The Mysterious Bell – Chapter 679
औज़ारदान के अंदर से उन्होंने धीरे से कुछ निकाला और मेरी तरफ़ नहीं, सामने दीवार की तरफ़ देखने लगे।
"औज़ारदान खुला था," उन्होंने कहा। आवाज़ बहुत धीमी थी। "इसका ढक्कन। मैंने खुद बंद किया था।"
"हाँ," मैंने कहा। "किसी ने खोला।"
पापा ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें अब पीली नहीं थीं, वो खून से लाल हो चुकी थीं।
"अंकुश," उन्होंने कहा, "तूने उससे कुछ निकाला?"
"हाँ," मैंने कहा। "ये।"
मैंने अपनी हथेली खोली।
कैसेट।
और आधी जली रसीद।
पापा की आँखें उस कैसेट पर पड़ीं और फिर जो हुआ—
मैंने पापा को उससे पहले कभी नहीं देखा था। उन्होंने झपटकर कैसेट मेरी हथेली से छीन ली। इस तेज़ी से कि मेरे हाथ पर उनके नाखूनों की खरोंच लग गई। मैं पीछे हटा।
"पापा —"
"ये तूने कहाँ से निकाला?" उनकी आवाज़ भारी थी। ऊपर उठी हुई। इतनी ऊँची कि दुकान के बाहर खड़ी सानिया भी काँप गई।
"औज़ारदान से —"
"किसने कहा था इसे छूने को?"
"पापा, मैं —"
"किसने कहा था, अंकुश?"
और मैं चुप हो गया।
क्योंकि मैंने पापा को पहली बार मुझ पर इतना गुस्सा करते देखा था। और दिलचस्प बात यह थी — वो गुस्सा मुझ पर था, पर आँखों में जो डर था, वो मुझसे नहीं, उस कैसेट से था।
मीरा आगे बढ़ी।
"शंकर भाई," उसने कहा, "शांत हो जाइए —"
"तू दूर रह," पापा ने कहा, और मीरा रुक गई।
पापा ने कैसेट को दोनों हाथों में पकड़ा। काँपती उँगलियों से उसके ऊपर की सफ़ेद पट्टी को हल्का-सा पोंछा, जैसे कोई पुरानी तस्वीर से धूल हटा रहा हो। और फिर उसे अपने सीने से लगा लिया — दोनों हाथों से, बच्चे की तरह।
दुकान में सन्नाटा था।
गली में सिर्फ़ पीपल के पत्ते सरसरा रहे थे। शबनम आपा की गुमटी से चूल्हे के जलने की कड़कड़ सुनाई दे रही थी, जैसे वो बाहर कुछ सुन ही नहीं रही हों।
टिंकू ने मेरी कमीज़ पकड़ी।
"उस्ताद," उसने फुसफुसाया, "पापा रो रहे हैं?"
रो नहीं रहे थे।
उनकी आँखें सूखी थीं। पर उनका चेहरा उतना ही टूटा हुआ था जितना वो पचास साल की चुप्पी में छुपाकर रखते आए थे।
उन्होंने कैसेट को सीने से नहीं हटाया। आँखें बंद कर लीं।
"शंकरलाल," उन्होंने धीरे से कहा।
मेरी छाती में कुछ जम गया।
"पापा?"
"शंकरलाल," उन्होंने दोहराया। "मेरे ताऊ। जगदीश यादव के बड़े भाई। जो पचास साल पहले उस रात गायब हुए जिस रात साझी दुकान जली थी।"
"मैं जानता हूँ, पापा — माँ ने रात को नाम लिया था।"
पापा ने आँखें खोलीं और पहली बार मेरी तरफ़ सीधे देखा।
"माँ ने नाम लिया?"
"हाँ," मैंने कहा। "रात भर बुदबुदा रही थीं। कैसेट का नाम लिया, और एक बार ज़ोर से शंकरलाल चिल्ला दिया।"
पापा ने कैसेट को और कसकर पकड़ लिया।
"तो माँ को भी पता है कि ये कैसेट क्या है," मैंने कहा। "और तुम दोनों ने मुझसे छिपाकर रखी है। पचास साल से।"
"चौबीस साल से," पापा ने कहा। आवाज़ इतनी धीमी कि जैसे हवा में घुल गई। "तेरी उम्र के हिसाब से। जिस दिन तू पैदा हुआ, उस दिन मैंने इसे औज़ारदान में रखा था। तब से कभी नहीं निकाला।"
"क्यों?"
"क्योंकि जो इसमें है," पापा ने कहा, "वो एक आदमी की आवाज़ है जो नहीं होना चाहिए।"
मीरा आगे आई।
"शंकर भाई," उसने कहा, आवाज़ नरम करके, "ये कैसेट अगर शंकरलाल की है, तो इसे सुनना सबसे ज़रूरी है। हमें जो भी जानकारी है आपकी मदद करेगी —"
"नहीं," पापा ने कहा।
इतनी सख़्त आवाज़ में कि मीरा फिर रुक गई।
"तुम सब चले जाओ," पापा ने कहा। "आज यहाँ कुछ नहीं होगा। दुकान बंद होगी।"
"पापा —"
"अंकुश," उन्होंने कहा, "तू अंदर आ।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"क्यों?"
"क्योंकि मैं तुझे कुछ बताने वाला हूँ," उन्होंने कहा, "और यह बात गली में नहीं कही जाएगी।"
मैं दुकान के पीछे के अपने छोटे कमरे में गया। वही कमरा — जिसमें एक चारपाई, लोहे की अलमारी, औज़ारों का ट्रंक और गुनगुनाता हुआ पुराना बल्ब है। पापा मेरे पीछे आए। उन्होंने ढक्कन जैसे ऊपर उठाया और अंदर से कुंडा चढ़ा दिया।
"पापा," मैंने कहा, "क्या कर रहे हो?"
"बैठ," उन्होंने कहा।
मैं चारपाई पर बैठ गया।
वो सामने लोहे की अलमारी की तरफ़ मुँह करके खड़े रहे। पीठ मेरी तरफ़ थी। उनके कंधे काँप रहे थे।
"तूने रात को जो पन्ना निकाला," उन्होंने कहा, "ट्रंक से। सात अंगूठों वाला। उस पर तेरा नाम नई स्याही में लिखा था।"
"हाँ।"
"तूने सोचा होगा कि वो धमकी है। कोई मुझे या तुझे डरा रहा है।"
"हाँ।"
"वो सिर्फ़ धमकी नहीं थी," पापा ने कहा। "वो एक हिसाब भी था।"
उन्होंने मुड़कर मेरी तरफ़ देखा।
"अंकुश," उन्होंने कहा, "अगर तू ये कैसेट सुन लेता, तो तू मेरी बात नहीं मानता। तू उसी रात अस्पताल में हंगामा कर देता। और अगर उस रात आग लग गई होती, तो जो कुछ हुआ, उसके लिए सबसे पहले मेरा नाम आता। क्योंकि मैं यह कैसेट पच्चीस साल से दबाए बैठा हूँ।"
"पर पापा —"
"सुन," उन्होंने कहा।
और वो मेरे सामने चारपाई की टाँग के पास घुटनों के बल बैठ गए। कैसेट अभी भी उनके हाथ में थी।
"मैं तुझे कुछ बताऊँगा," उन्होंने कहा, "पर एक शर्त पर। जब मैं बताऊँ, तू बीच में कुछ नहीं पूछेगा। न कुछ कहेगा। बिल्कुल नहीं।"
मैंने गला साफ़ किया।
"ठीक है," मैंने कहा। "पर एक बात — आज सुबह सात बजे मशीन आने वाली है। उसकी तैयारी —"
"मैं जानता हूँ," पापा ने कहा। "इसीलिए यह बात अभी हो रही है। सात बजे से पहले सब हो जाएगा।"
उन्होंने कैसेट को मेरी तरफ़ बढ़ाया।
मैंने हाथ बढ़ाया — यह सोचकर कि अब वो मुझे दे देंगे।
पर उन्होंने वापस सीने से लगा लिया।
"नहीं," उन्होंने कहा। "ये तेरे हाथ में नहीं आनी चाहिए थी।"
"तो फिर क्या —"
"आज रात," उन्होंने कहा, "मैं और माँ, दोनों मिलकर इसे सुनेंगे। अगर इसमें वो है जो मुझे डर है, तो सबके सामने सुनूँगा। उससे पहले नहीं।"
"पापा, अगर ये सच में शंकरलाल की आवाज़ है —"
"तो इसका मतलब है कि वो उस रात मरा नहीं," पापा ने कहा।
और फिर कुछ ऐसा हुआ जो मैंने कभी नहीं सोचा था।
पापा उठे, मेरे कमरे से बाहर गए, दुकान की तरफ़ बढ़े — जहाँ मीरा, टिंकू, सानिया, चिंटू, गुड्डू, रफ़ीक़ सब खड़े थे — और उन्होंने शटर पकड़कर नीचे खींच दिया।
धड़ाम।
मीरा की आवाज़ बाहर से आई।
"शंकर भाई —"
पर पापा ने बाहर जवाब नहीं दिया। वो मुड़े, मेरे कमरे की तरफ़ आए, मेरे पास से गुज़रे बिना, अंदर वाले पीछे के दरवाज़े के पास गए — वो दरवाज़ा जो बाहर की तरफ़ खुलता था, गली की तरफ़।
उन्होंने उसे अंदर से बंद किया।
कुंडा चढ़ाया।
चिटकनी लगाई।
और मैंने पहली बार अपने पापा की आवाज़ में कुछ ऐसा सुना जो मैंने पच्चीस साल में नहीं सुना था — आदेश। नरम नहीं। बाप की आवाज़, जो अब कोई बहाना नहीं सुनेगा।
"अंकुश," उन्होंने कहा, "बाहर से कोई भी आए, चाहे वो पुलिस हो, चाहे चंद्रेश हो, चाहे खुद रणवीर भारद्वाज हो — तू मेरे इस कमरे का दरवाज़ा नहीं खोलेगा। मैं अंदर से खोलूँगा, तभी खुलेगा।"
मैंने कैसेट की तरफ़ देखा।
"पापा —"
"और अगर मैं न खोलूँ," उन्होंने कहा, "तो तू माँ को बुलाना। वो जानती है इसे कैसे खोलना है।"
"पापा, तुम डरा रहे हो मुझे।"
पापा ने मुड़कर मेरी तरफ़ देखा।
और उस पल उनके चेहरे पर जो था, वो डर नहीं था।
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