The Mysterious Bell – Chapter 682
मैंने सिर हिलाया।
तभी शटर के नीचे से चिंटू की आवाज़ आई।
"उस्ताद! उस्ताद, उस्ताद, सात का डर!"
"क्या?"
"वो सफ़ेद गाड़ी में से एक आदमी उतरा। उसने प्लॉट की तरफ़ देखा और फिर घड़ी देखी।"
"घड़ी?"
"हाँ, हाथ की घड़ी। और फिर वो मुस्कुराया।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा।
"सात बजे की तैयारी," उसने कहा।
"हाँ," मैंने कहा।
"तो हम क्या कर रहे हैं?"
मैंने माँ की तरफ़ देखा।
"हम इंतज़ार कर रहे हैं," मैंने कहा।
मीरा का चेहरा कठोर हुआ।
"अंकुश —"
"देख मीरा," मैंने कहा। "मैं जानता हूँ तुझे ये बात पसंद नहीं आ रही। पर अगर मैं अभी उनका दरवाज़ा खोलूँ, तो सच टूट जाएगा। और मुझे ये सच पूरा चाहिए, आधा नहीं। क्योंकि आधे सच से मशीन रुकती नहीं।"
मीरा ने कैमरा नीचे किया।
"तो कम से कम," उसने कहा, "हम प्लॉट पर नज़र रखें। अगर वो सात बजे से पहले कुछ करें, तो हम तैयार हों।"
"हाँ," मैंने कहा। "ये करो।"
मीरा बाहर गई। काजल माँ के पास बैठ गई। मैं दरवाज़े के सामने बैठा रहा।
और फिर कमरे के अंदर से आवाज़ आई।
कैसेट की आवाज़।
एक क्लिक। फिर एक सरसराहट। फिर कुछ सेकंड का सन्नाटा।
और फिर एक आवाज़ — बहुत पुरानी, बहुत दबी हुई, जैसे किसी पुराने कुएँ से आ रही हो।
मैंने सब कुछ सुनने के लिए कान सीधे किए।
पर माँ ने मेरा कंधा पकड़ा और वो बोलीं जो मुझे समझ नहीं आया — "वो आवाज़ तुम्हारे लिए नहीं है, अंकुश। अभी नहीं।"
"माँ —"
"अभी नहीं," उन्होंने दोहराया।
और मैं बैठा रहा।
दरवाज़े के पार, मेरे पापा एक कैसेट सुन रहे थे। और मैं — मैं इतना करीब होकर भी उससे बहुत दूर था।
तभी मेरी जेब से घंटी ने एक आवाज़ निकाली — उसने बजकर नहीं, बस हिलकर कहा, "और अब पूरी गली को लगता है कि सच सिर्फ़ उनके पास है।"
मैंने घंटी को हथेली में दबाया।
"तो?"
"तो जब सब अपने-अपने सच लेकर बैठे हों," घंटी ने कहा, "तब आदमी को सबसे पहले अपना सच देखना पड़ता है — आईने में, काग़ज़ पर नहीं।"
मैंने आँखें बंद कर लीं।
तभी अंदर से फिर आवाज़ आई। पापा की आवाज़।
नहीं — पापा कोई बोलते नहीं थे।
पर जो आवाज़ अंदर से आई, वो कमरे की नहीं थी। वो किसी दराज़ की थी। फिर कुछ गिरा — हल्का सा, काग़ज़ जैसा।
और फिर मैंने कुछ सुना, जो मेरी रीढ़ तक गया।
पापा की आवाज़, बहुत धीमी, काँपती, पर साफ़।
"नहीं। ये सच नहीं हो सकता।"
मैं खड़ा हो गया।
"माँ —"
पर माँ ने मुझे रोका।
"रुको," उन्होंने कहा। "वो अभी बोल रहे हैं।"
और फिर कमरे के अंदर से आवाज़ आई — कुछ बिखरने की। काग़ज़ बिखरने की। बहुत सारे काग़ज़।
फिर सन्नाटा।
लंबा सन्नाटा।
और फिर — बहुत हल्की, बहुत दबी हुई, ऐसी आवाज़ जैसे कोई रो रहा हो पर आवाज़ न निकले — मेरे पापा की साँस।
मैंने माथा दरवाज़े पर टिका दिया।
और तभी पापा ने कहा।
आवाज़ धीमी थी, पर साफ़। जैसे कोई बहुत दूर से बोल रहा हो।
"उस कैसेट को मत छेड़ना।"
मैं ठिठक गया।
"वरना घर फिर जलेगा।"
॥
दरवाज़े के पार से आवाज़ आते ही मेरा हाथ कुंडे पर जा रुका।
"उस कैसेट को मत छेड़ना। वरना घर फिर जलेगा।"
पापा की आवाज़। धीमी। काँपती। पर साफ़। जैसे कोई बहुत थककर, बहुत दूर से बोल रहा हो।
मैंने माथा दरवाज़े से हटाया। माँ मेरे पीछे व्हीलचेयर पर बैठी थीं। काजल उनके कंधे पर हाथ रखे खड़ी थी। दुकान के पीछे वाला ये छोटा कमरा — जहाँ औज़ारों का ट्रंक था, जहाँ पापा खुद को बंद करके बैठे थे — वो अब एक तिजोरी जैसा लग रहा था। बंद। चुप। पर अंदर कुछ चल रहा था।
"पापा?" मैंने दरवाज़े से सटकर कहा।
कोई जवाब नहीं।
"पापा, कैसेट में क्या है?"
फिर सन्नाटा। फिर काग़ज़ सरकने की आवाज़। फिर दराज़ खुलने-बंद होने की आवाज़। फिर पानी का गिलास रखने जैसी आवाज़।
"पापा, मैं अंदर आ रहा हूँ।" मेरा हाथ कुंडे पर कस गया।
"नहीं।" पापा की आवाज़ साफ़ आई। "अभी नहीं।"
"पर —"
"अंकुश।" ये माँ थीं। उन्होंने मेरा कंधा पकड़ा। "उन्होंने मना किया है तो नहीं।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा। व्हीलचेयर में बैठी माँ का चेहरा पीला था, पर आँखें साफ़ थीं। जैसे उन्हें पता था कि अंदर क्या चल रहा है। जैसे उन्हें ये भी पता था कि ये सब पहले भी एक बार हुआ था।
"माँ," मैंने धीरे से कहा, "आप जानती हैं ना, कैसेट में क्या है?"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। और फिर वही कहा जो वो हमेशा कहती थीं जब सच बहुत भारी होता था।
"जो सच खुद नहीं बोलता," उन्होंने कहा, "वो सच नहीं होता। बस एक बोझ होता है।"
मैं कुछ समझा नहीं। पर पूछा भी नहीं।
क्योंकि तभी अंदर से आवाज़ आई — कैसेट का क्लिक। और फिर सरसराहट।
और फिर वो आवाज़।
बहुत पुरानी। बहुत दबी हुई। जैसे किसी पुराने कुएँ की तली से कोई बोल रहा हो।
मैंने कान सीधे किए।
पर आवाज़ शब्दों में नहीं आ रही थी। सिर्फ़ एक लय आ रही थी। जैसे कोई गा रहा हो। धीरे-धीरे।
फिर आवाज़ बंद हो गई।
फिर पापा की आवाज़ आई। बहुत धीमी।
"नहीं। ये सच नहीं हो सकता।"
और फिर काग़ज़ बिखरने की आवाज़। बहुत सारे काग़ज़। जैसे किसी ने पूरा दराज़ उलट दिया हो।
फिर सन्नाटा।
लंबा सन्नाटा।
मैंने दरवाज़े पर कान टिका दिया। अंदर से सिर्फ़ साँस आ रही थी। धीमी। टूटी। जैसे कोई रो रहा हो पर आवाज़ न निकले।
माँ ने मेरी तरफ़ देखा।
"अब?" मैंने पूछा।
"अब रुको," उन्होंने कहा।
"कब तक?"
"जब तक वो खुद दरवाज़ा न खोलें।"
मैंने सिर हिलाया और उठकर बाहर आ गया।
शटर आधा खुला था। सुबह की धूप गली में तिरछी पड़ रही थी। पीपल के पत्तों से छनकर आती रोशनी ज़मीन पर छोटे-छोटे टुकड़े बना रही थी।
और शटर के बाहर पाँच जोड़ी आँखें मेरा इंतज़ार कर रही थीं।
टिंकू सबसे आगे। सिर पर माँ का गुलाबी दुपट्टा बँधा हुआ, आँखों पर वो काला एक काँच वाला चश्मा, और चेहरे पर ऐसा भाव जैसे वो कोई बहुत बड़ा फ़ैसला लेने आया हो।
"उस्ताद," उसने कहा, "टीम तैयार है।"
मैंने उन पाँचों को देखा। सानिया हाथ में लाल कवर वाली कॉपी लिए खड़ी थी। गुड्डू अपनी चप्पल की उँगली से खेल रहा था। रफ़ीक़ ने वो टूटा चश्मा आँख पर लगाया हुआ था जिसका एक काँच गायब था। और चिंटू — चिंटू के हाथ में एक पुरानी साइकिल की रिम थी, जिसे वो ढाल की तरह सामने पकड़े खड़ा था।
"ये रिम क्यों?" मैंने पूछा।
"हिफ़ाज़त के लिए," चिंटू ने कहा।
"किससे?"
"पता नहीं। पर हिफ़ाज़त तो होनी चाहिए ना।"
मैं हँसा। पहली बार उस सुबह।
टिंकू ने हाथ उठाया।
"ध्यान दो," उसने कहा। "उस्ताद की तरह बोलूँ?"
"बोल।"
उसने गला साफ़ किया। फिर उस्ताद के अंदाज़ में, बहुत धीमी आवाज़ में कहा, "बात छोटी है। काम बड़ा है।"
सानिया ने आँखें घुमाईं।
"टिंकू, तू उस्ताद की नकल करेगा तो मैं तेरी नकल करूँगी। फिर देख क्या होगा।"
"तो मत कर।"
"फिर तू भी मत कर।"
"अच्छा चुप।" टिंकू ने हाथ उठाया। "काम बाँटता हूँ।"
उसने सानिया की कॉपी माँगी, उसमें अपनी उँगली रखी और इस तरह पढ़ने लगा जैसे उसमें कुछ लिखा हो। कॉपी खाली थी। पर टिंकू की गंभीरता देखकर कोई हँसा नहीं।
"पहला काम," उसने कहा, "उस सफ़ेद कुर्ते वाले आदमी की जासूसी। वो गली के मुँह पर खड़ा है। हिलता नहीं। पिछले कुछ वक़्त से।"
"कितने वक़्त से?" मैंने पूछा।
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