The Mysterious Bell – Chapter 678
मीरा ने मेरी आँखें पढ़ लीं।
बिना कुछ कहे हम दोनों दुकान की तरफ़ भागे।
॥
टिंकू की आवाज़ में जो डर था, वो मुझे गली के मोड़ तक पीछे-पीछे आ रहा था। दौड़ते वक़्त मेरे फेफड़ों में जो हवा भर रही थी, वो ठंडी थी और उसमें पीपल के पत्तों की गंध थी। सुबह की हल्की रोशनी अभी आसमान के किनारे पर सिर्फ़ एक पतली लकीर बनकर उभरी थी, जैसे किसी ने आसमान पर पेंसिल से हल्की लाइन खींच दी हो।
गली में कोई नहीं था। थाने के बाहर दुबे अंकल की कुर्सी खाली थी। शबनम आपा की गुमटी का शटर आधा गिरा हुआ था और उसके पीछे से एक पीली, थकी हुई रोशनी आ रही थी — जैसे कोई रात भर जागा हो और अब भी बंद न कर पाया हो।
मैं दुकान के पास पहुँचा तो सबसे पहले शटर देखा।
आधा खुला था। बस एक हाथ भर। इतना कि कोई झुककर अंदर जा सके, खड़ा होकर नहीं। नीचे की ज़मीन पर शटर की धूल में दो पतले निशान बने थे — जूतों के, पर धुँधले, जैसे किसी ने खींचकर पोंछ दिए हों।
टिंकू शटर के बगल में दीवार से चिपका खड़ा था। उसके हाथ में मेरी पुरानी रिंच थी, पकड़ इतनी कसी हुई कि उसकी उँगलियाँ सफ़ेद पड़ गई थीं। चेहरा पसीने से चिपचिपा था, आँखें बड़ी, और घुटने पर बँधी पट्टी उसने कसकर बाँधी हुई थी।
"उस्ताद," उसने धीरे से कहा, "मैंने अंदर नहीं झाँका।"
"क्यों नहीं झाँका?"
"क्योंकि आपने कहा था — अकेले किसी बंद जगह के अंदर नहीं घुसना। अगर अंदर कोई है तो बाहर से नाम लेना।"
मैंने उसके सिर पर हाथ रखा।
"अच्छा किया," मैंने कहा। "धमाका करके अंदर घुस जाता तो आज मुझे तेरी माँ को हिसाब देना पड़ता।"
टिंकू ने मुश्किल से मुस्कुराने की कोशिश की।
मीरा पीछे आई। उसका कैमरा पहले से चालू था — लाल बत्ती जल रही थी, जैसे आज सुबह वो भी जल्दी उठकर तैयार आई हो।
सानिया दौड़कर आई। चिंटू उसके पीछे, और गुड्डू तथा रफ़ीक़ सबसे पीछे। रफ़ीक़ के टूटे चश्मे में एक काँच अब भी गायब था। चिंटू की चप्पल उसके हाथ में थी, क्योंकि आवाज़ न हो इसके लिए वो दौड़ते वक़्त चप्पल हाथ में ले आया था।
"अंदर कुछ है?" सानिया ने फुसफुसाकर पूछा।
"चुप रहो," मैंने कहा।
मैं शटर के नीचे झुका और घुटनों के बल बैठ गया। अंदर देखा।
दुकान वैसी ही थी जैसी रात छोड़ी थी। दीवार पर टँगे औज़ार, ट्यूब, पंचर वाला टब, लोहे की स्टैंड पर साइकिल का पहिया। गल्ला वहीं था — मेज़ पर, चारों कोनों पर पत्थर रखे हुए। कोई उसे उठाकर पलटा भी नहीं था।
पर जो चीज़ मेरी नज़र में आई, वो मेरी छाती के अंदर एक ठंडी सुई की तरह घुसी।
मेज़ के पीछे, दीवार से सटा पापा का पुराना औज़ारदान खुला पड़ा था। वो लोहे का लंबा बक्सा, जिसका ताला कभी मैंने खुलते नहीं देखा था। पापा उसे बहुत पहले — मेरे स्कूल के ज़माने में — मरम्मत के औज़ारों के नीचे ढककर रखते थे। उसका ढक्कन उलटा ज़मीन पर रखा था और अंदर का सामान बिखरा था।
औज़ार।
पुराने औज़ार।
…जिनमें से कुछ मैंने ज़िंदगी में पहली बार देखे।
"टिंकू," मैंने धीरे से कहा, "शटर खोलो — पूरा।"
टिंकू ने शटर ऊपर उठाया। आवाज़ बहुत तेज़ थी — लोहे की चर्चराहट गली में फैल गई। शबनम आपा की गुमटी से सिर उभरा, फिर बंसीलाल की सूखी खाँसी आई।
मैं अंदर घुसा और घुटनों के बल औज़ारदान के पास बैठ गया।
सब कुछ गिनती का था।
मेरी रिंचें, मेरे पेचकस, मेरी चेन, मेरी रेती, मेरी हथौड़ी। पंचर वाला डिब्बा वहीं। गल्ले में जो पैसे थे, सब जैसे थे — कुछ नहीं गया।
"कुछ चोरी नहीं हुआ," मीरा ने कहा, पीछे से झाँकते हुए।
"नहीं हुआ," मैंने कहा।
"तो फिर शटर क्यों खुला था?"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"क्योंकि उसे चोरी नहीं करनी थी," मैंने कहा। "उसे कुछ ढूँढना था।"
मैंने औज़ारदान के अंदर हाथ डाला।
नीचे, सब औज़ारों के तले, एक मैला-सा कपड़ा था — कभी सफ़ेद रहा होगा, अब पीले-भूरे धब्बों वाला। उसके ऊपर पुराना रेडियो वाला तेल, ज़ंग का बुरादा और सूखी धूल की एक परत जमी थी। पर उँगली से छूने पर मुझे समझ आया — यह परत कुछ घंटे पहले टूटी थी। किसी ने इसे उठाया था, फिर जैसे-तैसे वापस रख दिया था।
मैंने कपड़ा उठाया।
नीचे दो चीज़ें थीं।
एक — एक पुरानी ऑडियो कैसेट। काले प्लास्टिक का चौकोर टुकड़ा, दोनों गोल छेदों के बीच धूल, और कैसेट के ऊपर लिपटी पुरानी सफ़ेद पट्टी पर किसी की हैंडराइटिंग — नीली स्याही से, काँपती हुई लकीरों में।
वो नीली स्याही।
मेरे हाथ काँपे।
दूसरी चीज़ — एक आधी जली रसीद। पीला काग़ज़, बीच से जलकर भूरा हो चुका, किनारे कुरकुरे। ऊपर जो बचा था उसमें सिर्फ़ एक टूटी सी लाइन और एक हल्की नीली गोल मोहर दिख रही थी — वैसी ही, जैसी भारद्वाज कंस्ट्रक्शन की मोहर थी।
मैंने दोनों चीज़ें उठाईं।
टिंकू पीछे से आया और उसने धीरे से कहा, "उस्ताद, वो आदमी — सफ़ेद कुर्ते वाला।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"कौन सा आदमी?"
"रात को," टिंकू ने कहा। "जब मैं यहाँ पहरा दे रहा था। गली के मोड़ से वो आया — धीरे-धीरे चल रहा था, जैसे कोई मंदिर में घुस रहा हो। सफ़ेद कुर्ता, सफ़ेद जूते। चेहरा नहीं दिखा। दो बार यहाँ रुका, फिर खिड़की के पास झुककर अंदर देखने लगा। मैंने सीटी बजाने के लिए मुँह में उँगली रखी — पर तभी वो मुड़कर मेरी तरफ़ देखा।"
"तुझे देखा?"
"नहीं," टिंकू ने कहा। "मुझे नहीं। मेरी तरफ़। मतलब — मेरी तरफ़ देखा, पर जैसे वो पहले से जानता हो कि मैं कहाँ छिपा हूँ। फिर हँसा। फिर चला गया।"
"हँसा कैसे?"
टिंकू ने कुछ सोचा।
"ऐसे," उसने कहा, "जैसे कोई हिसाब करके जाता हो।"
मीरा ने कैमरा हाथ में लिया और सीधी खड़ी हो गई।
"अंकुश," उसने कहा, "सफ़ेद कुर्ता, सफ़ेद जूते। ये चंद्रेश के आदमियों का पहनावा है। मुझे यह भी याद है — उस रात मोटा आदमी, फिर स्कूल के गेट पर सफ़ेद कुर्ते वाला। दोनों। अलग-अलग समय, एक ही कपड़ा। ये चंद्रेश ही है।"
मैंने कैसेट को उँगलियों में घुमाया।
"मीरा," मैंने धीरे से कहा, "चंद्रेश वकील है। वो चोरी नहीं करता, काग़ज़ करता है।"
"तो?"
"तो ये काग़ज़ का काम नहीं है," मैंने कहा। "यह कुछ और है।"
मैं आधी जली रसीद को रोशनी की तरफ़ उठाकर देखने लगा। जो बचा था उस पर सिर्फ़ दो शब्द बन रहे थे — बाक़ी सब जल गया था। और एक तारीख़ का आख़िरी अंक।
मैं अभी उसे ठीक से पढ़ने की कोशिश कर ही रहा था कि गली में पापा की चप्पलों की आवाज़ आई।
धीमी। भारी। जैसे कोई बहुत तेज़ चलने की कोशिश कर रहा हो पर टाँगें साथ न दे रही हों।
वो दुकान के सामने पहुँचे, शटर खुला देखा, मेरे हाथ में औज़ारदान देखा — और रुक गए।
उनका चेहरा उस पल ऐसे पीला पड़ा जैसे कोई काग़ज़ की शीट पानी में गिर गई हो। चश्मा, जो टेप से कान पर बँधा था, नाक की नोक तक फिसल आया। उन्होंने उसे ठीक करने की कोशिश भी नहीं की।
"पापा," मैंने कहा, "कुछ चोरी नहीं —"
वो अंदर आए। मेरे पास आए, झुके, और उनकी नज़र औज़ारदान पर पड़ी।
उन्होंने कुछ नहीं कहा।
बस घुटने के बल बैठ गए।
हाथ अंदर डाला।
मैंने उन्हें इतना बूढ़ा कभी नहीं देखा था। उनकी टहनी जैसी कलाई उस बक्से के अंदर डूबी और जब वो बाहर आई तो उनका पूरा शरीर एक झटके में काँप गया।
"बोलो पापा," मैंने कहा। "क्या ढूँढ रहे हो? ये क्या है?"
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