The Mysterious Bell – Chapter 670
मैंने ट्रंक पर आख़िरी बार हाथ रखा। लोहा अब भी ठंडा था, पर उसमें से कोई धड़कन नहीं आ रही थी। जैसे अंदर वाला जवाब देकर सो गया हो।
मैं बाहर निकला।
टिंकू मेरे पास आया। उसने धीरे से पूछा, "उस्ताद, पन्ने पर मेरा नाम नहीं था न?"
"नहीं," मैंने कहा।
उसने राहत की साँस ली। फिर वो थोड़ी देर चुप रहा, और बोला, "अगर होता, तो मैं डरता नहीं।"
"झूठ मत बोल," मैंने कहा। "डरता तू। और डरना ठीक है। डर से आँखें तेज़ होती हैं। कायरता तब"झूठ मत बोल," मैंने कहा। "डरता तू। और डरना ठीक है। डर से आँखें तेज़ होती हैं। कायरता तब होती है जब आदमी डर के आगे अपनी जगह छोड़ दे। तूने जगह नहीं छोड़ी। तू यहाँ खड़ा है।"
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। उसके होंठ हिले, कुछ कहना चाहा, पर फिर चुप हो गया। उसने सिर हिलाया — एक छोटा-सा, सख़्त सिर हिलाना, जैसे कोई अपने आप से वादा करता है।
मैंने शटर के नीचे से फिर झाँका।
लकड़ी के जूते वाले पैर अब भी वहीं थे। दो पैर। धूल भरे। ज़मीन पर टिके हुए, एक-दूसरे से थोड़ी दूर। कोई हिलना-डुलना नहीं। जैसे कोई मूर्ति गाड़ दी गई हो।
और उनके पीछे, गली में, बच्चों की टॉर्चें घूम रही थीं। सानिया की लाल कवर कॉपी उसके हाथ में चमक रही थी।
"सानिया," मैंने धीरे से कहा।
वो शटर के पास आई। उसका चेहरा आधा अंधेरे में था।
"ये आदमी कब से खड़ा है?"
"पाँच मिनट से," उसने कहा। "मैंने पहले सोचा कि चला जाएगा। पर ये हिलता भी नहीं। भैया, इसके जूते…" उसने रुककर देखा। "ये जूते धूल भरे नहीं हैं। ये मिट्टी से लिपटे हैं। और सूखे नहीं हैं।"
मैंने करीब से देखा।
सही कह रही थी। जूतों पर मिट्टी थी — काली, गीली मिट्टी। जैसे किसी ने अभी-अभी कहीं खोदकर पैर रखे हों।
मेरे पेट में कुछ ठंडा-ठंडा घूम गया।
"घंटी," मैंने धीरे से कहा।
"हूँ।"
"ये आदमी अंदर आएगा?"
"नहीं," घंटी ने कहा।
"तो खड़ा क्यों है?"
"क्योंकि उसे तेरी आवाज़ चाहिए," घंटी ने कहा। "वो तेरे मुँह से सुनना चाहता है कि तू अंदर है। बाहर नहीं।"
"क्यों?"
"ताकि वो जान सके कि घर खाली है।"
मेरी रीढ़ के साथ ठंडी सुई जैसी चीज़ चली गई।
मैंने टिंकू की तरफ़ देखा।
"टिंकू, बच्चों को लेकर शटर के नीचे से अंदर आ जा। सबके सब। अभी।"
"पर भैया—"
"अभी, टिंकू।"
उसने एक पल भी नहीं सोचा। वो भागा। दस सेकंड में सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़, चिंटू और टिंकू — पाँचों शटर के नीचे से सरककर अंदर आ गए। रफ़ीक़ का घुटना फिसला और वो गिरते-गिरते बचा; चिंटू ने उसे खींच लिया।
मैंने शटर नीचे खींचा।
धड़ाम।
आवाज़ पूरी गली में गई होगी।
फिर मैं खड़ा रह गया, शटर पर हाथ रखे, साँस रोके।
बाहर से कोई आवाज़ नहीं आई। कोई दस्तक नहीं। कोई धमकी नहीं। बस चुप्पी — वो चुप्पी जो धमकी से भी ज़्यादा बोलती है।
"अंकुश," मीरा ने कहा। उसकी आवाज़ धीमी थी। "कैमरा देख।"
मैं उसके पास गया। स्क्रीन पर पाँच बच्चे खड़े थे — सबके चेहरे डरे हुए, सबके हाथों में टॉर्चें। और उनके पीछे, दरवाज़े की तरफ़, पापा खड़े थे।
"पीछे घूम," मीरा ने कहा।
फुटेज में कुछ नहीं दिखा। सिर्फ़ भीतर का कमरा, ट्रंक, और पापा।
"नहीं," मीरा ने कहा। "ये देख।"
उसने फुटेज पीछे की। दो मिनट पहले का।
शटर के नीचे से वो पैर दिखे। फिर फुटेज में एक हल्की-सी चीज़ हुई। पैरों के पीछे, गली की तरफ़, धूल में कुछ बना। जैसे किसी ने उँगली से ज़मीन पर लिखा हो।
और फिर वो मिट गया।
मैंने मीरा की तरफ़ देखा।
"ये क्या था?"
"मुझे नहीं पता," उसने कहा। "मैंने शूट किया, मैंने देखा नहीं।"
पापा मेरे पास आए। उन्होंने फुटेज देखी। उनका चेहरा कुछ और ठंडा हो गया।
"पापा?"
"वो मिटा नहीं," पापा ने कहा। "वो खुद मिटाया गया है।"
"क्या मतलब?"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में कुछ था जो मैंने पहले कभी नहीं देखा।
"अंकुश," उन्होंने कहा। "ट्रंक खोल।"
मैं एक पल के लिए रुक गया।
कुछ मिनट पहले वो खुद कह रहे थे कि इसे मत खोल। अब वो कह रहे हैं कि खोल।
"पापा—"
"उसने जो लिखा," पापा ने कहा, "वो मैंने पहले भी देखा है। पंद्रह साल पहले। उसी रात।"
फिर वो ट्रंक के पास गए और अपने घुटनों के बल बैठ गए।
उनकी कमर झुकी थी। उनके हाथ काँप रहे थे। पर उनका हाथ ट्रंक के ताले पर बिल्कुल स्थिर था।
"चाबी," उन्होंने कहा।
मैंने जेब से चाबी निकाली।
पर मैंने दी नहीं।
"पहले एक बात," मैंने कहा। "आपने पंद्रह साल पहले इसे खोला था, तो उस दिन आपने क्या देखा?"
पापा ने मेरी तरफ़ देखा।
"मैंने कुछ नहीं देखा," उन्होंने कहा। "मैंने सुना।"
"क्या सुना?"
वो चुप रहे।
"पापा।"
"मैंने अपनी आवाज़ सुनी," उन्होंने कहा। "अंदर से। मेरी अपनी आवाज़। जैसे कोई मेरी आवाज़ में बोल रहा हो और मुझे बता रहा हो कि मैंने क्या किया है।"
कमरा चुप हो गया।
बच्चे भी चुप। मीरा भी चुप। बल्ब गुनगुना रहा था और बस।
"आपने क्या किया था?" मैंने पूछा।
"अभी नहीं," पापा ने कहा। "पहले ट्रंक।"
मैंने चाबी दी।
उन्होंने ताले में डाली। एक बार घुमाया। ताला खुला — एक आवाज़ आई जैसे कोई पुरानी हड्डी चटकी हो।
और फिर पापा ने ढक्कन उठाया।
ट्रंक के अंदर पहले कुछ नहीं दिखा। सिर्फ़ अंधेरा।
फिर मीरा ने टॉर्च की रोशनी अंदर डाली।
औज़ार थे। बहुत सारे औज़ार। रिंच, पेचकस, हथौड़े, छेनियाँ, कुछ पुरानी चाबियाँ, तार के गोले, बोल्ट के डिब्बे, पुराने रंग के फटे कपड़े, औज़ारों में लिपटे हुए।
सब कुछ एक के ऊपर एक रखा हुआ, जैसे किसी ने बहुत जल्दी में भरा हो।
"यहाँ कुछ और है," मीरा ने कहा।
उसने टॉर्च थोड़ी और नीचे की।
औज़ारों के नीचे, ट्रंक की तली में, एक परत थी।
काली। जली हुई। मोटी।
मैंने ट्रंक में हाथ डाला और ऊपर के औज़ार एक-एक करके निकालने लगा। रिंच — चटाक। हथौड़ा — ठक। पेचकस — ढक। मेरे हाथ तेज़ थे, पर मेरा दिमाग़ धीमा।
क्योंकि जैसे-जैसे औज़ार निकल रहे थे, वैसे-वैसे वो परत साफ़ दिख रही थी।
काग़ज़ की परत।
जला हुआ काग़ज़।
मोटा, दबा हुआ, कई तहों में चिपका हुआ — जैसे कोई काग़ज़ों का ढेर जलाया गया हो, आधा जला हो, और फिर उसे दबाकर ट्रंक की तली में बिछा दिया गया हो।
और उससे एक गंध आ रही थी।
जली काग़ज़ की गंध।
वही गंध जो अस्पताल की पिछली दीवार से आई थी।
मैंने पीछे देखा।
पापा मेरे ठीक पीछे खड़े थे। उनका चेहरा पीला पड़ गया था। उनका हाथ मेरे कंधे पर था और उसकी पकड़ कस रही थी।
"पापा?"
"वो ही है," उन्होंने फुसफुसाया। "यही परत। यही गंध।"
"क्या मतलब?"
उन्होंने मेरा कंधा छोड़ा। वो दो कदम पीछे हटे। फिर एक स्टूल खींचकर बैठ गए — नहीं, गिरे। उनके घुटने जवाब दे गए थे।
मैं उनके पास गया।
"पापा, आप ठीक हैं?"
"मैं ठीक नहीं हूँ," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ टूट रही थी। "और मैं पंद्रह साल से ठीक नहीं हूँ।"
मैंने उन्हें थोड़ा पानी दिया।
शबनम आपा की गुमटी से लाया हुआ पानी — अंकुश, वो पानी जो मैंने सुबह भरा था, जब मैंने सोचा था कि आज का दिन आसान होगा।
उन्होंने गिलास पूरा पी लिया। फिर गिलास उन्होंने अपने घुटनों पर रखा और उसे दोनों हाथों से पकड़ लिया, जैसे कहीं उड़ न जाए।
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