The Mysterious Bell – Chapter 683
"जब से सूरज पीपल की डाल से ऊपर आया," चिंटू ने कहा। "मैंने गिना था।"
"तूने क्या नहीं गिना," गुड्डू ने कहा।
"मैंने गिना था, बोलना क्या है।"
टिंकू ने उन्हें चुप कराया।
"सुनो। सबको एक-एक काम। सानिया — तू नाप ले।"
"क्या नापूँ?"
"उस आदमी का कद।"
सानिया ने सोचा।
"पहले कद नापो, फिर चप्पल का साइज़," उसने कहा। "क्योंकि आदमी कद से पहचाना जाता है, पर भागता चप्पल से है।"
"ये स्कूल में नहीं पढ़ाया जाता," रफ़ीक़ ने कहा।
"तो?" सानिया ने कहा। "जासूसी में पढ़ाया जाता है।"
टिंकू ने सिर हिलाया। "ठीक है। सानिया — कद और चप्पल। गुड्डू और रफ़ीक़ — दुकान के पीछे जाओ। जहाँ कल राख मिली थी, वहाँ कुछ और देखो। मिट्टी देखो। पैर के निशान देखो। कुछ भी।"
"और मैं?" चिंटू ने पूछा।
"तू — खिड़कियाँ।"
"खिड़कियाँ?"
"अबे, जो आदमी खिड़की से झाँककर गया था ना रात में — उसकी कोई निशानी मिले तो ले आना। कुछ भी। धागा, काग़ज़, मिट्टी, कुछ भी। पर बिना पहचान कुछ नहीं।"
चिंटू ने रिम कंधे पर रखी और सीना फुलाकर खड़ा हो गया।
"समझ गया।"
"और हाँ," टिंकू ने कहा, "याद रखना — अगर वो आदमी हिले तो भागना नहीं। सीटी बजाना।"
"सीटी किसके पास है?" मैंने पूछा।
टिंकू ने जेब से एक पुरानी पीतल की सीटी निकाली।
"मेरे पास," उसने कहा। "पर ये सिर्फ़ सबसे बड़े खतरे के लिए। छोटी चीज़ के लिए नहीं।"
"और छोटी चीज़ के लिए?"
"आँख।" टिंकू ने अपनी आँखों की तरफ़ इशारा किया। "सिर्फ़ आँख।"
मैं उन्हें देख रहा था और अंदर से मुस्कुरा रहा था। ये बच्चे। इनके पास कुछ नहीं था — ना कैमरा, ना काग़ज़, ना ताक़त। बस आँखें थीं। और आज सुबह, शायद उन आँखों की ज़रूरत सबसे ज़्यादा थी।
"जाओ," मैंने कहा।
वो चल पड़े। टिंकू सबसे पीछे, दुपट्टा हवा में उड़ता हुआ।
और मैं दुकान के पास खड़ा रह गया। शटर के नीचे से अंदर झाँका। अंदर कुछ नहीं हिल रहा था। पर पापा की साँस की आवाज़ आ रही थी। धीमी। मैंने आँखें बंद कर लीं।
"पापा," मैंने धीरे से कहा, "मैं बाहर हूँ। दरवाज़े पर।"
अंदर से कोई जवाब नहीं आया।
पर कुछ पल बाद दरवाज़े के नीचे से काग़ज़ का एक कोना सरका। मैंने उसे उठाया। आधा जला काग़ज़ था। ऊपर सिर्फ़ एक लाइन बची थी — "मैंने नहीं जलाया।"
मैंने वो काग़ज़ दोनों हाथों में पकड़ा और देर तक देखता रहा।
सुबह के दस बजे मीरा लौटी।
वो सीधी मेरे पास आई। उसके चेहरे पर पसीना था और हाथ में कैमरा ऐसे पकड़ा था जैसे किसी चीज़ पर क़ब्ज़ा कर रही हो।
"वो आदमी," उसने कहा, "अजीब है।"
"कैसे?"
"दुकान पर नहीं आया। किसी से नहीं बोला। बस प्लॉट के पास खड़ा रहा। फिर उसने ज़मीन नापने वाले फीते जैसी कोई चीज़ निकाली — पीली धातु की — और एक कोना नापा।"
"कौन सा कोना?"
"वही जहाँ कल राख मिली थी।"
मैं चुप हो गया।
"और फिर?" मैंने पूछा।
"फिर उसने घड़ी देखी। फिर अपनी कलाई पर बँधा कुछ ठीक किया — कोई धागा या पट्टा — और चला गया।"
"किधर?"
"गली के मुँह की तरफ़। फिर वो सफ़ेद गाड़ी के पास खड़ा हो गया, पर बैठा नहीं।"
"क्या कर रहा है?"
"इंतज़ार।" मीरा ने कैमरा नीचे किया। "अंकुश, वो इंतज़ार नहीं कर रहा। वो गिन रहा है।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"सात बजे," मैंने कहा।
"हाँ," मीरा ने कहा। "और उससे पहले वो कुछ और गिन रहा है।"
"क्या?"
"पता नहीं। पर मैंने उसे तीन बार अपनी उँगलियाँ उठाते देखा। तीन बार। जैसे कोई तीन चीज़ें गिन रहा हो।"
मैंने सोचा। तीन। तीन क्या? तीन बत्तियाँ? नहीं, वो हमारे पास थीं। तीन दरवाज़े? तीन दिन?
"और एक बात," मीरा ने कहा। "जब मैं वहाँ से हट रही थी, तब मैंने उसे बहुत धीरे बोलते सुना। मुझे पूरा नहीं सुनाई दिया। पर एक शब्द था — 'अभी'।"
"अभी?"
"हाँ। जैसे — अभी या कभी नहीं।"
मैंने गहरी साँस ली।
तभी गुड्डू और रफ़ीक़ दौड़ते हुए आए। दोनों की साँस फूली हुई थी। गुड्डू के हाथ में एक टूटी डंडी थी और रफ़ीक़ के माथे पर पसीने की लकीरें।
"उस्ताद!" गुड्डू ने कहा। "उस्ताद, हमने देखा!"
"पहले साँस ले," मैंने कहा।
"नहीं, नहीं, देखो —" गुड्डू ने वो डंडी मेरी तरफ़ बढ़ाई। "ये किसी लकड़ी की चीज़ का हिस्सा है।"
मैंने उसे लिया। हल्की। चिकनी। पुरानी। जैसे किसी लकड़ी के जूते से टूटी हो।
"कहाँ मिली?"
"दुकान के पीछे," रफ़ीक़ ने कहा। "वहाँ जहाँ कल राख मिली थी। पर उस्ताद —" उसने आँखें बड़ी कीं, "मिट्टी पर पैरों के निशान थे।"
"कैसे निशान?"
"बड़े," गुड्डू ने कहा। "चौड़े। जैसे लकड़ी के जूते के हों।"
मैं उठकर खड़ा हो गया।
"देखने ले चलो।"
हम दुकान के पीछे गए। वहाँ ज़मीन कच्ची थी। पिछले दिन शायद हल्की बारिश हुई थी — मुझे याद नहीं था, पर मिट्टी सख़्त हो चुकी थी और उस पर निशान बने हुए थे।
धुँधले। बहुत धुँधले। जैसे पानी से भर गए हों, फिर धूप में सूख गए हों और अब बस उनकी आकृति बची हो।
लकड़ी के जूतों जैसे निशान।
"यहाँ," गुड्डू ने कहा और एक निशान की तरफ़ इशारा किया। "ये बड़ा है।"
"और ये बच्चों का नहीं है," रफ़ीक़ ने कहा। "क्योंकि बच्चा इतना बड़ा क़दम नहीं रखता।"
मैंने निशानों को देखा।
"बारिश ने धुँधला कर दिया," मैंने कहा।
"हाँ," रफ़ीक़ ने कहा। "पर अगर बारिश न होती, तो ये निशान साफ़ होते।"
"तो?"
"तो इसका मतलब जो आया था, वो बारिश से पहले आया था। बारिश कब हुई?"
मैंने सोचा। मुझे याद आया। रात दो बजे के आसपास कुछ बूँदें गिरी थीं। मैं दुकान के बाहर बैठा था और मैंने छत पर एक-दो बूँदें सुनी थीं।
"रात दो बजे," मैंने कहा।
"तो वो दो बजे से पहले आया था," रफ़ीक़ ने कहा।
"तीन बजे," गुड्डू ने कहा।
"कैसे पता?"
"क्योंकि टिंकू ने रात में देखा था — उस वक़्त घड़ी में क्या था, मुझे नहीं पता। पर उसने कहा था कि वो आदमी हँसकर गया था।"
मैंने रफ़ीक़ की तरफ़ देखा। वो गर्व से खड़ा था। उसका टूटा चश्मा उसकी आँख पर टेढ़ा था, पर उसकी बात ठीक थी।
"ठीक है।" मैंने कहा। "अब मुझे एक बात बताओ।"
"पूछो," रफ़ीक़ ने कहा।
"ये निशान कितने हैं?"
गुड्डू ने गिनना शुरू किया। "एक, दो, तीन — नहीं, ये चार।"
"चार निशान," रफ़ीक़ ने कहा। "पर दो जोड़े हैं।"
"मतलब?"
"मतलब दो आदमी आए थे," रफ़ीक़ ने कहा। "एक के पैर बड़े थे, एक के छोटे। और दोनों लकड़ी के जूते पहने थे।"
मैं कुछ देर चुप खड़ा रहा।
दो आदमी। लकड़ी के जूते। रात दो बजे से पहले।
"अच्छा काम," मैंने कहा। "अब जाओ — टिंकू को बताओ।"
दोनों भाग गए।
मैं अकेला खड़ा रहा और उन निशानों को देखता रहा।
दो आदमी।
एक घर में दाख़िल हुआ। एक बाहर रुका। जिसने कैसेट रखी, वो अंदर गया। जिसने राख मली, वो बाहर रहा।
मैंने जेब में हाथ डाला। घंटी ठंडी थी। एकदम ठंडी।
"कुछ बोल," मैंने धीरे से कहा।
घंटी ने बजकर नहीं, बस हिलकर कहा —
"घर में जो आया था, वो घर का नहीं था। घर वाला बाहर खड़ा था।"
मेरी रीढ़ ठंडी हो गई।
"क्या मतलब?"
पर घंटी चुप हो गई।
तभी चिंटू की आवाज़ आई।
"उस्ताद! उस्ताद!"
वो दौड़ता हुआ आ रहा था। रिम फेंक दी थी कहीं, दोनों हाथ आगे किए हुए।
"मिला! मिला!"
उसके हाथ में कुछ सफ़ेद था।
"क्या है?"
"खिड़की की कुंडी पर बँधा था," उसने कहा। "पीछे वाली खिड़की। वो वाली जो कमरे से बाहर दिखती है।"
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