The Mysterious Bell685 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 685

6 min read November 5, 2026

मैंने दरवाज़े के पल्ले की तरफ़ देखा। वो हवा में धीरे-धीरे हिल रहा था। हर झोंके के साथ धूल की सतह पर पतली लहर उठती थी, और उस लहर के साथ कुछ अक्षर और मिट जाते थे।

"यहीं गया," मैंने कहा। "हवा में।"

चिंटू ने अपनी चप्पल उठाई और धूल पर धीरे से रख दी, जैसे किसी को ढक रहा हो।

"अब नहीं उड़ेगी," उसने कहा।

मैंने उसके सिर पर हाथ रखा।

"शाबाश।"

टिंकू ने दरवाज़े के बाहर झाँका। फिर अंदर। फिर बाहर।

"उस्ताद," उसने कहा, "कोई भागा कैसे? हम इतनी जल्दी आए। गली का मुँह तो सामने है।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

"सामने है," मैंने कहा। "पीछे भी कुछ है।"

मैं दरवाज़े से बाहर निकला। घर की पिछली दीवार के साथ एक पतला रास्ता जाता था — वही रास्ता जिसके बारे में पापा ने एक बार सिर्फ़ इतना कहा था कि "वहाँ से पहले भी लोग आते-जाते थे।" रास्ता नीचे की तरफ़ ढलान लेता था और सीढ़ी के नीचे से सूखी नाली में खुलता था।

नाली सूखी थी।

पर सूखी नाली की मिट्टी में, दो जगह, पैर के निशान थे।

नए नहीं। भूरे। जैसे किसी ने गीली मिट्टी में पैर रखा हो और फिर सूख जाने दिया हो। पर वो निशान टूटे नहीं थे। पूरे थे। मतलब उन पर अभी किसी ने पैर नहीं रखा था।

मैंने अपनी उँगली उनके ऊपर रखी।

"जूते नहीं," मैंने कहा। "लकड़ी के जूते।"

मीरा मेरे पास आई। उसने एक निशान की तस्वीर ली, फिर दूसरे की।

"यानी वो भागा नहीं," उसने कहा। "वो चला गया। आराम से।"

"हाँ।"

"कैसे?"

मैंने नाली की तरफ़ देखा। फिर अपने घर की तरफ़।

"क्योंकि उसे रास्ता पता था," मैंने कहा। "और जिसे रास्ता पता हो, वो कभी भागता नहीं।"

पीछे से टिंकू ने कहा —

"उस्ताद, यहाँ कुछ और है।"

हम सब अंदर गए।

टिंकू दीये के पास खड़ा था, और उसकी उँगली दीवार की तरफ़ थी।

"देखो," उसने कहा।

मैंने देखा।

दरवाज़े के ठीक बगल में, पीली दीवार पर, एक और लिखाई थी। बहुत छोटी। बहुत हल्की। जैसे किसी ने चलते-चलते जल्दी में उँगली फेर दी हो और फिर भूल गया हो।

मीरा ने कैमरा करीब किया।

"बता," मैंने कहा।

"यहाँ… यहाँ कुछ अधूरा है," उसने कहा। "जैसे कोई नाम लिख रहा था, और बीच में छोड़ गया।"

"कितना?"

"दो अक्षर। बस। और उसके आगे एक लकीर, जो नीचे की तरफ़ मुड़ी है।"

"कौन से अक्षर?"

मीरा ने ध्यान से देखा।

"एक बड़ा है," उसने कहा। "और एक छोटा। पर अंकुश, ये अक्षर नहीं हैं।"

"तो क्या हैं?"

"ये निशान हैं," उसने कहा। "जैसे कोई लिख रहा हो और बीच में डर जाए।"

मैंने घंटी को हथेली में से निकाला। वो अब भी ठंडी थी, पर जैसे ही मैंने उसे दीवार के करीब लाया, वो हल्की गरम हुई।

"घंटी," मैंने कहा। "ये क्या है?"

"ये नाम नहीं है," उसने कहा। "ये सवाल है।"

"किसका?"

"तुम्हारा।"

मैंने घंटी को देखा।

"क्या मतलब?"

"जो आया," घंटी ने कहा, "वो नाम लिखने नहीं आया था। वो पूछने आया था। और उसने अपना सवाल दीवार पर लिखा।"

"क्या पूछा?"

"वो तुम्हें पढ़ना होगा," घंटी ने कहा। "जब मिट जाए, तब समझ आएगा।"

और फिर वो चुप हो गई।

मीरा ने अपना कैमरा नीचे किया।

"अंकुश," उसने कहा, "मुझे एक बात कहनी है।"

"कह।"

"ये काम किसी ठेकेदार का नहीं है।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

"तो?"

"अंकुश, ये चंद्रेश सक्सेना का काम हो सकता है।"

मैंने दीवार पर इकट्ठी होती धूल देखी।

"नहीं," मैंने कहा।

"तुम सुनते ही क्यों नहीं?"

"सुन रहा हूँ," मैंने कहा। "पर तू भी सुन। चंद्रेश काग़ज़ से खेलता है। काग़ज़ लिखवाता है। अंगूठा लेता है। तारीख़ें बदलता है। मगर दीवार पर उँगली नहीं चलाता।"

"क्यों नहीं?"

"क्योंकि उसको काग़ज़ पर भरोसा है," मैंने कहा। "काग़ज़ मिटता नहीं। पर धूल मिटती है। जो दीवार पर धूल में लिखता है, वो जानता है कि वो मिटेगा। वो इसीलिए लिखता है कि मिट जाए।"

मीरा चुप हो गई।

"तो ये कौन है?" उसने फिर पूछा।

मैंने दरवाज़े के पल्ले की तरफ़ देखा।

"कोई है," मैंने कहा, "जो चाहता है कि हम पढ़ें, पर पूरा न पढ़ें।"

सानिया ने धीरे से कहा —

"उस्ताद, माँ की ब्याहता की संदूकची…"

मैं दौड़ा।

संदूकची कोने में थी। रस्सी बँधी थी। जैसी थी, वैसी ही थी। मैंने उसे छुआ। ताला नहीं था, बस कुंडा था और वो कुंडा बंद था।

"किसी ने खोला नहीं," मैंने कहा।

"तो वो क्या ढूँढ रहा था?" मीरा ने कहा।

मैंने कमरे के चारों तरफ़ देखा।

"नाम," मैंने कहा। "वो घर का नाम ढूँढ रहा था।"

"किसका नाम?"

"पता नहीं," मैंने कहा। "पर वो मिला नहीं।"

मीरा ने मेरे घर की पुरानी दीवारों को देखा। वो दीवारें जिन पर कोई तस्वीर नहीं थी। कोई नाम नहीं। कोई तारीख़ नहीं। सिर्फ़ चूना, और जगह-जगह उखड़ा हुआ। सिर्फ़ एक घर, जो किसी काग़ज़ में नहीं।

और तभी मुझे याद आया।

मैं पीछे पलटा।

"टिंकू," मैंने कहा। "दुकान से वो पुराना रेडियो ला। जो कोने में पड़ा है।"

"वो जला हुआ रेडियो?"

"हाँ।"

"उस्ताद, वो बजता नहीं।"

"लाना," मैंने कहा।

वो दौड़ा।

मीरा ने मुझे देखा।

"तुम उससे क्या करोगे?"

मैंने अपनी जलती हुई पीली उँगली देखी, जो धूल छूने से और गरम हो गई थी।

"मैं उसे ठीक करूँगा," मैंने कहा।

मीरा ने अपना कैमरा नीचे किया।

"अंकुश," उसने धीरे से कहा, "तुम तीन रात से सोए नहीं हो।"

"सो जाऊँगा," मैंने कहा। "जब ये शहर सोने देगा।"

टिंकू रेडियो लेकर आया।

मैंने उसे दीवार के सहारे रखा। मैंने उसका पिछला ढक्कन खोला। भीतर के तार उलझे हुए थे, कुछ जले हुए, कुछ कटे हुए। एक तार लटक रहा था, जैसे किसी ने उसे उखाड़ दिया हो।

मैंने अपनी जेब से पेचकस निकाला। वो मेरे पास अब भी था — छोटा, घिसा हुआ, जो पापा की दुकान से उठाया था।

"बोल," टिंकू ने कहा। "क्या करें?"

"यहाँ देख," मैंने कहा। "ये तार अंदर घुसाना है। बस एक बार।"

"और फिर?"

"और फिर देखेंगे।"

मैंने पेचकस से तार का सिरा उठाया। वो छोटा था, गीला था, और बार-बार फिसल रहा था। मेरी उँगलियाँ ग्रीस और धूल से भरी थीं।

"टिंकू, टॉर्च पकड़।"

उसने टॉर्च जलाई।

मैंने तार को छेद में डाला।

एक चिंगारी निकली।

छोटी। पीली। नीली। और फिर एक आवाज़ — चट।

मैं पीछे हटा। मेरा हाथ खुल गया। पेचकस फ़र्श पर गिरा और लुढ़क गया।

"उस्ताद!" टिंकू चिल्लाया।

मैंने अपनी हथेली देखी।

जली थी। दो उँगलियों के बीच, एक छोटा सा गोल निशान, जो अभी उभर रहा था। चमड़ी सफ़ेद हो गई थी, किनारे लाल। दर्द नहीं हो रहा था। अभी नहीं। दर्द बाद में आता है। मुझे पता था। मैंने अपनी ज़िंदगी में बहुत बार ये जला हुआ निशान देखा था।

"बर्फ," मीरा ने कहा। "कहीं से बर्फ लाओ।"

सानिया दौड़ी।

"रुक," मैंने कहा। "सानिया, रुक।"

वो रुकी।

"कोई मत भेज," मैंने कहा। "सब यहीं रहो।"

मैंने हाथ को कमीज़ से पोंछा।

घंटी जेब में बजी।

एक बार। दो बार नहीं। एक बार।

"बोल," मैंने कहा।

"तू जल्दी में था," घंटी ने कहा।

"तो क्या करता? बैठकर इंतज़ार करता?"

"हाँ," घंटी ने कहा।

मैंने आँखें बंद कर लीं।

"घंटी, ये वक़्त नहीं है।"

"यही वक़्त है," उसने कहा। "सुन। मशीन से पहले दो इंसान जुड़ें। वरना तार जुड़कर भी आवाज़ नहीं देगी।"

"कौन से दो इंसान?"

घंटी कुछ देर चुप रही।

फिर उसने कहा —

"वो तेरे सामने खड़ा है। तू उसे देख नहीं रहा।"

मैंने आँखें खोलीं।

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