The Mysterious Bell – Chapter 671
"मैं तुम्हें बताता हूँ," उन्होंने कहा।
मैं उनके सामने फर्श पर बैठ गया।
बच्चे भी पास आ गए। टिंकू मेरे बगल में बैठा। मीरा दीवार से टिककर खड़ी रही, कैमरा अभी भी चालू।
"मैं उस रात हकीम साहब के पास गया था," पापा ने कहा। "तुम्हारी माँ बीमार थी। डॉक्टर इसरानी ने कहा था कि दवा महँगी है और जल्दी चाहिए। मेरे पास पैसे नहीं थे।"
मैंने कुछ नहीं कहा।
"हकीम साहब उस ज़माने में अस्पताल के पीछे वाले कमरे में बैठते थे। रात को भी। कहते थे कि बीमारी रात नहीं देखती, तो मैं क्यों देखूँ। मैं गया। ग्यारह बजे। उनका दरवाज़ा खुला था। मैंने अंदर झाँका, तो वो वहाँ नहीं थे। मैं बाहर आया और पीछे वाली गली में गया, जहाँ उनकी दवाइयाँ रखी थीं।"
उन्होंने रुककर साँस ली।
"वहाँ पीछे कुछ जल रहा था।"
पापा की आवाज़ धीमी हो गई।
"मैंने सोचा कि कचरा जल रहा होगा। पर फिर मैंने सुना।"
"क्या सुना?"
"आवाज़ें," उन्होंने कहा। "कई आवाज़ें। कोई कह रहा था — जल्दी करो। कोई कह रहा था — सब जलाओ, एक भी न बचे। और एक आवाज़ थी जो सबसे अलग थी। वो कह रही थी — नहीं, ये मेरा है, इसे मत जलाओ।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"हकीम साहब?"
पापा ने सिर हिलाया।
"हकीम साहब की आवाज़ थी। वो किसी से गिड़गिड़ा रहे थे। मैंने कभी किसी आदमी को इतनी टूटी आवाज़ में बात करते नहीं सुना। वो कह रहे थे — बच्चों का हिसाब है, मरीज़ों का हिसाब है, ये ज़मीन का काग़ज़ है, इसे जलाओ मत। और फिर एक और आवाज़ आई।"
"किसकी?"
"मुझे नहीं पता," उन्होंने कहा। "उस आवाज़ में कोई भाव नहीं था। जैसे कोई पत्थर बोल रहा हो। उसने कहा — हकीम साहब, आप रखवाले थे। मालिक नहीं। आपकी बात का हिसाब नहीं है। और फिर…"
उनकी आवाज़ फँस गई।
"और फिर?"
"और फिर मैंने आग की आवाज़ सुनी," पापा ने कहा। "एक बड़ी आवाज़। जैसे कुछ बहुत बड़ा जल गया हो। और हकीम साहब चीखे। एक बार। बस एक बार। फिर चुप्पी।"
कमरे में सन्नाटा।
इतना सन्नाटा कि मुझे अपनी साँस भी बहुत तेज़ सुनाई दी।
"आपने देखा नहीं?" मैंने पूछा।
"मैंने झाँका," पापा ने कहा। "एक बार। सिर्फ़ एक बार। मैंने देखा कि वहाँ चार-पाँच आदमी खड़े थे। उनके बीच आग जल रही थी। काग़ज़ जल रहे थे। और एक आदमी — जो सबसे बड़ा लग रहा था — उसके हाथ में एक कॉपी थी। भूरी जिल्द वाली। वो उसे आग में डालने नहीं दे रहा था। वो उसे अपने सीने से चिपकाए खड़ा था।"
मैंने कुछ सोचा।
"काली अंगूठी?"
पापा ने मेरी तरफ़ देखा।
"तुम्हें कैसे पता?"
"रामकली दाई ने बताया," मैंने कहा।
पापा ने सिर हिलाया।
"उस आदमी के हाथ में अंगूठी थी। काली। मैंने दूर से देखी। और फिर वो मुड़ा।"
"किसकी तरफ़?"
"मेरी तरफ़," पापा ने कहा। "जैसे उसे पता था कि मैं वहाँ खड़ा हूँ। और मैं… मैं भाग आया।"
उनका शब्द — भाग आया — हवा में लटक गया।
मैं अपने घुटनों के बल वहीं बैठा रहा। मेरे हाथ ज़मीन पर थे।
कुछ देर तक किसी ने कुछ नहीं कहा।
फिर मेरे अंदर कुछ उठा।
गुस्सा।
वो गुस्सा जो मेरे पेट से उठकर सीने में फैल गया और गले तक आ गया। वो गुस्सा जो मेरे हाथों में आया।
"पापा," मैंने कहा। मेरी आवाज़ मेरी नहीं लग रही थी।
"अंकुश—"
"पापा," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ तेज़ हो गई। "आपने ये बात पंद्रह साल से किसी को नहीं बताई?"
"नहीं।"
"आपने माँ को भी नहीं बताया?"
"नहीं।"
"आपने मुझे नहीं बताया? जब मैं बड़ा हो रहा था? जब मैं दुकान पर बैठा करता था और आप चुपचाप औज़ार ठीक करते रहते थे? जब माँ बीमार थीं और हम पैसे जोड़ रहे थे?"
"अंकुश—"
"पंद्रह साल, पापा!"
मेरी आवाज़ कमरे में गूँज गई।
बच्चे चौंक गए। टिंकू ने मेरा हाथ पकड़ा। मीरा ने कैमरा थोड़ा नीचे किया।
"पंद्रह साल, आपने ये सच अंदर रखा?" मैंने कहा। "और जब रणवीर ने आपसे अंगूठा लिया, तब भी नहीं बताया? जब आप रोते हुए भवन से निकले थे, तब भी नहीं बताया?"
पापा ने मेरी तरफ़ देखा।
"तुम्हें… कैसे पता?"
"काजल ने देखा था," मैंने कहा। "उस रात। काजल ने आपको देखा था।"
पापा की आँखें भर आईं।
वो कुछ कहना चाहते थे, पर उनकी आवाज़ नहीं निकली।
मैं उठ गया।
मैं कमरे में टहलने लगा।
"आपको मुझे बताना चाहिए था," मैंने कहा। "आपको सबको बताना चाहिए था। अगर आपने उस रात बताया होता, तो रामकली दाई को अकेले नहीं लड़ना पड़ता। अगर आपने बताया होता, तो शायद हकीम साहब का काग़ज़ आज तक बचा होता। अगर—"
"अंकुश।"
मीरा की आवाज़। धीमी। पर सख़्त।
मैं रुका।
"ये पढ़," उसने कहा।
वो ट्रंक के पास झुकी हुई थी। उसके हाथ में जली परत का एक कोना था। उसने उसे धीरे से उठाया था और उसके नीचे से एक और चीज़ निकली थी।
मैं उसके पास गया।
जली परत के नीचे एक और परत थी। कम जली हुई। और उसके नीचे, ट्रंक की तली में चिपका हुआ, एक पन्ना था।
आधा पन्ना।
फटा हुआ। किनारे जले हुए। बीच से आधा। और उस पर लिखाई थी।
पीली पड़ी स्याही में।
मैंने उसे देखा।
लिखाई पुरानी थी — बहुत पुरानी। जैसे पचास साल पुरानी किसी किताब की लिखाई। स्याही फीकी पड़ गई थी, पर अक्षर बचे हुए थे।
ऊपर एक पंक्ति थी — "अस्पताल की ज़मीन। इलाज के लिए।"
नीचे कुछ नाम थे। कई नाम। एक के नीचे एक।
और उनके आगे, छोटे-छोटे पीले धब्बे — उँगलियों के निशान। पुराने अंगूठे।
मैंने उन्हें गिना।
एक। दो। तीन। चार। पाँच। छह। सात।
सात अंगूठे।
और सातवें अंगूठे के सामने, एक नाम था जिसे मैंने पहली नज़र में नहीं पहचाना। पर फिर ज़ूम करके देखा तो धूल के नीचे और अक्षर उभरे।
जगदीश यादव।
मेरे दादा का नाम।
मैंने उसे छुआ।
काग़ज़ ठंडा था।
"नीचे कुछ है," मीरा ने कहा।
पन्ने के फटे किनारे के नीचे, जहाँ काग़ज़ मुड़ा हुआ था, कुछ और था। मीरा ने उसे बहुत धीरे से खोला।
एक और लाइन दिखी।
छोटी, हाथ से लिखी, पीली स्याही में — पर इस बार स्याही नई लग रही थी। जैसे इसे पचास साल बाद किसी ने जोड़ा हो।
और उस लाइन में दो नाम थे।
शंकर यादव।
और उसके नीचे —
अंकुश यादव।
मेरा नाम।
मेरे हाथ काँपने लगे।
"ये…" मैंने धीरे से कहा। "ये नाम मेरा है।"
"और यहाँ एक और लाइन है," मीरा ने कहा।
उसने टॉर्च की रोशनी उस पर टिकाई।
और मैंने पढ़ा।
"जोड़ने वाले का घर — पहले जलेगा।"
मेरे हाथ से टॉर्च फिसल गई। वो ज़मीन पर गिरी। काँच चटका? नहीं। बस गिरी और लुढ़क गई, और उसकी रोशनी दीवार पर ऊपर-नीचे होने लगी।
कमरे में कोई नहीं बोला।
फिर मैंने देखा।
उस लाइन के नीचे कुछ और था।
राख।
राख से बना एक हाथ का निशान।
पूरा हाथ। पाँच उँगलियाँ।
ताज़ा।
और मैंने तुरंत देखा — सबसे छोटी उँगली अधूरी थी।
वही हाथ।
वही निशान जो अस्पताल की पिछली दीवार पर मिला था।
मैं ट्रंक से दो कदम पीछे हटा। मेरी साँस फूलने लगी। मेरा सिर घूमने लगा।
"घंटी," मैंने धीरे से कहा।
घंटी मेरी जेब में काँप रही थी।
"देखा?" उसने कहा। "मैंने कहा था न — काग़ज़ नहीं, बेटा टूटा है।"
"ये… ये ताज़ा है," मैंने कहा। "ये राख ताज़ा है।"
"हाँ," घंटी ने कहा। "और ये ट्रंक में नहीं थी।"
"क्या मतलब?"
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