The Mysterious Bell – Chapter 668
"और हकीम साहब ने क्या कहा?"
"उन्होंने कुछ नहीं कहा," पापा ने कहा। "उन्होंने एक आवाज़ की। बस एक आवाज़। जैसे कोई गला पकड़कर छुड़ाता है।"
कमरा बहुत चुप हो गया।
"मैं भाग आया," पापा ने कहा। "मेरे हाथ में एक काग़ज़ का जला कोना था, जो आग के किनारे से उड़कर मेरे पैर पर गिरा था। मैं उसे लेकर भागा। मैंने सोचा — किसी को बता दूँगा। फिर सोचा — किसे बताऊँगा? मैं एक मिस्त्री हूँ। मेरा किसी दफ़्तार में कोई आदमी नहीं। मेरी बीवी बीमार है। मेरे बच्चे छोटे हैं। मैंने उस काग़ज़ को इस ट्रंक में डाल दिया, ऊपर अपने औज़ार रख दिए, और कभी नहीं खोला।"
"आपने पुलिस को क्यों नहीं बताया?" मेरा गला सख्त हो गया।
"मैं डर गया था।"
"आप डर गए थे," मैंने कहा। मेरी आवाज़ खुद मेरे कानों में बदल गई। "आप डर गए थे, पापा? मैं बाईस साल से उसी अस्पताल में माँ को ले जा रहा हूँ। उसी दीवार के नीचे से गुज़रता हूँ। और आपको पता था कि उस दीवार के पीछे क्या हुआ था?"
"अंकुश—"
"आपको पता था!" मैंने कहा। मेरी आवाज़ ऊँची हो गई और मुझे अपनी ही आवाज़ पर गुस्सा आया। "उस रात हकीम साहब की आवाज़ आई और आप भाग आए। उन्होंने आपको बचाने के लिए बुलाया था या नहीं, मुझे नहीं पता, पर आप भाग आए। और जब पाँच साल पहले उसी दफ़्तर में आपका अंगूठा लिया गया, तब भी आप चुप रहे। कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा, पापा। कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा!"
वो मेरी तरफ़ देख रहे थे। उन्होंने एक शब्द भी नहीं कहा। उनके हाथ ट्रंक के किनारे पर रखे थे और वो काँप रहे थे — नहीं, हाथ नहीं काँप रहे थे। उनकी उँगलियाँ उस राख को दबा रही थीं, जैसे उससे कोई जवाब निकलेगा।
और तभी मैंने वो सुना।
बहुत धीमी आवाज़। बहुत छोटी।
"म… मैं उस रात के बाद हकीम साहब के पास नहीं गया," वो बोले। "मैं उनसे मिलने नहीं गया। मैंने उनकी दुकान के सामने से गुज़रना बंद कर दिया। बीस साल तक मैंने उस गली से होकर रास्ता नहीं बनाया।"
"क्यों?"
"क्योंकि मुझे लगता था कि मैंने उन्हें अकेला छोड़ दिया," उन्होंने कहा। "और जब वो मर गए, तो मुझे लगा कि मेरी वजह से मरे। अगर मैं चिल्लाया होता, अगर मैंने पत्थर फेंके होते, अगर मैंने किसी और को जगाया होता—"
उनकी आवाज़ बंद हो गई।
मेरा गुस्सा वहीं, उसी पल, कहीं गिर गया। गिरा और टूट गया। जैसे कोई लोहे का पाइप जिसमें से पानी निकलने की बजाय हवा निकलती है।
मैं उनके पास बैठ गया।
"आपने माँ को कैसे ठीक किया था?" मैंने पूछा। "पैसे कहाँ से आए?"
"सकीना बी ने लोहा-भांटा दिया," पापा ने कहा। "और उस्ताद ने। दोनों ने कभी वापस नहीं माँगा। मैंने उनके लिए जो औज़ार ठीक किए, वो भी हिसाब से ज़्यादा नहीं थे। मैं आज तक उनका कर्ज़ नहीं उतार पाया।"
मैंने अपना हाथ उनके हाथ पर रखा। उनकी उँगलियों में राख थी। मेरी उँगलियों में भी।
"अब आप मेरे साथ चलेंगे," मैंने कहा। "आज रात। जब हम वो दरवाज़ा खोलेंगे।"
"अंकुश—"
"आप डरेंगे," मैंने कहा। "मैं भी डरूँगा। टिंकू डरेगा। मीरा कहेगी कि वो नहीं डर रही और वो सबसे ज़्यादा डरी होगी।" मैंने मुड़कर मीरा को देखा। "तुम होघी?"
"मैं डर रही हूँ," मीरा ने साफ़ कहा। "पर मैं कैमरा बंद नहीं करूँगी।"
"यही चाहिए," मैंने कहा।
मीरा ट्रंक के पास आई। उसने फ़्लैश जलाया और राख पर झुककर देखने लगी, जैसे डॉक्टर घाव देखते हैं।
"अंकुश," उसने कहा, "ये राख फैली हुई नहीं है।"
"मतलब?"
"मतलब ये पूरे ट्रंक में बराबर बिछी हुई है, जैसे किसी ने छलनी से छानकर बिछाई हो। पर इसके बीच में…" उसने टॉर्च जलाई। "यहाँ कुछ सख़्त है।"
मैंने देखा। राख के बीच एक छोटा-सा उभार था। मैंने अपनी जेब से पेचकस निकाला — वही पुराना, जो रणवीर के दफ़्तर से लौटा था — और उसका नुकीला सिरा धीरे से रखकर ऊपर उठाया।
कुछ खिसका।
मीरा ने राख को ब्रश की तरह उड़ाया, जैसे कोई पुराना फ़ोटो साफ़ करता है।
नीचे से एक पन्ना निकला।
आधा पन्ना।
पीला, फटा, किनारे से जला हुआ, और जैसे ही हवा लगी, उसने अपना एक कोना मोड़ लिया। उसकी ऊपरी सतह पर नीली स्याही में लिखावट थी। नीचे की तरफ़ लाल-भूरे रंग के गोल निशान — अंगूठे।
मैंने उसे दोनों हाथों से संभाला। हल्का था। इतना हल्का कि जैसे कोई सूखी पत्ती थमा दे।
"पढ़ो," मीरा ने कहा।
"मैं… ये पढ़ नहीं पा रहा," मैंने कहा। सच कह रहा था। अक्षर बहुत छोटे थे और ऊपर की लाइन जलकर गायब हो गई थी।
मीरा ने पन्ना मेरे हाथ से लिया और ठीक से पकड़कर मेरी तरफ़ झुकाया। उसकी साँस मेरे कंधे पर गरम पड़ी।
"देखो," उसने कहा। "यहाँ नाम हैं। एक… दो… तीन…" वो रुकी। "ये रजिस्टर का पन्ना है, अंकुश। देखो, ये छेद — सिलाई के। ये पन्ना किसी रजिस्टर से निकाला गया है या जलने से बचकर उड़ गया है।"
"नाम पढ़ो।"
"पहला… बढ़ई," उसने पढ़ा। "दूसरा… किराना। तीसरा… तांगा।" वो थोड़ी और झुकी। "चौथा… दर्ज़ी।"
मेरा हाथ ठंडा हो गया।
"पाँचवाँ… हलवाई।" उसने कहा। "छठा…" उसकी आवाज़ बदली। "छठा पढ़ा नहीं जा रहा, जल गया है।"
"और ये नीचे?"
"नीचे…" मीरा ने टॉर्च की रोशनी घुमाई। "नीचे एक नाम है, थोड़ा और बड़ा। जगदीश यादव।"
मेरे भीतर कुछ हिला।
"दादा," मैंने कहा।
"और उसके नीचे," मीरा ने कहा। वो रुकी। वो काफ़ी देर रुकी।
"मीरा।"
"अंकुश," उसने कहा, "ये नीचे का नाम… जगदीश यादव वाली लाइन के नीचे नहीं है। ये अलग लाइन में है। और ये स्याही…"
"क्या?"
"ये स्याही नई है।"
मैंने पन्ना अपनी तरफ़ खींचा। मीरा ने रोशनी सीधी की।
उस जले हुए, बाईस साल पुराने पन्ने पर, सबसे नीचे, एक साफ़ नई काली स्याही में मेरा नाम लिखा था।
अंकुश यादव।
मेरा मुँह सूख गया।
"ये नहीं हो सकता," मैंने कहा। "ये पन्ना बाईस साल पहले जला था। अगर मेरा नाम इस पर है, तो ये… ये बाद में किसी ने लिखा है।"
"हाँ," मीरा ने कहा।
"मतलब किसी ने इस पन्ने को निकाला, मेरा नाम लिखा, और वापस राख में दबा दिया।"
"हाँ।" मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। "और उसके लिए उसे इस ट्रंक के अंदर आना पड़ा।"
मैंने पीछे मुड़कर देखा।
पापा अपनी जगह पर बैठे थे, आँखें झुकी हुईं।
"पापा," मैंने कहा। "इस ट्रंक का ताला सबसे आख़िरी बार कब खुला था?"
"जब मैंने इसे राख के साथ बंद किया था," उन्होंने कहा। "बाईस साल पहले। उसके बाद मैंने इसे छुआ नहीं।"
"ताला टूटा तो नहीं था?"
"नहीं।"
"और चाबी?"
"तेरे गले में थी।"
हम दोनों ने एक ही वक़्त में ट्रंक के ताले की तरफ़ देखा।
ताला सही था। ठीक हुआ हुआ। पूरा बंद। मगर ताले के भीतर, चाबी घुसाने की जगह के किनारे, धूल में एक पतली लकीर थी। जैसे कोई पतली चीज़ घुसाकर अंदर से कुछ उठाता हो। लॉकपिक नहीं। कुछ और।
मैंने पापा की तरफ़ देखा।
"मुझे नहीं पता," उन्होंने कहा, मेरे पूछने से पहले। "मुझे सच में नहीं पता, अंकुश।"
और मुझे लगा कि वो सच कह रहे हैं। उनकी आवाज़ अब भी काँप रही थी, पर वो काँपना थकान का था, डर का नहीं।
"तो कोई है," मैंने कहा, "जो इस घर में आ सकता है, ट्रंक खोल सकता है, और इसे बंद भी कर सकता है।"
"कोई है," घंटी ने कहा। उसकी आवाज़ पहले से ज़्यादा साफ़ थी।
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