The Mysterious Bell677 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 677

6 min read November 5, 2026

"ठीक है," मैंने कहा। "आज रात तुम पाँचों मेरे आस-पास रहोगे। एक कदम भी अलग नहीं।"

"उस्ताद," चिंटू ने कहा। "हम तो जासूस हैं। बच्चे नहीं।"

"जासूस भी मरते हैं," मैंने कहा। "और मैंने तुम्हारी माँ को वादा किया है कि ये जासूसी स्कूल बंद होने से पहले खत्म होगी। समझे?"

"समझे," सबने एक साथ कहा। यहाँ तक कि गुड्डू ने भी।

मैंने दीया उठाया।

लौ मेरी उँगलियों के पास आई और फिर भी नहीं बुझी।

"घंटी," मैंने धीमे से कहा। "कुछ बता।"

घंटी जेब में थी। ठंडी।

मैंने उसे निकाला।

हथेली पर रखा।

एक पल कुछ नहीं हुआ।

फिर घंटी बोली — बहुत धीमे, इतना धीमे कि जैसे मेरे ही अंदर से कोई आवाज़ आ रही हो।

"चोर नहीं आया," उसने कहा।

मैं ठिठका।

"ढूँढने वाला आया," घंटी ने कहा।

मीरा ने कैमरा थोड़ा नीचे किया, जैसे घंटी की आवाज़ रिकॉर्ड करनी हो।

"क्या ढूँढ रहा था?" मैंने पूछा।

"जो उसे मिला नहीं," घंटी ने कहा। "पर वो जानता है कि वो कहाँ है।"

"कौन सी चीज़?"

"नाम," घंटी ने कहा।

"किसका नाम?"

"तुम्हारे घर का नाम," घंटी ने कहा। "सिर्फ़ दरवाज़े पर लिखा नहीं। अंदर, किसी चीज़ पर लिखा हुआ।"

मैंने चारों तरफ़ देखा।

"कहाँ?"

घंटी चुप हो गई।

"घंटी —"

"मैंने कहा था," उसने कहा, "उसे खोलने के लिए हिम्मत चाहिए।"

"ये दरवाज़ा —"

"ये दरवाज़ा और वो दरवाज़ा, अंकुश," घंटी ने कहा, "एक ही ताले से बंद हैं।"

और फिर वो चुप हो गई, और इस बार ऐसी चुप कि मुझे लगा वो बोलने के लिए नहीं, मुझे सोचने के लिए चुप हुई है।

मैंने घंटी जेब में रखी।

मैंने दीया पीछे वाले दरवाज़े के सामने ही रख दिया — बुझाकर नहीं, जलता हुआ। जो जलाया था उसने, वो जलता रहे। अगर वो लौटेगा, तो देखेगा कि हमने उसकी लौ नहीं बुझाई — हमने बस वहाँ से अपना हिसाब लिया।

फिर मेरा फोन बजा।

काजल का नाम।

मैंने उठाया।

"अंकुश?" काजल की आवाज़ आई। धीमी, थोड़ी हाँफती।

"हाँ," मैंने कहा। "बोल। माँ?"

"माँ ठीक हैं," काजल ने कहा। "सुरक्षित हैं। बुखार नहीं, दर्द नहीं। पर —"

"पर?"

"वो सो नहीं रहीं," काजल ने कहा। "आधी रात से करवट बदल रही हैं। डॉक्टर इसरानी आए थे, उन्होंने कहा कि घबराने की बात नहीं। पर माँ बार-बार कुछ बुदबुदा रही हैं।"

मैंने आँखें बंद कीं।

"क्या?"

"एक पुरानी कैसेट का नाम ले रही हैं," काजल ने कहा। "मैंने पूछा, माँ कौन सी कैसेट, तो उन्होंने आँखें खोलीं और सिर्फ़ इतना कहा — 'वो कैसेट, जिस पर नीली स्याही से नाम लिखा है।'"

"कौन सा नाम?"

काजल कुछ देर चुप रही।

"मुझे ठीक से समझ नहीं आया," उसने कहा। "पर एक बार उन्होंने ज़ोर से कहा — शंकरलाल।"

मेरे हाथ से घंटी फिसल गई।

मैंने उसे हवा में पकड़ा, फिर हथेली पर रखा।

"शंकरलाल?" मैंने दोहराया।

"हाँ," काजल ने कहा। "फिर वो चुप हो गईं। जैसे कहकर डर गई हों। अंकुश — शंकरलाल कौन है?"

मैंने मीरा की तरफ़ देखा।

मीरा ने सिर हिलाया — उसे भी नहीं पता था।

"पता नहीं," मैंने कहा। "पर पड़ताल करूँगा। तू माँ के पास रह। कुछ भी हो — माँ को अकेला मत छोड़ना।"

"तू कहाँ है?"

"घर में," मैंने कहा।

"घर में?" उसकी आवाज़ तेज़ हुई। "अंकुश, इस वक़्त —"

"काजल," मैंने कहा। "मैं ठीक हूँ। बच्चे साथ हैं। मीरा साथ है।"

"पर घंटी ने कहा था —"

"घंटी ने कहा था कि घर की बारी है," मैंने कहा। "और मैं घर में हूँ।"

काजल कुछ देर चुप रही।

फिर बोली, "अंकुश, वो कैसेट वाली बात — मुझे अच्छी नहीं लग रही। माँ ने पहले कभी ऐसा नहीं किया।"

"माँ ने पहले कभी ऐसी रात नहीं देखी," मैंने कहा।

"मुझे डर लग रहा है।"

"मुझे भी," मैंने कहा। "पर मैं डर के साथ भी काम करता हूँ। तू भी कर।"

"क्या करूँ?"

"माँ के पास बैठ," मैंने कहा। "और उनका हाथ पकड़े रह। अगर वो फिर कुछ बोलें, तो सब याद रखना। हर शब्द। भले ही बेमतलब लगे।"

"ठीक है," काजल ने कहा।

"और काजल —"

"हाँ?"

"अगर माँ कहे कि कुछ लेने जाना है, तो मत जाना। जो वो कहें, मुझे बताना। मैं आकर लाऊँगा।"

"ठीक है।"

फोन कटा।

मैंने फोन जेब में रखा।

मीरा ने मेरी तरफ़ देखा।

"शंकरलाल," उसने धीमे से कहा।

"हाँ।"

"अंकुश, ये नाम —"

"पेचकस के हत्थे में था," मैंने कहा। "उस्ताद ने खोला था, याद है? काग़ज़ में शंकरलाल लिखा था। दादा जगदीश यादव का बड़ा भाई।"

मीरा की आँखें बड़ी हुईं।

"तो माँ उसका नाम क्यों ले रही हैं?"

"यही तो," मैंने कहा। "और वो भी कैसेट के साथ। यानी घर में कोई पुरानी कैसेट है। और उस पर शंकरलाल का नाम लिखा है।"

"क्या तूने कभी देखी?"

"नहीं," मैंने कहा। "पर माँ की आवाज़ में डर था। और माँ को डर कम ही लगता है।"

मैंने सानिया की तरफ़ देखा।

"सानिया, तुम पाँचों अब भी घर छानो। पर इस बार एक चीज़ ढूँढो — कैसेट। पुरानी कैसेट। ऑडियो वाली।"

"कैसेट?" चिंटू ने कहा। "वो तो पुराने ज़माने की चीज़ है।"

"हाँ," मैंने कहा। "और इस घर में सब कुछ पुराने ज़माने का है। इसीलिए तो हम आज भी यहाँ रहते हैं।"

सानिया हँसी।

फिर गंभीर हो गई।

"उस्ताद," उसने कहा। "अगर कैसेट नहीं मिली तो?"

"तो मिलेगी," मैंने कहा। "तुम्हारे हाथ में।"

मैं बाहर निकला।

दरवाज़े पर खड़े होकर मैंने अपनी जेब से ताला निकाला — वही पुराना ताला जो हमारे घर पर हमेशा लगता था, जो सुबह से रात तक बाहर लटकता रहता था।

मैंने ताला लगाया।

चाबी घुमाई।

क्लिक।

आवाज़ आई — छोटी सी, साधारण सी।

और फिर मुझे लगा कि उस एक आवाज़ में कुछ और भी था। जैसे सालों से कोई चीज़ बंद थी और अब बंद होकर उसने चैन की साँस ली हो।

मैंने ताला हिलाकर देखा।

पक्का था।

मैंने मीरा की तरफ़ देखा।

"तैयार है?"

"किस लिए?"

"गली में जाने के लिए," मैंने कहा। "अभी तो सिर्फ़ घर देखा है। असली बात गली में है।"

मीरा ने कैमरा ऊपर किया।

"अंकुश," उसने कहा। "एक बात कहूँ?"

"कह।"

"तूने दरवाज़ा बंद कर दिया," उसने कहा। "पर अंदर दीया जलता छोड़ आया।"

"हाँ।"

"क्यों?"

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

"क्योंकि अगर वो लौटा," मैंने कहा, "तो उसे पता चलना चाहिए कि हमने उसका दीया नहीं बुझाया। हमने बस उसका घर बंद कर दिया।"

मीरा कुछ नहीं बोली।

हम गली की तरफ़ चल पड़े।

सानिया आगे, बच्चे बीच में, मीरा पीछे।

गली में धीमी हवा चल रही थी। पीपल के पत्ते सरसरा रहे थे। थाने के बाहर दुबे अंकल की कुर्सी खाली थी। शबनम आपा की गुमटी का शटर आधा गिरा था, पर उसके पीछे से हल्की रोशनी आ रही थी — काजल के लिए नहीं, बस उसने बंद नहीं किया था।

और मैंने दुकान की तरफ़ देखा।

मेरी दुकान।

पीपल के पास, टेढ़े बोर्ड वाली।

शटर बंद था।

मुझे सुकून मिला।

मैंने मीरा से कहा, "देखा, सब ठीक —"

और तभी मेरा फोन बजा।

टिंकू।

मैंने उठाया।

पहले उसकी साँस सुनी। हाँफती हुई। जैसे वो दौड़कर आया हो या दौड़ने से रुका हो।

"उस्ताद," उसने कहा।

और उसकी आवाज़ में वो डर था जो मैंने उसमें पहले कभी नहीं सुना था — उस दिन भी नहीं जब उसने अपने पापा की कमीज़ पहली बार पहनी थी।

"उस्ताद," उसने फिर कहा, "दुकान का ताला खुला है।"

मैं रुक गया।

"क्या?"

"ताला खुला है," उसने दोहराया। "और अंदर से कोई काग़ज़ खुरच रहा है।"

मैंने मीरा की तरफ़ देखा।

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