The Mysterious Bell693 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 693

7 min read November 5, 2026

दिन किसी तरह गुज़रा। उस्ताद ने रजिस्टर की कॉपी फिर निकाली और उसके पन्ने पलटते रहे। मीरा ने आधी जली रसीद फिर जाँची और इस बार उसने हर शब्द को एक कोरे काग़ज़ पर उतारा। माँ ने व्हीलचेयर पर बैठे-बैठे कुछ और चीज़ें खोजीं — पुरानी तस्वीरें, दादा का कोई काग़ज़, बच्चों की कोई कॉपी, कुछ भी। पर उन्हें कुछ नहीं मिला। काजल ने दो बार पूछा कि क्या पापा ठीक हैं, और दोनों बार पापा ने सिर हिलाकर हाँ कहा, और दोनों बार पापा की आँखें झूठ बोल रही थीं।

दोपहर में भवानी प्रसाद रजिस्ट्री की बात लेकर आए और चले गए। शाम को रज़ा सलीम के आने की बात फिर याद आई। बबलू की काली गाड़ी गली के मुँह पर खड़ी रही और उसमें से कोई उतरा नहीं। उसका चालक भी बाहर नहीं आया।

और शाम पाँच बजे…

शाम पाँच बजे पता चला कि रेडियो का वो वादा अब भी ज़िंदा है।

वो गली में आया तो पहले किसी ने नहीं पहचाना।

सफ़ेद कुर्ता वो पहनता था, पर आज वो उतारकर साधारण पीली कमीज़ पहने हुए था — वो भी बिना इस्त्री की, कॉलर मुड़ा हुआ, आधी बाँह पर पसीने का धब्बा। गर्दन खाली थी। न सोने की मोटी चेन, न सोने का चौकोर लॉकेट जो हिलने पर टिक-टिक करता था। हाथ खाली थे। न पानदान, न पान, न वो चमकता हुआ सोने का डिब्बा। उसके जूते भी धूल भरे थे — वो जूते जो हमेशा इतने साफ़ रहते थे कि लगता था गली की धूल भी उनसे अलग है।

उसके कदम धीमे थे। जैसे किसी ने उसके जूतों के तले रेत डाल दी हो।

वो दुकान के सामने आकर रुका।

चिंटू ने पहले देखा। वो चबूतरी से उछलकर खड़ा हो गया और भरी आवाज़ में चिल्लाया, "अरे! ये तो अपना बबलू भाई है। बिना सोने के।"

सानिया हँसी — वो मज़ाक वाली हँसी, जिसमें ज़रा भी दया नहीं थी। "चेन कहाँ गई भाई? बैंक में जमा करा दी क्या?"

"पान भी नहीं है," रफ़ीक़ ने कहा, टूटे चश्मे के ऊपर से देखकर। "भाई, आज तुम खाली हाथ क्यों आए?"

"अरे चुप करो," गुड्डू ने कहा। "देख नहीं रहे? भाई जी का कल रात कोई सपना ख़राब हुआ है। सपना ख़राब हो तो चेन उतर जाती है।"

बबलू ने कोई जवाब नहीं दिया। उसने बस अपनी कमीज़ के पल्ले को सीधा किया और चुपचाप आकर दुकान की बेंच पर बैठ गया। ऐसा बैठा जैसे कोई स्कूल का बच्चा मार खाकर मास्टर के सामने बैठता है — हाथ घुटनों पर, नज़र ज़मीन पर, पीठ सीधी पर झुकी हुई।

मुझे उससे हमेशा चिढ़ थी। गली में वो उस तरह का आदमी था जो अपनी आवाज़ के बल पर ज़िंदा रहता है — धमकी, पान, सोने की चेन, मोटा शरीर। और आज… आज वो सिर्फ़ एक आदमी लग रहा था। पीला, थका, कमज़ोर।

"बबलू भाई," मैंने कहा। "चाय पियोगे?"

"नहीं।"

"कुछ खाओगे?"

"नहीं।"

"तो फिर बैठ क्यों गए?"

वो चुप रहा।

शबनम आपा अपनी गुमटी से निकलकर आईं। उनके हाथ में एक गरम समोसा था, काग़ज़ की पुड़िया में लिपटा हुआ, जिसमें से भाप निकल रही थी। उन्होंने बिना कुछ पूछे उसे बबलू की तरफ़ बढ़ाया।

"ले," उन्होंने कहा। "खा। भूखा आदमी सही बात नहीं सोचता। और जो सही बात नहीं सोचता, वो जल्दी मरता है।"

बबलू ने समोसा नहीं लिया।

शबनम आपा ने ज़ोर से उसकी हथेली पकड़ी — कसकर — और समोसा उस पर रख दिया। "जब दुनिया डरा रही हो," उन्होंने कहा, "तब इंसान को कुछ गरम खाना चाहिए। भूख और डर, दोनों पेट से जुड़े होते हैं। मैं औरत हूँ, मेरे यहाँ सब आते हैं, मुझे ये बात पता है।"

बबलू ने एक तरफ़ देखा। फिर बहुत धीरे कहा, "आपा, मैं आज यहाँ चाय पीने नहीं आया।"

"तो किस लिए आया?"

"उस्ताद से बात करनी है।"

"कर।" मैंने कहा। "पर पहले समोसा खा। मेरी दुकान में भूखे आदमी से बात नहीं होती। और तेरे हाथ काँप रहे हैं — तेरे हाथ में समोसा है, अगर काँपता रहा तो गिर जाएगा, और शबनम आपा का एक भी समोसा बर्बाद होना मुझे गवारा नहीं।"

उसने मेरी तरफ़ देखा। कुछ देर देखता रहा, जैसे पहली बार मुझे देख रहा हो। फिर उसने गरम समोसे की तरफ़ देखा। फिर उसने एक बड़ा सा कौर लिया। गरमी से उसका मुँह जल गया, वो फूँकने लगा, आँख से पानी आ गया।

"धीरे," शबनम आपा ने कहा। "कोई तुझे नहीं छीन रहा।"

तीन कौर में समोसा खत्म हो गया। उसने उँगलियों पर लगी चटनी को भी साफ़ किया, जैसे कोई आख़िरी चीज़ खा रहा हो।

फिर उसने हाथ जोड़ लिए।

"अंकुश," उसने कहा। "मैं तुझे डराने नहीं आया।"

"अच्छा।"

"मुझे भेजा गया था।"

"किसने?"

वो चुप रहा।

"बबलू भाई, कुछ तो बोलो। घर है, कोई कोर्ट नहीं। यहाँ किसी की वकालत नहीं चल रही।"

"साहब ने भेजा था," उसने कहा। "कैसेट खोजने।"

"कौन सी कैसेट?"

"तेरे पापा वाली। जो तेरी दुकान में है। साहब को पता है। उसने मुझे कहा — जाकर ले आ, जो भी हो, ले आ।"

मीरा ने मेरी तरफ़ देखा।

"तू आया था?" मैंने पूछा। "दुकान में?"

"हाँ। रात दो बजे। दरवाज़ा खुला था। मैं अंदर गया।"

"कुछ लिया?"

"कुछ नहीं।" उसने नीचे देखा। "और अब पछता रहा हूँ कि क्यों गया था।"

"क्यों?"

"क्योंकि मैं अंदर था," उसने कहा, "और बाहर कोई और आया। मैंने उसे खिड़की से आते देखा — सफ़ेद कुर्ता, सफ़ेद जूते। मैं उसकी बात सुन रहा था। वो हँसा, अपनी जेब से कुछ निकाला, कुछ कहा, और चला गया।"

"क्या कहा?"

"मैं सुन नहीं पाया," बबलू ने कहा। "पर मैंने देखा। और जब वो चला गया, तो मेरी हिम्मत टूट गई।"

चिंटू हँसा। "ये सुनो! ये सुनो! जो सारी गली को डराता था, वो आज खुद काँप रहा है!"

"देख भाई," सानिया ने कहा, अपनी कॉपी पर कुछ लिखते हुए, जैसे जासूस अपनी रिपोर्ट बना रही हो। "हम अब आपको डराएँगे नहीं। क्योंकि अब आप खुद डरे हुए हो। और डरे हुए आदमी को डराना गंदी बात है। ये हमारी गली का नियम है।"

"शाबाश," शबनम आपा ने कहा। "मेरी ही बोली है तू बोल रही है।"

"और सुनो बबलू भाई," चिंटू ने कहा, अब ज़रा गंभीर होकर। "अब आप हमारे साथ आ जाओ। अकेले मत रहो। अकेले डर और बढ़ता है। मैंने अपनी किताब में पढ़ा है।"

मैंने चिंटू को देखा। कभी-कभी ये बच्चा मुझे बूढ़ा कर देता था।

बबलू ने एक बार सबकी तरफ़ देखा। फिर उसने धीमी आवाज़ में वो कहा जो वो कहने आया था।

"बात वो नहीं है जो तुम सोच रहे हो," उसने कहा। "मैं साहब से नहीं डरा। साहब तो वो है जिसे मैं सालों से जानता हूँ। वो सिर्फ़ काग़ज़ और पैसा है। पर उसने मुझे कभी नहीं डराया। मैं उससे डरा जो साहब के पीछे खड़ा था।"

गली में एक ठहराव आया।

उस्ताद ने सिलाई मशीन के पास रखी कैंची उठाई, फिर रख दी। उन्होंने कुछ नहीं कहा, पर उनकी आँखें उसकी तरफ़ घूम गईं।

"कौन?" मैंने पूछा। "सफ़ेद कुर्ते वाला?"

"उसके पीछे एक और था," बबलू ने कहा। "उसका चेहरा नहीं दिखा। सिर्फ़ उँगली दिखी।"

"उँगली?"

"हाँ। उँगली में एक काली अंगूठी थी। और वो अंगूठी ऐसे चमक रही थी जैसे अंधेरे में कोई जली हुई लालटेन लेकर खड़ा हो।"

मेरा खून जम गया।

मैंने पलटकर पापा की तरफ़ देखा — वो मेरे पीछे खड़े थे, हाथ में आधी पी हुई चाय, पर प्याला अब भी वैसा ही भरा हुआ था। उन्होंने एक बूँद भी नहीं पी थी। उनका चेहरा सफ़ेद हो गया था — ऐसा सफ़ेद जैसा काग़ज़। और उनकी आँखों में वो बात थी जो मुझे कल रात भी दिखी थी। जानना।

"काली अंगूठी?" मैंने बबलू से दोबारा पूछा।

"हाँ।"

"पक्का?"

"अंकुश," बबलू ने कहा। "मैं ज़िंदगी में पहली बार सच बोल रहा हूँ। झूठ बोलने की हिम्मत भी नहीं बची है।"

मैंने घंटी हथेली में दबाया। वो ठंडी थी। बर्फ जैसी।

पर तभी…

घंटी गरम होने लगी।

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