से सच हो गया। और फिर उसने काग़ज़ उठा लिया।"
रेडियो में सरसराहट आई। फिर आवाज़ और धीमी हुई, जैसे रिकॉर्ड करने वाले का हाथ काँप रहा हो।
"अगर ये आवाज़ कभी कोई सुने, तो सुनने वाले से एक बात कहना — मैंने अपने बेटे के नाम के नीचे अंगूठा नहीं लगाया। मैंने अपना लगाया। और मैं आज तक उस काग़ज़ को वापस नहीं ला पाया।"
क्लिक।
चुप्पी।
रेडियो बंद हो गया, और उसके अंदर से एक आख़िरी बार जली हुई गंध निकली, जैसे किसी ने आख़िरी साँस छोड़ी हो।
मैंने पापा की तरफ़ देखा।
उनके चश्मे का टेप टूट चुका था। चश्मा नाक पर तिरछा लटक रहा था। उन्होंने उसे ठीक नहीं किया।
"पापा," मैंने कहा।
"मुझे पता है," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ सूखी थी, "तू पूछेगा कि क्यों छिपाया।"
"मैं वो नहीं पूछ रहा।"
वो चौंके।
"मैं ये पूछ रहा हूँ," मैंने कहा, "कि वो आदमी कौन था।"
पापा ने मुँह खोला।
और ठीक उसी पल —
पूरी गली की बत्ती बुझ गई।
ऐसे नहीं कि हमारे घर की, ऐसे नहीं कि दुकान की। पूरी गली। बाज़ार। सामने का थाना। स्कूल की गली। उस्ताद की दुकान। शबनम आपा की गुमटी की लाल बत्ती भी।
एक साथ।
मैंने बाहर से होने वाले शोर को सुना — कुछ लोगों का "अरे!", एक बच्चे का रोना, किसी का दरवाज़ा खुलना, इनवर्टर के बीप की आवाज़ जो तुरंत सांस लेकर मर गई।
फिर सब शांत।
बिल्कुल शांत।
इतनी शांत कि मुझे अपने ही दिल की धड़कन गली में गूँजती सुनाई दी।
कमरे में सिर्फ़ मोमबत्ती की लौ काँप रही थी। उसकी रोशनी में माँ का चेहरा, पापा का चेहरा, काजल का चेहरा, मीरा का कैमरा, उस्ताद की कैंची, शबनम आपा की चिमटी, बबलू के पसीने से भीगे गाल — सब एक ही पीले रंग में डूबे थे।
और तभी।
तक।
दरवाज़े पर पहली दस्तक हुई।
एकदम साधारण। इतनी साधारण कि उससे ज़्यादा डरावनी कोई चीख़ नहीं हो सकती थी।
किसी ने हाथ उठाकर दरवाज़े पर उँगली से एक बार खटखटाया। धीरे। सलीके से। जैसे किसी को जल्दी न हो।
मेरी मुट्ठी फिर गरम हुई।
मैंने बिना आवाज़ करके घंटी जेब से निकालकर देखी। वो काँप रही थी, बज नहीं रही थी। जैसे वो भी साँस रोके बैठी हो।
बबलू ने धीरे से कहा, "म… मैंने सुना।"
"सबने सुना," शबनम आपा ने कहा।
टिंकू ने मेरी कमीज़ पकड़ ली। छोटा हाथ, मज़बूत पकड़। उसकी आँखों में डर नहीं, सवाल था।
"उस्ताद," उसने कान में फुसफुसाया, "जो जूते उतारकर चबूतरी पर बैठा था… वो अगर दरवाज़े पर आया, तो जूते पहने होंगे न?"
"क्यों?"
"क्योंकि चबूतरी पर जूते रखे हैं। अगर उसने उन्हें पहन लिया होता, तो दबे पैर पता नहीं चलता। पर उसने नहीं पहने। मतलब उसके पैर नंगे हैं।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"नंगे पैर आदमी दरवाज़ा खटखटाने आता है," टिंकू ने कहा, "लड़ने नहीं।"
मैंने उसका सिर पकड़ा, हल्का सा दबाया, और उसका हाथ छुड़ाया।
फिर मैं दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा।
"अंकुश," माँ ने कहा।
मैं रुक गया।
"आज तुम पीछे नहीं हटोगे," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में कुछ था जो पहले नहीं था, "पर दरवाज़ा खोलने से पहले मेरी एक बात सुन लो।"
"कहिए।"
"जो बाहर है," माँ ने कहा, "वो तुम्हारे पापा से कुछ माँगेगा। और तुम्हारे पापा दे देंगे। क्योंकि वो आज तक खुद को माफ़ नहीं कर पाए।"
पापा ने सिर उठाया।
"सुशीला —"
"आज तुम चुप रहो," माँ ने कहा, और उनकी आवाज़ में वो सख़्ती थी जिससे मैं डरता हूँ, "आज तुमने बहुत बोल लिया।"
मैं दरवाज़े के पास पहुँचा।
दरवाज़ा लकड़ी का था, पुराना, नीचे से थोड़ा सूजा हुआ। बरसात में वो फूल जाता था और धक्का देने पर कराहता था।
मैंने मुँह उससे सटाया।
"कौन है?"
कोई जवाब नहीं आया।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno