The Mysterious Bell – Chapter 686
सामने कोई नहीं था।
फिर मैंने पलटकर देखा।
दरवाज़े के बाहर, आँगन की सीढ़ी की आख़िरी पायदान पर, पापा खड़े थे।
वो कब आए, पता नहीं। उनके हाथ में कुछ नहीं था। उनका चश्मा कान पर टेप से बँधा हुआ था। उनकी कमीज़ की जेब फटी हुई थी। और वो खड़े थे — बस खड़े थे, जैसे कोई पुराना पेड़ हो जिसे किसी ने काटने की कोशिश की हो और छोड़ दिया हो।
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"पापा," मैंने कहा। "रेडियो — वो बजता नहीं। तार जुड़ गया, पर आवाज़ नहीं आ रही।"
पापा ने अपना मुँह फेर लिया।
"मैंने कहा था," उन्होंने कहा।
"क्या कहा था?"
"कि अब मैं कुछ नहीं छूऊँगा।"
कमरे में एक पल के लिए पूरी चुप्पी छा गई।
टिंकू ने पेचकस उठाया और फिर हाथ में ही पकड़े रह गया। सानिया ने अपनी कॉपी और कसकर पकड़ ली। मीरा ने अपना कैमरा नीचे कर दिया — न बंद किया, बस नीचे कर दिया। जैसे वो भी ये वाली बात रिकॉर्ड नहीं करना चाहती थी।
मैंने अपनी जली हथेली देखी।
"पापा," मैंने कहा। "बस तार है। तुम्हें पता है, तुम्हें ये सब पता है। तुमने पच्चीस साल उस्ताद की दुकान से टूटी चीज़ें ठीक कीं—"
"मैंने कुछ ठीक नहीं किया," उन्होंने कहा।
"क्या?"
पापा ने पहली बार मेरी तरफ़ देखा।
"मैंने कुछ ठीक नहीं किया, अंकुश," उन्होंने कहा। "मैंने सिर्फ़ चुप रहकर उन्हें और बिगाड़ा है।"
"पापा—"
"ये रेडियो ठीक हो जाएगा तो क्या? गली ठीक हो जाएगी?"
उनकी आवाज़ नीची थी, पर उसमें कुछ था जो मैंने पहले नहीं सुना था। जैसे किसी पुराने दरवाज़े की कुंडी को ज़ोर से खींचा गया हो।
"पापा, मैं तुमसे मदद माँग रहा हूँ। बस मदद।"
"नहीं।"
"एक बार।"
"नहीं।"
"पापा, तुम्हें ये तार जोड़ना आता है। तुम्हें ये यंत्र पता है। तुमने इसे हज़ार बार खोला—"
"मैंने क्या खोला?" पापा ने कहा। "मैंने सिर्फ़ उन चीज़ों को छुआ, जिन्हें छूने के बाद कोई सवाल नहीं पूछता। मैंने तुम्हें कभी ये नहीं बताया कि मैंने क्या किया। हकीम साहब के काग़ज़ पीछे के फाटक पर जलते रहे, वो शाम मैं वहीं खड़ा था, अंकुश। खड़ा रहा।"
सब चुप हो गए।
माँ की आवाज़ आँगन से आई, व्हीलचेयर की चरचराहट के साथ।
"शंकर," उन्होंने कहा।
पापा नहीं रुके।
"मैंने अंगूठा लगाया," उन्होंने कहा। "और फिर पच्चीस साल तक ये सोचता रहा कि उस अंगूठे को मिटाने का कोई तरीक़ा होगा। होता है?"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"तुम बताओ," उन्होंने कहा। "तुम्हारे पास घंटी है। तुम बताओ, अंगूठे का कोई इलाज होता है?"
मैंने कुछ नहीं कहा।
क्योंकि मेरे पास इसका जवाब नहीं था।
"पापा," मैंने कहा। "मैं तुम्हें ये नहीं बता सकता कि उस अंगूठे का क्या होगा। पर मैं इतना जानता हूँ — जब तुम चुप रहते हो, तो तुम्हारी चुप्पी भी किसी का अंगूठा बन जाती है।"
पापा ने मेरी तरफ़ देखा।
"क्या बोला तूने?"
मेरी छाती में कुछ जम गया। ज़ोर से। गरम।
"मैंने कहा," मैंने आवाज़ उठाकर कहा, "कि तुम रोज़ चुप रहते हो। हर बार। जब कुछ होता है, तुम चुप हो जाते हो। काग़ज़ आता है, तुम चुप। अंगूठा माँगा जाता है, तुम चुप। अस्पताल की ज़मीन जाती है, तुम चुप। मैंने अंगूठा नहीं लगवाया, पापा, पर मैंने बीस दिन तक चुप रहकर तुम्हारा रास्ता साफ़ किया।"
"अंकुश!" मीरा ने कहा।
"नहीं," मैंने कहा। "आज ये बात होगी।"
मैं पापा के सामने गया।
"पापा, तुम्हें पता है मुझे कब सबसे ज़्यादा डर लगता है? अंधेरे से नहीं। राख से नहीं। सफ़ेद कुर्ते वाले से भी नहीं। जब तुम चुप होते हो, तब। क्योंकि जब तुम चुप होते हो, तो मुझे लगता है कि सब कुछ मुझे अकेले ही उठाना पड़ेगा। और मैं अकेला… मैं अकेला नहीं उठा पाऊँगा। मैं उठा नहीं पाता।"
मेरी आवाज़ टूटी।
"मैं उठा नहीं पाता, पापा," मैंने कहा। "इसीलिए मैं सबको जोड़ रहा हूँ। क्योंकि मुझे डर है कि मैं वो नहीं कर पाऊँगा जो तुम नहीं कर पाए।"
पापा ने मेरी तरफ़ देखा।
कुछ देर तक।
फिर उन्होंने अपना हाथ उठाया। जैसे मुझे कुछ कहने वाले हों। जैसे कोई पुरानी आदत हो — कि जब बेटा गलत बोले, तो बाप का हाथ उठता है।
पर उनका हाथ हवा में ही रुक गया।
और फिर नीचे गिर गया।
"नहीं," उन्होंने कहा।
"पापा—"
"नहीं, अंकुश। तू सही बोल रहा है।"
वो हिले।
दरवाज़े की तरफ़ गए।
उनके कदम भारी थे। जैसे किसी की चप्पल पानी से भर गई हो। वो दरवाज़े की चौखट तक पहुँचे, फिर वहाँ रुक गए।
एक हाथ उन्होंने चौखट पर रखा।
मैंने उनकी पीठ देखी।
पच्चीस साल की पीठ। झुकी हुई। पतली। सफ़ेद बालों वाली। वो पीठ जो मुझे बचपन में बहुत बड़ी दिखती थी, अब छोटी लग रही थी। और इतनी छोटी कि मैं उसे एक हाथ में समेट सकता था।
"मैं ठीक नहीं हूँ," पापा ने कहा।
उनकी आवाज़ टूटी।
पहली बार। पच्चीस साल में पहली बार।
मैंने उन्हें कभी नहीं सुना था ऐसे बोलते। वो हमेशा छोटे वाक्यों में बोलते थे। हाँ। नहीं। पानी ले आओ। बत्ती बंद कर दो। चुप रहो।
पर आज उनकी आवाज़ में बहुत कुछ था।
"मैं ठीक नहीं हूँ, अंकुश," उन्होंने कहा। "और मैं… मैं तुझे नहीं, खुद को नहीं समझ पाया।"
कमरे में जो भी था, सब रुक गया।
दीये की लौ भी।
"मैं पच्चीस साल ये सोचता रहा," पापा ने कहा, "कि अगर मैं चुप रहूँगा, तो तुम लोग सुरक्षित रहोगे। चुप्पी एक छत है, मैंने सोचा। उसके नीचे धूप नहीं आएगी, बारिश नहीं आएगी।"
उन्होंने हाथ चौखट से उठाया।
"पर वो छत नहीं थी," उन्होंने कहा। "वो कब्र थी।"
मैंने मुँह खोला। कुछ कहने के लिए।
"मत बोल," उन्होंने कहा। "प्लीज़। आज मत बोल।"
मैं चुप हो गया।
"मैंने सोचा था कि एक दिन मैं सब ठीक कर दूँगा," पापा ने कहा। "एक दिन। पर वो एक दिन कभी नहीं आया, अंकुश। क्योंकि एक दिन कभी नहीं आता।"
उन्होंने अपना चश्मा उतारा। टेप खुली। चश्मा हाथ में।
"मैं तेरी माँ को लेकर भाग आया था," उन्होंने कहा। "उस रात। जब काग़ज़ जल रहे थे। मैंने सोचा, दूर चले जाएँगे, सब भूल जाएँगे। पर ये गली… ये गली हमें छोड़ती ही नहीं। ये गली पकड़ लेती है। नाली से, पीपल से, तेरे हाथों से।"
वो पलटे।
उनकी आँखें लाल थीं।
"तू मुझसे मदद माँग रहा है," उन्होंने कहा। "और मैं तुझे क्या दूँ? ये हाथ? ये हाथ जो कुछ नहीं कर पाते। ये आँखें? ये आँखें जो चीज़ें देखकर भी चुप रहीं।"
"पापा—"
"मैं तुझे नहीं, खुद को नहीं समझ पाया," उन्होंने कहा।
और फिर वो मुड़े।
बिना पीछे देखे निकले।
सीढ़ियों से उतरे। आँगन से गुज़रे। माँ के पास से। माँ ने उन्हें रोकने के लिए अपना हाथ बढ़ाया — वो हाथ जो व्हीलचेयर के पहिये की तरफ़ जाता था — पर पहुँच नहीं पाया।
पापा निकल गए।
दरवाज़े से बाहर।
गली में।
और उनके जाने के बाद कमरे में एक बात बची — दीये की लौ, और टूटे रेडियो के तार से आती हुई हल्की चमक।
टिंकू ने धीरे से कहा —
"उस्ताद…"
"हाँ।"
"क्या हमें पापा के पीछे जाना चाहिए?"
मैंने अपनी जली हथेली देखी।
"नहीं," मैंने कहा।
"पर—"
"टिंकू, वो आदमी पच्चीस साल से इसी दरवाज़े पर खड़ा था। आज वो पहली बार बाहर निकला है। उसे अकेले जाने दो।"
मैं फ़र्श पर बैठ गया। पीठ दीवार से लगाई।
घंटी जेब में ठंडी हो गई थी।
"घंटी," मैंने कहा।
"बोल।"
"मैंने ग़लत कहा?"
"क्या?"
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