The Mysterious Bell – Chapter 695
पहले कमरे में अंधेरा था, सिर्फ़ एक गुनगुनाता बल्ब और उसकी पीली रोशनी। फिर मोमबत्तियाँ जलीं और अंधेरा पीछे हटने लगा — जैसे कोई पुराना मेहमान दीवार से सटकर खड़ा हो गया हो।
और कमरे की दीवारों पर परछाइयाँ बनने लगीं।
वो परछाइयाँ हिल रही थीं, हालाँकि कोई नहीं हिल रहा था।
टिंकू ने मेरी कमीज़ पकड़ ली। "उस्ताद," उसने धीरे से कहा, "मुझे मोमबत्ती से डर नहीं लगता। मुझे उन चीज़ों से लगता है जो मोमबत्ती के पीछे खड़ी होती हैं।"
"तेरी उम्र में मुझे भी लगता था," मैंने कहा। "अब भी लगता है। फ़र्क़ बस इतना है कि अब मैं डर के साथ चाय भी पी लेता हूँ।"
"चाय कहाँ है?"
"नहीं है। इसीलिए तो डर ज़्यादा है।"
शबनम आपा बाहर बेंच पर बैठीं। उन्होंने गुमटी का चूल्हा आज नहीं जलाया था, पर अपनी बड़ी केतली और कपों की ट्रे ले आईं थीं — जैसे उन्हें भरोसा था कि आज रात किसी को चाय की ज़रूरत पड़ेगी और वो बिना चाय नहीं लौटेंगी। उन्होंने ट्रे बेंच पर रखी और अपने आप से कहा, "कुछ सच ऐसे होते हैं जिन्हें सुनने से पहले पेट में कुछ गरम चाहिए होता है।"
पापा कमरे के बीच में खड़े थे। उनके एक हाथ में वो पुरानी कैसेट थी — नीली स्याही में लिखी सफ़ेद पट्टी, काँपती लिखाई, पुराना प्लास्टिक — और दूसरे हाथ में वो टूटा रेडियो, जिसका एक कोना जला हुआ था और जिसका तार मैंने आज शाम जोड़ने की कोशिश में अपनी उँगली जला ली थी।
"अंकुश," पापा ने कहा।
"हाँ।"
"तू बाहर रहेगा।"
"पापा —"
"मैंने कहा, बाहर।" उनकी आवाज़ में वो कड़क नहीं थी जो गुस्से में होती है। उसमें वो चीज़ थी जो पुल पर खड़े आदमी की आवाज़ में होती है जब वो नीचे पानी देख रहा हो। "अगर यह कैसेट मेरी है, तो मैं इसे अकेले सुनूँगा। और अगर यह मेरी नहीं है…" वो रुके। "तो भी मैं इसे अकेले सुनूँगा।"
माँ ने व्हीलचेयर घुमाई। "शंकर।"
वो रुके।
"दरवाज़ा बंद करोगे तो अंदर से आवाज़ सुनाओ," माँ ने कहा। उनकी आवाज़ सपाट थी, जैसे कोई हिसाब की कॉपी में लिख रहा हो। "एक बार नहीं। हर बार जब कुछ बदले, मुझे सुनाओ। मैं बाहर बैठी रहूँगी और गिनती रखूँगी।"
पापा ने उनकी तरफ़ देखा। बहुत देर तक देखा। फिर उन्होंने सिर हिलाया — बस एक बार।
वो अंदर गए।
दरवाज़ा बंद हुआ।
और फिर वो आवाज़ आई जिससे मेरी रीढ़ सीधी हो गई — कुंडे की आवाज़। पहले धातु का हल्का खटका, फिर कुंडी चढ़ने की छोटी-सी चरचराहट। पापा ने दरवाज़ा अंदर से बंद कर लिया था।
कमरे की रोशनी दरवाज़े के नीचे की दरार से आ रही थी — पीली, काँपती, कभी तेज़, कभी धीमी, जैसे मोमबत्तियाँ आपस में बात कर रही हों।
मैं बाहर बेंच पर बैठ गया।
मीरा मेरे बगल में बैठी। उसने अपना कैमरा खोला, उसे छोटे तिपाई पर रखा और घुमाकर दरवाज़े की तरफ़ किया। लाल बत्ती जल गई।
"तूने बंद नहीं किया?" मैंने पूछा।
"क्यों बंद करूँ?"
"क्योंकि यह अब हमारी निजी बात है।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा और उसके चश्मे पर मोमबत्ती की रोशनी पड़ी, जिससे उसकी आँखें दो छोटे पीले गोले लगीं। "अंकुश," उसने कहा, "जिस दिन यह बात निजी रही, उसी दिन यह घर टूटा। पाँच साल पहले एक औरत का घर ऐसे ही टूटा था — क्योंकि सच सिर्फ़ दो लोगों के बीच रहा और बाक़ी सब अंदाज़े लगाते रहे। अब मैं कैमरा नहीं बंद करूँगी।"
मैंने कुछ नहीं कहा। क्योंकि वो सही थी, और सही बात का जवाब मज़ाक से भी नहीं दिया जाता।
माँ व्हीलचेयर में हमारे सामने थीं। काजल उनके पीछे खड़ी थी, हाथ उनके कंधे पर। काजल के हाथ उलटे थे — मैंने देखा कि उसने अपनी मुट्ठियाँ कस रखी थीं और वो उन्हें खोलने की कोशिश कर रही थी और खुल नहीं रही थीं।
तभी मीरा ने स्क्रीन पर नज़र डाली और उसका शरीर अकड़ गया।
"अंकुश।"
"हाँ?"
"खिड़की के बाहर कौन है?"
मैंने स्क्रीन की तरफ़ देखा।
कैमरे में दरवाज़ा दिख रहा था, दरवाज़े के नीचे से आती पीली रोशनी, और बाईं तरफ़ कमरे की छोटी खिड़की — जो पीछे की गली में खुलती थी, जहाँ आज सुबह लकड़ी के जूतों के निशान मिले थे।
खिड़की के बाहर एक साया खड़ा था।
इंसान की शक्ल का, पर चेहरा नहीं था। कैमरे की स्क्रीन पर वो ऐसा दिख रहा था जैसे किसी ने काग़ज़ पर कालिख लगाकर इंसान बनाया हो और बीच में उँगली रगड़कर चेहरा मिटा दिया हो। उसका एक हाथ सामने था — नीचे लटका, ढीला, जैसे किसी ने उसे टांग रखा हो।
और दूसरा हाथ…
दूसरा हाथ उसने पीछे छुपा रखा था।
मैं उठा।
"कोई नहीं है," उस्ताद ने कहा, पर उनकी आवाज़ में यक़ीन नहीं था। "खिड़की पर अंधेरा है, उसमें शक्लें बनती हैं।"
"उस्ताद," मीरा ने कहा, "यह कैमरा है, आँख नहीं। आँख को भ्रम हो सकता है। कैमरे को नहीं।"
मैं दौड़कर दुकान के बाहर गया, कोने से मुड़ा और पीछे की गली में आ गया।
कुछ नहीं था।
पीछे की गली खाली थी। दूर एक ट्रक का पीछा दिख रहा था, जो बंद प्लॉट में खड़ा था। एक कुत्ता नाली के किनारे से गुज़रा और चुपचाप चला गया।
पर खिड़की के नीचे की दीवार…
मैंने उसे छुआ। गरम थी। उस दीवार पर कोई नहीं था और वो गरम थी, जैसे कुछ देर पहले कोई उसे सहारा लेकर खड़ा रहा हो। नीचे ज़मीन पर घुटने के बराबर की जगह पर धूल हिली हुई थी और उस हिली धूल में एक बहुत हल्का निशान बना था — जैसे किसी ने पैर का अगला हिस्सा रखा हो और फिर उठा लिया हो।
मैं वापस आया।
माँ ने मेरी तरफ़ देखा और कुछ नहीं पूछा। उन्होंने बस अपना हाथ बढ़ाया।
मैंने अपना हाथ उनके हाथ में रख दिया।
उनकी पकड़ कसकर हो गई। उनकी हथेली खुरदुरी थी — रसोई की, हिसाब की कॉपी की, चूल्हे की राख की। उसमें वो ताक़त थी जो बरसों हर सुबह पाँच बजे जागती है।
"अंकुश," माँ ने कहा।
"हाँ, माँ।"
"जिस वक़्त यह दरवाज़ा खुलेगा," उन्होंने धीरे से कहा, "तू मुझे बुलाना नहीं।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"मुझे साथ ले जाना।"
"माँ, आप —"
"मैं जानती हूँ कि मेरे पैर नहीं हैं," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में वो सूखापन था जो रोने से पहले आता है। "पर मेरे पैर तो पंद्रह साल पहले भी ऐसे ही थे जब मैंने उन काग़ज़ों पर अंगूठा लगवाया था। उस वक़्त तूने मुझे नहीं बचाया था, अंकुश। उस वक़्त तू छोटा था। अब तू बड़ा है — पर मैं यह नहीं चाहती कि तू मुझे छोड़कर अंदर जाए और मैं बाहर बैठी रहूँ, इंतज़ार करती हुई, जैसे उस रात की औरत बाहर बैठी रही थी।"
काजल ने अपना हाथ उनके कंधे से हटा लिया। वो थोड़ा पीछे हटी और उसकी आवाज़ काँप रही थी। "माँ, मैं आपको ले जाऊँगी। मैं साथ रहूँगी।"
"हाँ," माँ ने कहा। "तू और मैं, दोनों।"
मैंने कुछ कहना चाहा। कुछ मज़ाक — कुछ ऐसा जो हवा को हल्का कर दे। पर शब्द गले में ऐसे अटके जैसे नाली में काग़ज़ अटकता है।
इसलिए मैंने बस कहा, "ठीक है।"
और तभी…
दरवाज़े के अंदर से आवाज़ आई।
धीमी। दबी हुई। ऐसे जैसे कोई बहुत दूर से बोल रहा हो, पानी के नीचे से।
मैंने अपना कान दरवाज़े से सटा दिया।
लकड़ी ठंडी थी — ठंडी, जबकि दरवाज़े के नीचे से आती रोशनी गरम थी। यह अजीब बात थी और मेरा दिमाग़ उसी को पकड़कर बैठ गया, क्योंकि डर के वक़्त दिमाग़ सबसे छोटी चीज़ से चिपक जाता है।
पापा बोल रहे थे।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno