The Mysterious Bell – Chapter 672
"सुबह जब तेरे पापा ने ट्रंक पर हाथ रखा था, तब ये यहाँ नहीं थी," घंटी ने कहा। "आज रात किसी ने ये ट्रंक खोला। कोई सामान नहीं लेने आया। कोई इस पन्ने के ऊपर राख से हाथ का निशान बनाकर गया है।"
मैंने पीछे देखा।
पापा अभी भी स्टूल पर बैठे थे। मीरा के हाथ में कैमरा था। बच्चे दीवार से सटे खड़े थे।
"तो कोई था," मैंने कहा। "आज रात कोई हमारे होते हुए भी अंदर आया।"
"नहीं," घंटी ने कहा।
"तो?"
"वो पहले से अंदर था," घंटी ने कहा। "तू बाहर गया था। पापा दरवाज़े पर थे। बच्चे शटर के नीचे झाँक रहे थे। और उस वक़्त, कुछ देर के लिए, ये कमरा खाली था।"
"कितनी देर?"
"एक मिनट," घंटी ने कहा। "शायद कम। पर अगर कोई पहले से कमरे में छिपा हो, तो एक मिनट काफ़ी है।"
मैंने कमरे को देखा।
छोटा-सा कमरा। एक चारपाई। एक लोहे की अलमारी। औज़ारों का ट्रंक। दीवार पर गुनगुनाता बल्ब। एक खिड़की — बंद। एक दरवाज़ा — खुला, जो दुकान की तरफ़ जाता है।
"यहाँ कोई नहीं है," मैंने कहा।
"नहीं है," घंटी ने कहा। "अब नहीं है। पर था।"
मैंने टिंकू की तरफ़ देखा।
"तू बाहर दरवाज़े पर था?"
"हाँ, भैया।"
"तूने किसी को अंदर आते देखा?"
"नहीं।"
"तूने कुछ सुना?"
उसने सोचा।
"सब कुछ सुना," उसने कहा। "पर… एक चीज़।"
"क्या?"
"जब आप पापा से बहस कर रहे थे," टिंकू ने धीरे से कहा, "तब मुझे लगा कि कमरे में कुछ… हिला।"
"कहाँ?"
"पर मैंने देखा नहीं," उसने कहा। "मैं आपकी आवाज़ सुन रहा था।"
मैं चुप खड़ा रह गया।
फिर मैंने पापा की तरफ़ देखा।
वो उठ रहे थे। धीरे-धीरे। उनकी आँखें उस पन्ने पर थीं।
"पापा," मैंने कहा। मेरी आवाज़ अब शांत थी। गुस्सा खत्म नहीं हुआ था, पर वो कहीं और चला गया था — किसी ऐसी जगह जहाँ मैं उसे अभी नहीं देख सकता था।
"मुझे मालूम है," उन्होंने कहा। "मुझे मालूम है कि तुम मुझसे नाराज़ हो।"
"हाँ।"
"और तुम सही हो।"
"ये मुझे बाद में बताइए," मैंने कहा। "अभी ये बताइए — जब आपने पंद्रह साल पहले ट्रंक खोला था, तो ये पन्ना अंदर था?"
पापा ने पन्ने की तरफ़ देखा।
"नहीं," उन्होंने कहा।
"नहीं?"
"मैंने ये पन्ना नहीं देखा," उन्होंने कहा। "मैंने कुछ और देखा।"
"क्या?"
उन्होंने एक लंबी साँस ली।
"मैंने अपना चेहरा देखा," उन्होंने कहा।
कमरा फिर चुप हो गया।
"मेरा चेहरा," पापा ने कहा, "ट्रंक के अंदर था। जैसे कोई मेरी शक्ल का आदमी अंदर बैठा हो। और वो मेरी आवाज़ में बोल रहा था। मैं डर गया। मैंने ट्रंक बंद कर दिया। मैंने कभी नहीं सोचा कि अंदर काग़ज़ भी हो सकता है।"
मैंने ट्रंक की तरफ़ देखा।
"तो ये पन्ना बाद में आया," मैंने कहा। "किसी ने इसे यहाँ रखा।"
"लगता तो है," मीरा ने कहा।
"तो किसने रखा?"
"वही," घंटी ने कहा, "जिसने दीवार पर राख मली। वही, जिसने पीछे वाले कमरे में लिखा। वही, जो आज रात कमरे में था।"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा।
"राख का निशान," मैंने कहा। "और ट्रंक के अंदर का हाथ। दोनों एक।"
मीरा ने सिर हिलाया।
"एक हाथ," उसने कहा। "सबसे छोटी उँगली अधूरी।"
"तो वो हमें बता रहा है," मैंने कहा। "वो हमें बता रहा है कि वो हमसे पहले यहाँ आ चुका है। वो हमें बता रहा है कि उसका हाथ हर उस जगह है जहाँ हमें डरना चाहिए।"
"और ये पंक्ति?" टिंकू ने कहा। उसने उँगली से पन्ने पर लिखी लाइन की तरफ़ इशारा किया। "जोड़ने वाले का घर — पहले जलेगा।"
मैंने उस लाइन को देखा।
"ये किसी ने अभी नहीं लिखी," मैंने कहा। "ये लिखाई पुरानी है। पर इसके नीचे के नाम नहीं।"
सच था। ऊपर के नाम — दादा के, और बाक़ी छह अंगूठों के — पुरानी स्याही में थे। पर नीचे दो नाम — शंकर यादव और अंकुश यादव — नई स्याही में थे।
"ये पन्ना दो बार लिखा गया है," मीरा ने कहा। "पहले किसी ने असली काग़ज़ लिखा। फिर किसी ने उसे जलाया। और फिर किसी ने इस बचे हुए आधे टुकड़े पर नया नाम जोड़ा।"
"अंकुश का नाम," टिंकू ने कहा। "और पापा का।"
मैंने पापा की तरफ़ देखा।
वो खुद अपना नाम देख रहे थे। उनका चेहरा सख़्त था।
"पापा," मैंने कहा।
"मैं इसे नहीं लिखा," उन्होंने कहा।
"मुझे पता है।"
"मैंने कभी किसी काग़ज़ पर…" उन्होंने रुककर साँस ली। "एक बार। बस एक बार। और वो काग़ज़ ये नहीं है।"
"पापा," मैंने कहा। "ये पन्ना हमें कुछ और बता रहा है।"
"क्या?"
मैंने पन्ने के फटे किनारे की तरफ़ इशारा किया।
"जब ये जला," मैंने कहा, "तो आधा जला। और आधा बचा। ये आधा बचा हिस्सा — इसमें दादा का नाम भी था। यानी असली काग़ज़ में दादा का अंगूठा था।"
"तो?"
"तो इसका मतलब है कि ये पन्ना जान-बूझकर आधा जलाया गया," मैंने कहा। "इसे पूरा जलाना आसान था। कोई इसे पूरा जला सकता था। पर नहीं — इसे आधा जलाया, फिर यहाँ ट्रंक में रखा, और फिर इस पर नए नाम जोड़े।"
कमरा फिर चुप।
"तो ये किसी का संदेश है," मीरा ने कहा।
"हाँ," मैंने कहा। "ये कोई सबूत नहीं है। ये कोई शिकायत नहीं है। ये धमकी है।"
मैंने अपनी जेब से घंटी निकाली।
वो गरम थी।
"घंटी," मैंने कहा। "ये पन्ना किसका है?"
"तेरा है," घंटी ने कहा।
"क्या?"
"तेरा," घंटी ने कहा। "और तेरे दादा का। और तेरे पापा का। और उन सात आदमियों का जिन्होंने इसे लिखा था।"
"तो ये अस्पताल की ज़मीन का असली काग़ज़ है?"
"आधा," घंटी ने कहा। "बाक़ी आधा कहीं और रखा है।"
"कहाँ?"
"कहीं जहाँ राख ने लिखा है," घंटी ने कहा। "और जहाँ तेरा हाथ अभी नहीं पहुँचा।"
मैंने घंटी को मुट्ठी में कसा।
फिर कुछ हुआ जिसने मेरी सोच का रुख़ बदल दिया।
पापा उठे।
उन्होंने स्टूल से अपना हाथ उठाया और मेरी तरफ़ बढ़ाया।
"अंकुश," उन्होंने कहा। "पहले मैंने सिर्फ़ डर के मारे ये बात नहीं छिपाई थी।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"मैंने इसे इसलिए भी छिपाया," उन्होंने कहा, "क्योंकि उस रात के बाद मैं किसी काम का नहीं रहा। मैं इस घर में चुपचाप बैठा रहा। मैंने दुकान तुम्हें दी। मैंने अपने हाथ अपने पास रखे। मैं बस… मैं बस रुका रहा।"
"आप रुके नहीं," मैंने कहा। "आप छिपे थे।"
"हाँ," उन्होंने कहा। "और छिपने में रुकने से ज़्यादा दर्द होता है।"
मैं चुप रहा।
"मैंने सोचा था," उन्होंने कहा, "कि अगर मैं कुछ नहीं बोलूँगा, तो वो रात ख़त्म हो जाएगी। पर वो ख़त्म नहीं हुई। मैं हर रात उसी गली में वापस जाता हूँ। हर रात वही चीख़ सुनता हूँ। हर रात ट्रंक पर हाथ रखता हूँ और उसे खोलने की हिम्मत नहीं करता।"
उनकी आवाज़ काँप रही थी।
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
और मेरा गुस्सा…
मेरा गुस्सा टूट गया।
इसलिए नहीं कि उन्होंने कुछ ठीक कहा।
इसलिए कि उनकी आवाज़ में वो सच था जो मैंने पंद्रह साल में पहली बार सुना।
"पापा," मैंने कहा। "आप मेरी तरफ़ देखिए।"
वो मेरी तरफ़ देखा।
"मुझे आपसे कोई शिकायत नहीं है," मैंने कहा। "मुझे सिर्फ़ ये जानना है कि उस रात — उस पन्ने पर — मेरा नाम किसने लिखा?"
पापा ने पन्ने की तरफ़ देखा।
"मैंने नहीं लिखा," उन्होंने कहा।
"तो?"
"तो कोई है," उन्होंने कहा, "जो तुम्हें उस काग़ज़ में लिखना चाहता है।"
"क्यों?"
"क्योंकि," पापा ने कहा, "जो काग़ज़ में लिखा हो, वो काग़ज़ में ही मरता है। अगर तुम्हारा नाम इस पन्ने पर है, तो जो इस पन्ने को जलाएगा, वो तुम्हें भी जलाएगा।"
कमरे में सन्नाटा।
और फिर —
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