The Mysterious Bell – Chapter 687
"जो मैंने पापा से कहा।"
घंटी कुछ देर चुप रही। फिर बोली —
"तूने सच कहा।"
"पर मैंने उन्हें तोड़ दिया।"
"नहीं," घंटी ने कहा। "तूने वो किया जो तेरे पास था। तोड़ना और खोलना एक जैसा दिखता है। फ़र्क़ बाद में पता चलता है।"
मीरा मेरे पास बैठ गई। उसने अपना कैमरा दीवार के सहारे रख दिया। पहली बार। जैसे वो भी थक गई हो।
"अंकुश," उसने कहा।
"हम्म।"
"जब मैंने अपने घर वालों से वो बात कही थी — जो मैंने छिपाई थी — तो मेरी माँ तीन दिन मुझसे नहीं बोली।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"फिर?"
"फिर चौथे दिन उसने मुझे चाय दी," मीरा ने कहा। "और कहा — अब खा ले। और कुछ नहीं कहा। पर वो चाय… वो चाय किसी माफ़ी से कम नहीं थी।"
मैंने सिर दीवार पर टिका दिया।
"तेरी माँ ने तुझे चाय दी," मैंने कहा। "मेरे पापा ने घर छोड़ दिया।"
"वो घर नहीं छोड़ा," मीरा ने कहा।
"तो?"
"वो उस दरवाज़े से बाहर गया है," उसने कहा, "जिसे पच्चीस साल से अंदर से बंद किया गया था। अंकुश, आदमी जब घर छोड़ता है, तो वो सामान लेकर जाता है। इनके हाथ में कुछ नहीं था। ये कुछ ढूँढने गए हैं।"
मैंने मीरा को देखा।
"तू अजीब तरह से सोचती है," मैंने कहा।
"तभी इन कामों में आई हूँ," उसने कहा।
और मुश्किल से, बहुत मुश्किल से, मेरे मुँह से एक हँसी निकली। छोटी सी। टूटी हुई। पर निकली।
माँ व्हीलचेयर पर दरवाज़े तक आईं।
"अंकुश," उन्होंने कहा।
"माँ।"
"मेरे पास सात सौ इकहत्तर रुपये हैं," उन्होंने कहा। "हिसाब की कॉपी में दबे हुए। मैंने उन्हें… उन्हीं के लिए बचाया था।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"किसके लिए?"
"तुम्हारे पापा के लिए," उन्होंने कहा। "वकील के लिए। अंगूठा मिटाने के लिए।"
मैंने अपना सिर नीचे किया।
"माँ, अंगूठा मिटता नहीं।"
"पता है," उन्होंने कहा। "पर उम्मीद मिटती भी नहीं।"
वो अपनी गोद में रखी कॉपी की तरफ़ देखने लगीं। फिर उन्होंने कहा —
"शंकर आज रात लौट आएगा।"
"तुम्हें कैसे पता?"
"क्योंकि वो गुस्से में नहीं गया," उन्होंने कहा। "वो शर्मिंदा होकर गया है। और शर्मिंदा आदमी देर तक बाहर नहीं रहता।"
फिर उन्होंने मेरी जली हथेली की तरफ़ देखा और उनका चेहरा बदल गया।
"ये क्या है?"
"रेडियो," मैंने कहा। "तार जोड़ रहा था।"
"तूने तार जोड़ा," उन्होंने कहा, "और हाथ जला लिया।"
"हाँ।"
"और आवाज़ आई?"
"नहीं।"
माँ ने दीये की तरफ़ देखा।
"तो तार ठीक नहीं है," उन्होंने कहा।
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"क्या?"
"तार ठीक होता तो आवाज़ आती," उन्होंने कहा। "तू आदमी जोड़ता है, और मशीन जोड़ने की जल्दी में है। मेरे यहाँ दाल में पानी नहीं मिलता, अंकुश। और बात में भी नहीं। जब आदमी आपस में नहीं जुड़े, तो तार क्या जुड़ेगा?"
मैंने घंटी को जेब से निकाला।
"घंटी," मैंने कहा, "यही तो तूने भी कहा था।"
"हाँ," उसने कहा।
"तो बता, कौन से दो आदमी?"
"अभी पता नहीं चलेगा," घंटी ने कहा। "जब दोनों सामने होंगे, तब बता दूँगी।"
मैंने घंटी को जेब में रख लिया और दीवार के सहारे सिर टिका दिया।
"टिंकू," मैंने कहा।
"हाँ उस्ताद।"
"बच्चों को बोल, घर के बाहर दो-दो, कोने-कोने पर खड़े हो जाएँ। सीटी सिर्फ़ सबसे बड़े खतरे के लिए।"
"और तुम?"
"मैं यहीं बैठा हूँ," मैंने कहा। "थोड़ी देर।"
टिंकू चला गया।
मीरा ने अपना कैमरा उठाया और उसे बंद कर दिया।
"क्यों बंद किया?" मैंने पूछा।
"क्योंकि ये बात किसी के देखने की नहीं है," उसने कहा।
फिर वो उठी।
"मैं दरवाज़े पर खड़ी हूँ," उसने कहा। "बस।"
वो चली गई।
मैं अकेला रह गया।
दीये की पीली रोशनी में मैंने अपनी जली हथेली देखी। उस पर अब तक दर्द नहीं उठा था। पर आ रहा था। धीरे-धीरे। ठंडे पानी की तरह।
मैंने घंटी को हथेली में लिया।
"घंटी," मैंने कहा।
"हाँ।"
"वो दरवाज़ा। जिस पर कोई धूल में लिख रहा था।"
"हाँ।"
"वो हमारा घर है।"
"हाँ।"
"तो अंदर आने के लिए उसे कोई रास्ता क्यों चाहिए था?"
घंटी चुप रही।
"घंटी?"
"क्योंकि," घंटी ने कहा, "वो घर में नहीं आया था। वो घर से बाहर गया था।"
मैंने दीवार से सिर उठाया।
"क्या?"
"उसने दरवाज़ा बाहर से नहीं खोला," घंटी ने कहा। "उसने अंदर से खोला।"
मेरी रीढ़ ठंडी हो गई।
"क्या मतलब?"
"तेरा घर," घंटी ने कहा, "दो तरफ़ का है। एक दरवाज़ा गली की तरफ़। दूसरा… कहीं और की तरफ़।"
"कहाँ?"
"अभी नहीं," घंटी ने कहा। "पर एक बात सुन ले।"
"बोल।"
"आज रात जो आया," घंटी ने कहा, "वो तेरे घर का नहीं था। फिर भी वो अंदर से निकला। इसका मतलब सिर्फ़ एक है।"
मैंने आँखें बंद कीं।
"मतलब?"
"मतलब," घंटी ने कहा, "कि घर में कोई है जो उसे जानता है।"
कमरे में सन्नाटा था।
दीये की लौ हिली।
और मैंने पहली बार उस रात महसूस किया कि मेरा घर… मेरा घर मेरा नहीं रहा।
दरवाज़े पर मीरा की परछाईं दिखी। उसकी आवाज़ आई —
"अंकुश।"
"हाँ?"
"बाहर कोई खड़ा है।"
मैं उठा।
जली हथेली को कमीज़ में छिपाया। घंटी जेब में रखी। और दरवाज़े की तरफ़ चला।
"कौन?"
"पता नहीं," मीरा ने कहा। "पर वो हमारी तरफ़ नहीं देख रहा।"
मैं दरवाज़े पर पहुँचा।
आँगन की दीवार के पास, फाटक के ठीक बाहर, एक आदमी खड़ा था।
लंबा। पतला। सिर झुका हुआ।
उसके हाथ में कुछ था।
और वो काँप रहा था।
मैंने आँखें सिकोड़कर देखा।
फिर मेरा दिल धक् से रह गया।
वो पापा थे।
और उनके हाथ में वही टूटा रेडियो था।
जो मैंने कमरे में छोड़ा था।
॥
मैं पापा के पास पहुँचा। उनके हाथ में टूटा रेडियो था और वो काँप रहे थे, जैसे कोई बूढ़ा पेड़ आख़िरी बार हवा से लड़ रहा हो।
मैंने धीरे से रेडियो उनके हाथ से लिया। पहले तो उन्होंने छोड़ने से मना किया, उँगलियाँ कस गईं। फिर छोड़ दिया।
“पापा,” मैंने कहा।
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। आँखें लाल थीं, पर पानी नहीं आ रहा था। पानी तो जाने पर आता है। उनका पानी पच्चीस साल से अंदर सूख रहा था।
“मैंने सोचा,” उन्होंने कहा, “कि तार जोड़ दूँ तो आवाज़ आ जाएगी। आवाज़ आई तो सब ठीक हो जाएगा।”
“पापा—”
“पर मैं जानता हूँ,” उन्होंने कहा, “कि ये तार नहीं है। तार तो बहाना है। मैं तीस साल से हर टूटी चीज़ में तार ढूँढ रहा हूँ, जिससे ये लगे कि ज़्यादा ज़रूरी टूटन नहीं है।”
मैंने उनका हाथ पकड़ा। सूखा था, ठंडा।
“अंदर चलिए,” मैंने कहा।
वो साथ आए। आँगन में ईंटों के पास बैठे। दीये की रोशनी हमारे बीच में थी, एक छोटी-सी पीली दुनिया।
माँ व्हीलचेयर पर थीं। उन्होंने पापा को देखा, फिर मुझे। कुछ नहीं बोलीं, बस हाथ से इशारा करके काजल को पानी का गिलास लाने को कहा।
पापा ने आधा पिया। बचा हुआ गिलास उन्होंने अपने घुटनों के पास रख दिया।
माँ ने व्हीलचेयर आगे बढ़ाई।
“शंकर,” उन्होंने कहा।
पापा ने नज़र उनकी तरफ़ की।
“बीस साल,” माँ ने कहा। “बीस साल से मैं तुम्हारे साथ सो रही हूँ। और हर रात मैं तुम्हारी चुप्पी के साथ सोती हूँ। तुम सोते हो क्या?”
पापा ने कुछ नहीं कहा।
“मुझे पता है कि तुम नहीं सोते,” माँ ने कहा। “तुम आँखें बंद कर लेते हो, बस।”
मैंने पापा की तरफ़ देखा। उन्होंने सिर झुका लिया।
माँ ने मेरी तरफ़ देखा।
“तेरे पापा झूठ नहीं बोलते,” उन्होंने कहा।
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