The Mysterious Bell – Chapter 694
पहले हल्की गरम — जैसे धूप में रखी हुई चीज़। फिर तेज़। फिर इतनी तेज़ कि मुझे उसे दूसरे हाथ में लेना पड़ा, जैसे किसी ने उसे मुठ्ठी में जला दिया हो।
"घंटी," मैंने कहा। "क्या हुआ?"
"आज रात," घंटी ने कहा।
"आज रात क्या?"
"आवाज़ बोलेगी।"
"फिर?"
"बत्ती जाएगी।"
"फिर?"
"और दरवाज़ा खटकेगा।"
पूरी गली सुन रही थी। मैंने देखा कि उस्ताद ने अपनी कैंची फिर उठाई और इस बार जाने नहीं दिया, उसे हथेली में कस लिया। माँ ने काजल का हाथ पकड़ लिया — इतना कसकर कि काजल की उँगलियाँ सफ़ेद हो गईं। पापा ने कुछ कहना चाहा, पर चुप रहे — जैसे उनके अंदर भी कोई चीज़ लड़ रही हो। और मीरा ने बस अपना मोबाइल उठाया और रिकॉर्डिंग चालू कर दी।
"कौन खटखटाएगा?" टिंकू ने पूछा।
उसकी आवाज़ पतली थी। पतली और साफ़ — जैसे पाँच साल पहले वाला टिंकू, अपनी माँ की गोद में बैठा हुआ, पूछ रहा हो कि आसमान में बादल क्यों होते हैं। मैंने उसे देखा। उसने मेरी तरफ़ नहीं देखा — वो बबलू को देख रहा था। जैसे सब जवाब उसके पास हों।
बबलू ने टिंकू का कंधा पकड़ा। उसके हाथ की उँगलियाँ गरम थीं — मैंने देखा, वो टिंकू के कंधे पर उँगलियाँ रखे हुए हल्का-हल्का काँप रही थीं।
"टिंकू," उसने धीरे से कहा। "मैं बताता हूँ।"
वो रुका।
जैसे कोई गले में फँसी चीज़ को निगलने की कोशिश कर रहा हो। उसने एक बार मेरी तरफ़ देखा। फिर पापा की तरफ़। फिर उसने आँखें नीची कर लीं।
"वो दस्तक," उसने कहा, "इंसान की नहीं होगी।"
गली में हवा भी रुक गई।
उसने एक गहरी साँस ली। उसकी उँगलियाँ टिंकू के कंधे पर और कस गईं। उसने बहुत धीमी आवाज़ में, जैसे कोई अपना ही दुख किसी और को सौंप रहा हो, वो आख़िरी बात कही —
"वो दस्तक उस कैसेट की होगी जिसे तेरे पापा छुपा रहे हैं।"
मैंने पलटकर पापा को देखा।
पापा के हाथ से चाय का प्याला छूटा। वो ज़मीन पर गिरा। चटका नहीं — सिर्फ़ लुढ़का। चाय ज़मीन पर फैल गई और धूल में छोटे-छोटे गड्ढे बनाने लगी।
पापा नहीं हिले।
उनकी आँखों में वो चीज़ थी जो मैं उनके जीवन में पहली बार देख रहा था।
डर नहीं। शर्म नहीं। पछतावा नहीं।
सन्नाटा।
और उस सन्नाटे में, मेरे हाथ की घंटी, जो अब भी गरम थी, बहुत धीरे से कुछ फुसफुसाई। मैंने कान लगाया।
"अंकुश," घंटी ने कहा।
"हाँ?"
"तेरे पापा वो कैसेट आज रात नहीं छुपा पाएँगे।"
॥
"तेरे पापा वो कैसेट आज रात नहीं छुपा पाएँगे।"
घंटी ने इतना कहा और चुप हो गई।
मैंने उसे हथेली में घुमाया। गरमी अब भी अंदर बैठी थी, जैसे दूर कहीं कोई अंगीठी जलाकर चला गया हो और धुआँ भूल गया हो।
पापा नहीं हिले।
चाय का प्याला उनके पैर के पास लुढ़क कर रुक गया था। चाय धूल में उतर रही थी और धूल उसे ऐसे पी रही थी जैसे बरसों की प्यासी हो। एक बूँद उनकी धोती पर भी गिरी, पर उन्होंने उसे पोंछा नहीं। उन्होंने कुछ नहीं किया। बस खड़े रहे।
गली में कोई नहीं बोला।
उस्ताद अली बक्श ने अपनी कैंची जेब में डाली, फिर निकाली, फिर जेब में रख दी — जैसे हाथ को कोई काम चाहिए था। शबनम आपा ने केतली उठाई और पास ही रख दी, तो उनका हाथ उस पर टिका रह गया। भोला भाई ने अपना रेडियो बंद कर दिया, जो अब तक धीरे से बज रहा था। दुबे अंकल अपनी कुर्सी पर बैठे थे और उनकी नीली शर्ट की आस्तीन हवा में भी नहीं हिल रही थी।
बबलू चबूतरी के किनारे बैठा था। उसकी फीकी पीली कमीज़ में पसीने के गोल धब्बे दिख रहे थे और वो हाथ पर हाथ रखकर ऐसे बैठा था जैसे स्कूल का बच्चा हो जो पूरी क्लास के सामने खड़ा हो और अपना नाम भूल गया हो।
"पापा," मैंने कहा।
वो नहीं बोले।
"पापा, कैसेट कहाँ है?"
उन्होंने उठकर प्याला उठाया। उसे मेज़ पर रखा — उलटा, जैसे कोई बर्तन धोकर रखता है। फिर अपनी कमीज़ की जेब में हाथ डाला, कुछ ढूँढा, और हाथ खाली निकाल लिया।
"मैं छुपा नहीं रहा," उन्होंने कहा। आवाज़ बहुत धीमी थी, इतनी धीमी कि मुझे उनके होंठ देखकर अंदाज़ा लगाना पड़ा। "मैं बस… सोच रहा था।"
"क्या सोच रहे थे?"
"कि उसे सुनने से पहले मुझे अपना नाम याद रखना चाहिए।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "क्योंकि उसके बाद शायद मैं वही न रहूँ जो अभी हूँ।"
मेरे पेट में कुछ ठंडा हिला।
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। मीरा ने कुछ नहीं कहा। उसने बस अपना कैमरा बैग से निकाला और सीने से लगाकर पकड़ लिया, जैसे कोई बच्चा अपनी कॉपी पकड़ता है।
तब माँ ने व्हीलचेयर के हैंडल पर हाथ रखकर कहा, "दुकान चलो।"
सबने उनकी तरफ़ देखा।
"यह बात गली के बीच में नहीं होगी," माँ ने कहा। "ना पीपल के नीचे, ना अस्पताल के आँगन में। जो काग़ज़ पंद्रह साल से चुप है, वो अब दुकान के पीछे वाले कमरे में बोलेगा। और वहाँ सिर्फ़ वही लोग होंगे जिनके नाम उसमें लिखे हैं।"
"माँ —" मैंने कहना चाहा।
"अंकुश।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें थकी थीं, पर उनमें वो ज़िद थी जो सुबह पाँच बजे चूल्हा जलाते वक़्त उनके चेहरे पर होती है। "मैंने पंद्रह साल तुम्हारे पापा की चुप्पी को माला की तरह पहना है। अब उतारूँगी तो उसी कमरे में उतारूँगी, जहाँ पहली बार पहनी थी।"
पापा ने उनकी तरफ़ देखा।
दोनों ने एक-दूसरे को देखा और उस देखने में जो बात थी, वो मैं नहीं जानता। मैं सिर्फ़ इतना जानता हूँ कि उस पल गली में जितने भी लोग खड़े थे, सबने अपनी नज़रें ज़मीन पर कर लीं। कुछ बातें ऐसी होती हैं जो दो लोगों की होती हैं, और तीसरा देख ले तो वो चोरी जैसा लगता है।
फिर पापा ने कहा, "चलो।"
बस इतना।
वो मुड़े और चल पड़े। किसी ने उन्हें रोका नहीं।
उस्ताद ने मेरा कंधा पकड़ा और धीरे से कहा, "दुकान के पीछे वाले ट्रंक में मोमबत्तियों का पुराना डिब्बा रखा है। दादा के ज़माने का। उन्हें बत्ती जाने पर जलाया जाता था, ताकि कमरे में साँस लेने की जगह बची रहे।"
"आपको कैसे पता?"
वो मुस्कुराए — बहुत हल्का, जैसे पुराना ज़ख्म हँसा हो। "क्योंकि पचास साल पहले मैंने भी एक कमरे में मोमबत्तियाँ जलाई थीं। और उस रात मेरा भाई बाहर खड़ा था।"
वो चले गए।
मैंने टिंकू को इशारा किया। वो दौड़ा आया, चप्पल की आवाज़ गली में गूँज रही थी।
"उस्ताद," उसने कहा, "क्या हुआ? सब ऐसे चले जा रहे हैं जैसे कोई मर गया हो।"
"कोई नहीं मरा, टिंकू," मैंने कहा। "बस कुछ ज़िंदा हो रहा है।"
"वो तो और डरावना है।"
"हाँ," मैंने कहा। "तू ठीक कह रहा है।"
दुकान पहुँचकर उस्ताद ने ट्रंक खोला। अंदर औज़ार, कपड़े, पुराने पेंच और रस्सी के लच्छे पड़े थे। सबसे नीचे एक टिन का डिब्बा निकला, जिसका ढक्कन ज़ंग से पकड़ा हुआ था। उस्ताद ने कैंची से ढक्कन खोला। अंदर मोमबत्तियाँ थीं — सस्ती, सफ़ेद, थोड़ी टेढ़ी, कुछ का रंग पीला पड़ गया था।
"ये चलेंगी?" काजल ने पूछा।
"मोमबत्ती को चलना नहीं पड़ता, बेटा," उस्ताद ने कहा। "उसे बस जलना पड़ता है।"
हमने उन्हें जलाया।
काजल ने एक-एक करके मोमबत्तियाँ जलाईं और कमरे में जगह-जगह रख दीं। चारपाई के पास, अलमारी के सिरे पर, औज़ारों के ट्रंक पर, दरवाज़े की चौखट के दोनों तरफ़, और एक टूटी कुर्सी की सीट पर जिसकी टाँग काग़ज़ से बँधी थी।
मैंने ध्यान नहीं दिया कि कितनी जलीं। मैंने सिर्फ़ यह देखा कि कमरा भरता जा रहा है।
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