The Mysterious Bell – Chapter 688
“माँ, मुझे पता है।”
“नहीं,” माँ ने कहा। “तू सोचता है कि वो चुप रहते हैं क्योंकि उनके पास बोलने को कुछ नहीं है। पर सच ये है कि उनके पास इतना है कि अगर एक बार बोलना शुरू कर दें, तो रुकेंगे नहीं। और उन्हें पता है कि रुकना पड़ेगा। तो वो बोलते ही नहीं।”
मैंने कुछ कहना चाहा, माँ ने हाथ उठाया।
“वो बातें नहीं बोलते, ताकि किसी को डर न लगे,” माँ ने कहा। “यही उनका ढंग है। सच को अकेले ढोना। मुझे याद है, तेरे दादा के जाने के बाद उन्होंने तीन महीने में जितना बोला, उतना पूरे साल में भी नहीं बोलते। मैंने डॉक्टर को दिखाया। डॉक्टर ने कहा कि दिमाग़ शांत है। मैंने कहा कि शांत नहीं है, बस बंद है।”
माँ की आवाज़ धीमी थी, पर साफ़ थी। बीमारी ने उनका शरीर तोड़ा था, आवाज़ नहीं।
“एक बार,” माँ ने कहा, “उन्होंने घर बचाने के लिए अपना नाम कहीं दे दिया था।”
मेरी साँस रुकी।
“क्या?”
“अपना नाम,” माँ ने कहा। “अपने हाथ से लिखकर दिया था। किसी काग़ज़ पर। और उस दिन के बाद उनकी चुप्पी शुरू हुई।”
“कहाँ दिया था?” मैंने पूछा। “किस काग़ज़ पर?”
माँ ने पापा की तरफ़ देखा। पापा ने नज़र चुरा ली।
“ये मैं नहीं बताऊँगी,” माँ ने कहा।
“माँ—”
“क्योंकि ये बात मेरी ज़ुबान से नहीं निकलेगी,” उन्होंने कहा। “जिस दिन कैसेट बोलेगी, उस दिन सब सुनेंगे। तेरे पापा की आवाज़ में।”
“कैसेट में क्या है?”
“जो है,” माँ ने कहा। “वो अभी नहीं। सुबह बत्ती जाने से पहले।”
मैंने पेटी से तार निकाला। रेडियो के अंदर का जला हुआ तार देखा।
“पर आज रात तो—”
“आज रात तू ये सुन ले,” माँ ने कहा, “कि हमारे घर में एक नाम दिया गया था। तेरा और उसका। दोनों का।”
मैंने पापा की तरफ़ देखा।
वो उठ गए। बिना एक शब्द कहे। बाहर चले गए।
“पापा!”
दरवाज़े पर रुके। पलटे नहीं।
“बाहर हूँ,” उन्होंने कहा। “पाँच मिनट।”
और चले गए।
मैं उठने लगा, माँ ने हाथ पकड़ा।
“मत जा,” उन्होंने कहा। “उसे जाने दे। जो आदमी बीस साल से रोया नहीं, उसे रोने का वक़्त देना भी इंसानियत है।”
मैं फिर बैठ गया।
बाहर से आवाज़ आई — मिट्टी पर कुछ गिरने की। फिर कोई चीज़ उठाने की। फिर चुप्पी।
मीरा दरवाज़े पर खड़ी थी। उसने मेरी तरफ़ देखा। मैंने सिर हिलाया। वो बाहर नहीं गई, बस वहीं खड़ी रही, मेरी तरफ़ पीठ करके, दरवाज़े की तरफ़ देखती हुई। जैसे रखवाली कर रही हो।
काजल माँ के पास बैठ गई।
मैंने रेडियो खोला।
पाँच मिनट बाद पापा आए।
मुझे पता नहीं चला कब आए। एक पल मैं सिर झुकाए रेडियो के तारों में उलझा था, और अगले पल वो मेरे पास बैठे थे। उनका चेहरा धुला हुआ था। आँखों के नीचे पानी की लकीरें थीं, जो उन्होंने पोंछी नहीं थीं। पानी तो पोंछने से जाता है। उन्होंने छोड़ दिया था, जाने के लिए।
उन्होंने मेरे हाथ से रिंच ली। एक पल मेरी जली हथेली देखी, फिर कुछ नहीं कहा।
“ये पट्टी पहले खोल,” उन्होंने कहा।
“यहाँ?”
“हाँ। ये रेडियो मैंने सोलह साल की उम्र में खोला था। तब तार इसी तरह थे।”
“आप करिए,” मैंने कहा। “मैं देखता हूँ।”
उन्होंने रिंच ली। हाथ काँप रहे थे। फिर धीरे-धीरे कम काँपने लगे। रिंच का लोहा अंदर गया, पट्टी खुली।
“ये जला है,” उन्होंने कहा।
मैंने नया तार दिया। उन्होंने देखा, फिर मेरी तरफ़ देखा, जैसे पूछ रहे हों कि तूने ये कहाँ से निकाला।
“पेटी में था,” मैंने कहा। “पुराना है। पर साफ़ है।”
“धातु पुरानी नहीं होती,” पापा ने कहा। “बस लोग पुराने होते हैं।”
उन्होंने तार अंदर डाला। पहले एक सिरा जोड़ा, फिर दूसरा। फिर एक पेंच कसा। फिर दूसरा।
“पापा,” मैंने कहा।
“हूँ।”
“आपने माँ से वादा किया था कि ये बात अपने साथ नहीं ले जाओगे।”
उन्होंने काम रोका नहीं।
“हाँ।”
“तो फिर क्यों?”
“क्योंकि चुप रहना आसान लगा,” उन्होंने कहा। “बोलने से सब हिलता है। चुप रहने से कुछ नहीं हिलता। सिर्फ़ अंदर हिलता रहता है।”
मैंने उनकी तरफ़ देखा। उनका चेहरा रेडियो की तरफ़ झुका था, आधा अंधेरे में, आधा दीये की रोशनी में।
“अंकुश,” उन्होंने कहा, “मैंने तेरे दादा को अकेले मरने दिया।”
मेरा हाथ ठिठक गया।
“क्या कह रहे हैं आप?”
“उस रात,” पापा ने कहा, “दवा लेने मैं गया था। दुकान बंद हो रही थी। मैं रास्ते में बैठ गया। मैं थक गया था। और मैं सो गया।”
“कितनी देर?”
“दो घंटे।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
“उठा तो दवा की दुकान बंद थी। घर आया तो तेरे दादा की साँस जा चुकी थी। तेरी दादी दरवाज़े पर बैठी रो रही थी, और मेरी जेब में वो दवा थी जो मैं लाने में देर कर गया था।”
मैंने रेडियो नीचे रख दिया।
“तभी से,” पापा ने कहा, “मैं हर रात दो बजे उठ जाता हूँ। बीस साल से। कोई मुझे नहीं बताता कि रात के दो बजे हैं। मैं खुद उठ जाता हूँ।”
माँ ने आँखें बंद कर लीं।
“इसीलिए,” मैंने कहा, धीरे से, “जब दादा की साइकिल मेरे पास आई, तब आप उसे छू नहीं पाए?”
“मैं उस साइकिल को देख नहीं सका,” पापा ने कहा। “एक बार पच्चीस साल बाद देखा, तेरे उस कमरे में, और मैं काँप गया। मेरे हाथ से पेचकस गिर गया। तुझे मुझ पर शक हुआ।”
“पापा, मुझे तो लगा था कि आप कुछ छिपा रहे हैं।”
“मैं छिपा रहा था,” पापा ने कहा। “छिपा रहा था कि मैं डर गया था।”
वो एक पल रुके।
“और उसके बाद,” उन्होंने कहा, “रात के दो बजे वाला पापा फिर उठ गया। जो कभी सोता ही नहीं, वो क्या बताएगा कि उसे क्या हुआ?”
मैंने उनका कंधा पकड़ा। पहले कभी नहीं पकड़ा था।
“तो उस अंगूठे वाली बात में क्या सच है?”
पापा ने एक लंबी साँस ली।
“उस रात,” उन्होंने कहा, “मेरे पास पैसे नहीं थे। तेरी माँ अस्पताल में थीं। डॉक्टर इसरानी ने कहा था — दवा आज रात लगे, तो सुबह की साँस लौटेगी, वरना कोई वादा नहीं देता।”
माँ ने उनकी तरफ़ देखा।
“और काग़ज़ लेकर एक आदमी आया,” पापा ने कहा। “सफ़ेद कुर्ता, तेल की गंध, काग़ज़ स्याही से भीगा हुआ। उसने कहा — अंगूठा लगाओ, दवा की कीमत मिट जाएगी।”
“आपने पूछा नहीं कि काग़ज़ किसका है?”
“मैंने पूछा। उसने कहा — तेरी दुकान का।”
मैंने आँखें बंद कीं।
“दुकान तो दादा की थी।”
“मैंने यही कहा,” पापा ने कहा। “तो उसने कहा — ऊपर के काग़ज़ पर दुकान का नाम है, नीचे के काग़ज़ पर तेरा नाम लिखो। दोनों जुड़ेंगे तो ज़मीन का हिसाब बनेगा। मैंने कहा कि मैं पढ़ नहीं सकता, आँखें कमज़ोर हैं। उसने कहा — पढ़ने की ज़रूरत नहीं, नाम लिखने की ज़रूरत है।”
“और आपने लिख दिया।”
“उससे पहले मैंने तीन बार कहा कि मैं कुछ नहीं बेच रहा,” पापा ने कहा। “और तीनों बार उसने कहा कि बिक्री का काग़ज़ नहीं है, दवा का है। फिर उसने अस्पताल की रसीद दिखाई। सफ़ेद काग़ज़ पर नीली मोहर। डॉक्टर इसरानी का नाम। माँ की दवा। मैंने सोचा कि अगर रसीद अस्पताल की है, तो शायद बात सच है।”
“और अंगूठा लग गया।”
“अंगूठा लगा और नाम भी लिखा,” पापा ने कहा। “उस आदमी ने कहा — नाम और अंगूठा दोनों चाहिए। मैंने पूछा क्यों। उसने कहा — क्योंकि तेरे बाप नहीं हैं, तू है।”
कमरे में दीये की लौ हिली।
“मैंने लिख दिया — शंकर,” पापा ने कहा। “त्रिशूल जैसा नहीं, आम सा नाम। जैसे कोई चीज़ बेच नहीं रहा, बस काग़ज़ पूरा कर रहा हो।”
“और उसके बाद?”
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