The Mysterious Bell – Chapter 681
वो सीधे शटर के पास आईं।
"माँ, तुम्हें आराम —"
"चुप," उन्होंने कहा।
एक शब्द। बस एक शब्द। और मैं चुप हो गया।
काजल ने व्हीलचेयर रोकी। माँ ने मेरी तरफ़ देखा।
"वो अंदर है?"
मैंने सिर हिलाया।
"दरवाज़ा बंद है?"
"हाँ।"
"अंदर से?"
"हाँ।"
माँ ने एक गहरी साँस ली। फिर उन्होंने मुझसे कहा, "मुझे उस दरवाज़े तक ले चल।"
"माँ, तुम अभी —"
"अंकुश।" उन्होंने मेरा नाम ऐसे लिया जैसे कोई ताला खोलता है। "मुझे उस दरवाज़े तक ले चल।"
मैंने काजल की तरफ़ देखा। काजल ने धीरे से सिर हिलाया — मतलब, बहस मत कर।
मैंने व्हीलचेयर पकड़ी और उसे दुकान के पीछे वाले कमरे तक ले गया। रास्ते में माँ ने कुछ नहीं कहा। बस एक बार उन्होंने मेरा हाथ थपथपाया — वैसे ही, जैसे बचपन में कहती थीं, "घबरा मत, मैं हूँ ना।"
अब वो खुद घबराई हुई थीं। पर वो मुझे नहीं बता रही थीं।
पीछे वाले दरवाज़े के सामने हम रुके।
माँ ने व्हीलचेयर से हाथ बढ़ाकर दरवाज़े पर दो हल्की दस्तकें दीं।
"शंकर।"
अंदर से कोई आवाज़ नहीं।
"शंकर, मैं जानती हूँ तुम अंदर हो।"
फिर भी चुप्पी।
"शंकर, सुनो।" माँ की आवाज़ धीमी थी, पर उसमें वो चीज़ थी जो मुझे बचपन से याद है — कभी ऊँची नहीं होती, पर कभी नहीं हारती। "जो सच है, वो बता देना ही ठीक है। छुपाने से घर में और आग लगती है। और मैं अब आग नहीं झेल सकती।"
अंदर से आवाज़ आई।
नहीं — आवाज़ नहीं।
कुछ गिरा। धातु का कुछ गिरा। ज़मीन पर। एक बार, फिर एक बार लुढ़का।
मैंने दरवाज़े पर हाथ रखा।
"पापा?"
कोई जवाब नहीं।
"पापा, तुम ठीक हो?"
माँ ने मेरा हाथ पकड़ लिया।
"अभी मत पूछो," उन्होंने कहा। "अभी उनके अंदर जो चल रहा है, उसे जगह दो।"
"पर वो गिरा —"
"वो औज़ार गिरा है," माँ ने कहा। "औज़ार गिरते हैं। आदमी गिरते हैं। बस फ़र्क़ ये है कि औज़ार की आवाज़ बाहर आती है, आदमी की नहीं।"
मैं दीवार से टिक गया।
अंदर फिर सन्नाटा। फिर कोई चीज़ खिसकी।
मैंने धीरे से जेब में हाथ डाला और घंटी निकाली। वो मेरी हथेली में बहुत ठंडी थी।
मैंने मुँह मोड़कर, बहुत धीमे से पूछा, "कुछ बोल।"
घंटी चुप रही।
मैंने फिर पूछा, "मेरे पापा झूठ बोल रहे हैं?"
एक पल की चुप्पी। फिर घंटी में एक ठंडी सी आवाज़ उठी।
"झूठ नहीं।"
मेरी साँस रुक गई।
"तो क्या है?" मैंने पूछा।
"डर," घंटी ने कहा। "डर बोलता नहीं। डर दबता है। जैसे काग़ज़ पर अंगूठा। जैसे दरवाज़े पर कुंडा। जैसे आदमी के सीने पर पत्थर।"
मैंने घंटी को हथेली में दबाया। वो फिर चुप हो गई।
मीरा दरवाज़े के पास आई। उसके हाथ में रसीद थी। उसने माँ की तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़।
"मैडम," मीरा ने कहा, "ये रसीद —"
माँ ने रसीद देखी। बस एक पल को। फिर उन्होंने आँखें फेर लीं।
"रख दो," उन्होंने कहा।
"पर इसमें —"
"रख दो, बेटी।" माँ की आवाज़ में वो धीमापन था जो किसी बात को थामकर रखता है। "जो मैं पच्चीस साल से देख रही हूँ, उसे तुम एक काग़ज़ में नहीं दिखा सकती।"
मीरा ने रसीद मेरी तरफ़ बढ़ाई। मैंने ली।
तभी माँ ने कहा, "अंकुश, अभी तुम पापा से ज़्यादा मत पूछो।"
"माँ, मशीन सात बजे आने वाली है। अस्पताल के पीछे। और स्कूल की छत का काग़ज़ भी खुला है। और दस बजे रज़ा सलीम —"
"मैं जानती हूँ," उन्होंने कहा। "मैं सब जानती हूँ।"
"तो फिर?"
"तो फिर ये समझ लो," माँ ने कहा, "कि जब वो खुद बोलेंगे, तब सच आधा नहीं होगा। पूरा होगा। और पूरा सच आधे सच से ज़्यादा भारी होता है। इसलिए तैयार हो जाओ।"
मैंने गला साफ़ किया।
"तुम्हें पता है क्या है सच?"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा।
"मुझे कुछ-कुछ पता है," उन्होंने कहा। "पर अंदाज़ा और सच में फ़र्क़ होता है। और आज मैं अंदाज़े पर घर नहीं तोड़ूँगी।"
बाहर से काजल की आवाज़ आई।
"माँ, डॉक्टर इसरानी ने कहा था —"
"डॉक्टर इसरानी ने ये भी कहा था कि काग़ज़ साफ़ होने तक दवा रुकी रहेगी," माँ ने कहा। "और तुम्हारे पापा ने कहा था कि वो सब साफ़ करेंगे। तो मैं आज दोनों बातें एक साथ साफ़ होने दे रही हूँ।"
काजल ने कुछ नहीं कहा।
तभी शटर के नीचे से टिंकू का सिर घुसा।
"उस्ताद," उसने फुसफुसाकर कहा, "गली के मुँह पर फिर वो सफ़ेद गाड़ी आई है।"
मेरा शरीर सख़्त हो गया।
"कौन सी सफ़ेद गाड़ी?"
"वो ही। जो कल आई थी। खड़ी है। अंदर कोई दिख नहीं रहा, पर इंजन बंद है और शीशा थोड़ा खुला है।"
मीरा ने तुरंत अपना कैमरा उठाया।
"मत जाओ," माँ ने कहा।
"माँ —"
"मत जाओ बाहर।" माँ की आवाज़ नरम थी, पर उसमें वो चीज़ थी जो हिलती नहीं। "आज सुबह कोई भी अकेले बाहर नहीं जाएगा। तुम कल रात ही कह आए हो — जो आदमी अपनी जगह छोड़कर भागेगा, वही आग का आदमी है। तो हम सब अपनी जगह पर रहेंगे।"
मैंने सिर हिलाया।
"टिंकू," मैंने कहा, "गाड़ी पर नज़र रख। पर पीपल के पीछे से। सामने से नहीं।"
"समझ गया, उस्ताद।"
"और सानिया को बोल — अपनी कॉपी निकाले। गाड़ी का नंबर, वक़्त, कितने आदमी उतरे, सब लिखे।"
"हो गया।"
टिंकू का सिर गायब हुआ।
मैं माँ के पास बैठ गया। मेरी जेब में घंटी थी, हाथ में रसीद, और सामने बंद दरवाज़ा।
"माँ," मैंने धीरे से कहा, "तुम्हें पता था? कैसेट के बारे में?"
माँ ने एक लंबी साँस ली।
"मुझे पता था कि कुछ है," उन्होंने कहा। "पर मुझे पता नहीं था कि वो क्या है। तुम्हारे पापा ने एक बार, बहुत पहले, आधी रात को, मुझे नींद में कहा था — 'शंकरलाल, वो कैसेट मत छेड़ना।' और सुबह जब मैंने पूछा, तो उन्होंने कहा कि कुछ नहीं, बुखार में बकवास कर रहे थे।"
"तुमने यक़ीन किया?"
"मैंने यक़ीन करने का नाटक किया," माँ ने कहा। "क्योंकि उस वक़्त मुझे लगा कि अगर मैं न करूँ, तो वो और अंदर चले जाएंगे। और ऐसे आदमी को अंदर जाने से रोकना होता है, बाहर खींचना नहीं।"
मैंने आँखें बंद कर लीं।
"मैं डरता हूँ, माँ," मैंने कहा।
माँ ने मेरा हाथ पकड़ा।
"मैं भी," उन्होंने कहा। "पर डर को काम करने देना और कुछ है, और डर के आगे झुक जाना कुछ और। हम पहला करेंगे।"
तभी पीछे के कमरे के दरवाज़े के नीचे से एक पतली रोशनी दिखी। पापा ने अंदर बत्ती जलाई थी।
मीरा ने कैमरे को नीचे किया।
"क्या कर रहे हैं वो?" उसने फुसफुसाकर पूछा।
"पता नहीं," मैंने कहा।
अंदर से आवाज़ आई — किसी चीज़ को खोलने की। ज़ंग लगी चीज़ को खोलने की। फिर कुछ टकराया। फिर कुछ खिसका।
मैंने घंटी निकाली।
"कुछ बोल," मैंने फुसफुसाकर कहा।
घंटी ने बहुत धीमे से कहा, "कैसेट खुल रही है।"
मेरी साँस रुक गई।
"वो अकेले सुन रहे हैं?"
"नहीं," घंटी ने कहा। "पर तेरी माँ बाहर है। और वो अंदर। दोनों एक ही आवाज़ सुनने की तैयारी कर रहे हैं।"
मैं उठा। माँ ने मेरा हाथ नहीं छोड़ा।
"बैठ," उन्होंने कहा।
"पर माँ —"
"बैठ, अंकुश।"
मैं बैठ गया।
और फिर माँ ने एक बात कही जो मुझे आज तक याद है।
"जब कोई आदमी पच्चीस साल बाद अपना सबसे बड़ा डर खुद सुनने बैठता है," उन्होंने कहा, "तो उसके पास कोई नहीं होना चाहिए। न कोई सहारा, न कोई तारीफ़, न कोई माफ़ी। सिर्फ़ वो। क्योंकि डर से लड़ाई अकेले लड़नी पड़ती है। बाकी सब बाद में।"
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